एम्प्लॉयर के खिलाफ महिला की यौन उत्पीड़न की शिकायत पर FIR दर्ज करने से पुलिस का इनकार: हाईकोर्ट का यूपी DGP को जांच का आदेश

Shahadat

12 Aug 2026 9:38 AM IST

  • एम्प्लॉयर के खिलाफ महिला की यौन उत्पीड़न की शिकायत पर FIR दर्ज करने से पुलिस का इनकार: हाईकोर्ट का यूपी DGP को जांच का आदेश

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को यह जांचने का निर्देश दिया कि गाजियाबाद पुलिस अधिकारियों ने एक महिला की शिकायत पर FIR दर्ज करने से क्यों इनकार किया। महिला ने अपने एम्प्लॉयर पर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, उकसाने और आपराधिक धमकी देने का आरोप लगाया।

    जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने आरोपी एम्प्लॉयर के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए यह निर्देश दिया।

    कोर्ट को यह समझना "मुश्किल" लगा कि पुलिस ने FIR क्यों दर्ज नहीं की, जबकि महिला के आरोपों से साफ तौर पर संज्ञेय अपराध (Cognizable Offences) का पता चलता था।

    कोर्ट ने DGP को संबंधित पुलिस कर्मियों, जिनमें संबंधित अधिकारी और गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर शामिल हैं, उसके आचरण की जांच करने और व्यक्तिगत हलफनामे के माध्यम से रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    शिकायतकर्ता महिला ने याचिकाकर्ता की कंपनी में एडमिन के तौर पर काम किया। उसने आरोप लगाया कि गुप्ता ने बार-बार उसका यौन उत्पीड़न किया, उसके साथ छेड़छाड़ की, उसे धमकाया और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया।

    उसने आगे आरोप लगाया कि मार्च 2026 में उसने डिजिटल पेनिट्रेशन (उंगली से यौन शोषण) किया और उसे तथा उसके परिवार के सदस्यों को धमकाया।

    वह पहले गाजियाबाद के वेव सिटी पुलिस स्टेशन गई और उसके बाद गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर के पास गई, लेकिन कोई FIR दर्ज नहीं की गई। फिर उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क किया।

    पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया कि महिला से व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या सोशल-मीडिया बातचीत उपलब्ध कराने के लिए कहा गया, लेकिन वह ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाई।

    पुलिस रिपोर्ट में उसके आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, झूठा और बेबुनियाद करार दिया गया और सुझाव दिया गया कि ये आरोप एम्प्लॉयर द्वारा पहले दर्ज कराए गए जबरन वसूली (Extortion) के मामले के जवाब में दबाव बनाने की रणनीति या जवाबी कार्रवाई थे। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई, 2026 को FIR दर्ज करने और जांच करने का आदेश दिया।

    इसे BNS की धाराओं 64 (बलात्कार), 74 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 75(2) (यौन उत्पीड़न), 76 (कपड़े उतारने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और 351(3) (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया।

    FIR दर्ज होने के बाद आरोपी नियोक्ता ने FIR रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। उसने तर्क दिया कि आरोप झूठे और अविश्वसनीय थे और ये पहले की जबरन वसूली की कार्यवाही से प्रेरित थे।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    FIR रद्द करने के चरण में विवादित तथ्यात्मक आरोपों की जांच करने से इनकार करते हुए बेंच ने कहा कि आरोपों की जांच की आवश्यकता है और अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में इनका निर्णायक रूप से निर्धारण नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने गौर किया कि आरोप केवल इलेक्ट्रॉनिक संचार तक सीमित नहीं थे, बल्कि इनमें नियोक्ता के केबिन में कथित शारीरिक हरकतें, यात्रा के दौरान कथित छेड़छाड़, धमकियां और रोजगार संबंध का कथित दुरुपयोग भी शामिल था।

    बेंच ने कहा,

    "शुरुआती चरण में चैट या रिकॉर्डिंग का न होना यह साबित नहीं करता कि आरोप झूठे हैं।"

    अदालत ने आगे कहा कि FIR दर्ज होने के बाद जांच एजेंसी कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन रिकॉर्ड, सब्सक्राइबर विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूत इकट्ठा कर सकती है।

    इसलिए अदालत ने कहा कि पीड़िता द्वारा ऐसी सामग्री पेश न करने को FIR दर्ज करने से इनकार करने का आधार बनाना पुलिस के लिए उचित नहीं था।

    बेंच ने यह भी कहा,

    "कानूनी जांच करने की ज़िम्मेदारी शिकायतकर्ता महिला पर नहीं डाली जा सकती, जब वह संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offences) की जानकारी लेकर पुलिस के पास जाती है।"

    सुप्रीम कोर्ट के 'ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013)' के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट ने फिर से कहा कि जब जानकारी से संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो FIR दर्ज करना ज़रूरी है।

    कोर्ट ने 'नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले का भी हवाला देते हुए दोहराया कि पुलिस के पास संज्ञेय अपराधों की जांच करने का कानूनी अधिकार और कर्तव्य है।

    कोर्ट ने आगे यह भी कहा:

    "पुलिस का कर्तव्य है कि वह शिकायत ले, संज्ञेय अपराधों का पता चलने पर FIR दर्ज करे, निष्पक्ष जांच करे और जांच का नतीजा सक्षम अदालत के सामने रखे। आरोपों की सच्चाई, गवाहों की विश्वसनीयता, सबूतों की स्वीकार्यता और पर्याप्तता, और आरोपी के दोषी या निर्दोष होने के बारे में अंतिम फ़ैसला कानून के अनुसार आपराधिक अदालत को करना होता है।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR दर्ज होने से पहले सौंपी गई पुलिस रिपोर्ट केवल पुलिस की शुरुआती राय थी और इसे आरोपों की सच्चाई या झूठ के बारे में अंतिम फ़ैसला नहीं माना जा सकता।

    बेंच ने इस बात पर कड़ी चिंता जताई कि जब महिला ने शुरू में पुलिस से संपर्क किया तो उन्होंने FIR दर्ज नहीं की।

    कोर्ट ने कहा:

    "यह समझना मुश्किल है कि संबंधित पुलिस स्टेशन ने FIR क्यों दर्ज नहीं की, जबकि शिकायतकर्ता महिला ऐसे आरोप लेकर आई, जिनसे पहली नज़र में ही संज्ञेय अपराधों का पता चलता था"।

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के DGP को निर्देश दिया कि वे जांच करें कि FIR क्यों दर्ज नहीं की गई और संबंधित पुलिस कर्मियों, जिसमें गाज़ियाबाद के पुलिस कमिश्नर भी शामिल हैं, के आचरण की जांच करें।

    DGP को विशेष रूप से यह जांचने का निर्देश दिया गया कि क्या 16 जुलाई, 2026 की पुलिस रिपोर्ट कानूनी और निष्पक्ष शुरुआती मूल्यांकन के बाद तैयार की गई, और क्या WhatsApp चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या सोशल मीडिया सामग्री पेश न कर पाने को कानूनी रूप से FIR दर्ज करने से इनकार करने का आधार माना जा सकता था।

    DGP को निर्देश दिया गया कि वह व्यक्तिगत रूप से जांच की निगरानी करें और 4 हफ़्ते के भीतर व्यक्तिगत हलफ़नामे के ज़रिए रिपोर्ट सौंपें, जिसमें जांचे गए अधिकारियों, उनके स्पष्टीकरण, निष्कर्षों और प्रस्तावित या की गई कार्रवाई का विवरण हो। कोर्ट ने गाज़ियाबाद के पुलिस कमिश्नर को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि जांच "निष्पक्ष, बिना किसी भेदभाव के और कानून के अनुसार" की जाए।

    Case title - Arpit Gupta vs State of U.P. and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 571

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