प्रमोशन से पिछली खराब एंट्रीज़ खत्म नहीं होतीं, अनिवार्य रिटायरमेंट के लिए पूरा सर्विस रिकॉर्ड ज़रूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

15 Aug 2026 8:15 PM IST

  • प्रमोशन से पिछली खराब एंट्रीज़ खत्म नहीं होतीं, अनिवार्य रिटायरमेंट के लिए पूरा सर्विस रिकॉर्ड ज़रूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के अनिवार्य रिटायरमेंट के मामले पर विचार करते समय, प्रमोशन से पहले मिली खराब एंट्रीज़ (Adverse Entries) प्रमोशन के बाद खत्म नहीं हो जातीं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मूल्यांकन में पूरे सर्विस रिकॉर्ड को देखा जाना चाहिए और ईमानदारी से जुड़ी एक भी एंट्री कर्मचारी को अनिवार्य रूप से रिटायर करने के लिए काफ़ी हो सकती है।

    जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा,

    “..स्थापित स्थिति यह है कि सरकारी कर्मचारी के अनिवार्य रिटायरमेंट के मामले पर विचार करने के लिए पूरे रिकॉर्ड को देखना ज़रूरी है और यह भी देखा गया है कि ईमानदारी के संबंध में एक भी एंट्री किसी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से रिटायर करने के लिए काफ़ी है।”

    याचिकाकर्ता को 1977 में फर्रुखाबाद जिले में क्लास IV कर्मचारी के तौर पर नियुक्त किया गया और 1999 में जिले के बंटवारे के समय कन्नौज जिले में ट्रांसफर कर दिया गया। उन्हें 2000 में दफ्तरी के पद पर स्थायी किया गया। 26 अप्रैल 2005 के आदेश से, 50 साल की उम्र पूरी होने पर उनके कुल प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के बाद इस उद्देश्य के लिए गठित समिति की रिपोर्ट पर उन्हें फाइनेंशियल हैंडबुक, भाग II (भाग II से IV) के फंडामेंटल रूल्स के नियम 56-C के तहत अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया गया।

    उस रिपोर्ट की कॉपी के लिए उनकी अर्ज़ी 5 मई 2005 के आदेश से खारिज की गई। दोनों आदेशों को हाई कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई कि 2000 में उनके प्रमोशन से उनकी सालाना गोपनीय रिपोर्ट (ACR) की सभी पिछली एंट्रीज़ खत्म हो गईं, और यह तय करते समय कि उन्हें अनिवार्य रूप से रिटायर किया जाना चाहिए या नहीं, उन एंट्रीज़ को नहीं देखा जा सकता।

    प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि हाईकोर्ट ने खुद 25 मई 2015 के आदेश में ओरिजिनल रिकॉर्ड मंगाने के बाद यह दर्ज किया कि याचिकाकर्ता की दस साल की सर्विस असंतोषजनक पाई गई और जुर्माना लगाया गया, और इस निष्कर्ष को कभी चुनौती नहीं दी गई।

    कोर्ट ने पाया कि जिला जज ने रिटायरमेंट का आदेश पारित करने से पहले पिछले दस वर्षों में याचिकाकर्ता के कुल प्रदर्शन का मूल्यांकन किया।

    “याचिकाकर्ता का यह दावा कि 2000 में प्रमोशन मिलने के कारण उनका पिछला आचरण अब मायने नहीं रखता (यानी 'वॉश आउट' हो गया है), कानून की नज़र में सही नहीं है।”

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि 'वॉश आउट' थ्योरी को पहले कुछ मामलों में माना गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 'स्टेट ऑफ़ ओडिशा बनाम राम चंद्र' मामले में इसे खारिज कर दिया। बेंच ने कहा था कि खराब एंट्रीज़ (Adverse Entries) के बाद प्रमोशन मिलने से वे एंट्रीज़ अमान्य या अप्रासंगिक नहीं हो जातीं, और कर्मचारी को नौकरी में बनाए रखना उचित है या नहीं, यह तय करने के लिए सरकार के पास वही जानकारी उपलब्ध रहती है।

    कोर्ट ने गौर किया कि 'स्टेट ऑफ़ गुजरात बनाम उमेद भाई एम. पटेल' और 'स्टेट ऑफ़ यूपी बनाम विजय कुमार जैन' मामलों में भी इसी बात को माना गया। इन मामलों में कहा गया कि खराब एंट्री का असर या गंभीरता सिर्फ़ इसलिए खत्म नहीं हो जाती कि वह बहुत पहले की बात है।

    'प्यारे मोहनलाल बनाम स्टेट ऑफ़ झारखंड' मामले में प्रमोशन से पहले की एंट्रीज़ को नज़रअंदाज़ करने की बात सिर्फ़ आगे प्रमोशन मिलने के मामलों तक ही सीमित थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नियम उन मामलों में लागू नहीं होता, जहां सवाल यह हो कि क्या कर्मचारी नौकरी में बने रहने के लायक है; क्योंकि यह आकलन पूरे सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर किया जाता है।

    कोर्ट ने देखा कि काउंटर-एफिडेविट में याचिकाकर्ता के खिलाफ़ बार-बार खराब एंट्रीज़ और संदिग्ध ईमानदारी का आरोप लगाया गया। साथ ही 21 अप्रैल 2005 की स्क्रीनिंग रिपोर्ट से पता चला कि उनके पूरे सर्विस रिकॉर्ड पर विचार किया गया।

    अनिवार्य रिटायरमेंट के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात न पाते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज की। कमेटी की रिपोर्ट की कॉपी न देने के मामले पर कोर्ट ने कहा कि 5 मई 2005 के आदेश का महत्व खत्म हो गया, क्योंकि इन कार्यवाही के दौरान पूरा रिकॉर्ड कोर्ट के सामने पेश किया जा चुका था।

    Case Title: Mohd. Jamil Warsi v. High Court Of Judicature At Allahabad Thru C.J. And Others

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