'यौन उत्पीड़न की शिकायत पर सबूत न होने पर पुलिस FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती, शिकायतकर्ता पर सबूत देने का बोझ नहीं डाला जा सकता': इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

12 Aug 2026 9:55 AM IST

  • यौन उत्पीड़न की शिकायत पर सबूत न होने पर पुलिस FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती, शिकायतकर्ता पर सबूत देने का बोझ नहीं डाला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस यौन उत्पीड़न की शिकायत पर FIR दर्ज करने से सिर्फ़ इसलिए मना नहीं कर सकती, क्योंकि शिकायतकर्ता महिला ने अपने आरोपों के समर्थन में WhatsApp चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या अन्य ठोस सबूत पेश नहीं किए।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोई महिला संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की जानकारी लेकर पुलिस के पास जाती है तो कानूनी जांच करने की ज़िम्मेदारी उस महिला पर नहीं डाली जा सकती।

    जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने यह टिप्पणी तब की जब वे एक याचिका खारिज कर रहे थे। इस याचिका में यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, डिजिटल पेनिट्रेशन और आपराधिक धमकी के आरोपों वाली FIR को रद्द करने की मांग की गई थी। ये आरोप उस कंपनी के मालिक पर लगाए गए, जहां शिकायतकर्ता महिला काम करती थी।

    कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को यह जांच करने का भी निर्देश दिया कि गाजियाबाद पुलिस अधिकारियों ने महिला की शिकायत पर FIR दर्ज करने से क्यों मना किया। महिला ने अपने नियोक्ता (Employer) पर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, उकसाने और आपराधिक धमकी देने का आरोप लगाया था।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    शिकायतकर्ता महिला याचिकाकर्ता की कंपनी में एडमिन के तौर पर काम करती थी। उसने आरोप लगाया कि आरोपी-याचिकाकर्ता ने बार-बार उसका यौन उत्पीड़न किया, उसके साथ छेड़छाड़ की, उसे धमकाया और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया।

    उसने आगे आरोप लगाया कि मार्च 2026 में उसने डिजिटल पेनिट्रेशन किया और उसे तथा उसके परिवार के सदस्यों को धमकाया।

    वह पहले गाजियाबाद के वेव सिटी पुलिस स्टेशन गई और उसके बाद गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर के पास गई, लेकिन कोई FIR दर्ज नहीं की गई। फिर वह BNSS की धारा 173(4) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के पास गई।

    पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया कि महिला से WhatsApp चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या सोशल-मीडिया बातचीत उपलब्ध कराने के लिए कहा गया, लेकिन वह ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाई।

    पुलिस रिपोर्ट में उसके आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया, झूठा और बेबुनियाद करार दिया गया और कहा गया कि ये आरोप दबाव बनाने का तरीका थे या नियोक्ता द्वारा पहले दर्ज कराए गए जबरन वसूली (Extortion) के मामले का जवाब थे। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई, 2026 को FIR दर्ज करने और जांच का आदेश दिया।

    इसे BNS की धाराओं 64 (बलात्कार), 74 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), 75(2) (यौन उत्पीड़न), 76 (कपड़े उतारने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और 351(3) (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया।

    FIR दर्ज होने के बाद आरोपी नियोक्ता ने FIR को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। उसने तर्क दिया कि आरोप झूठे और अविश्वसनीय थे और ये पहले हुई जबरन वसूली की कार्रवाई से प्रेरित थे।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    शुरुआत में ही, कोर्ट ने FIR रद्द करने के चरण में विवादित तथ्यात्मक आरोपों की जांच करने से इनकार किया। कोर्ट ने जोर दिया कि इन आरोपों की जांच की आवश्यकता है और अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में इनका निर्णायक रूप से निर्धारण नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने गौर किया कि आरोप केवल इलेक्ट्रॉनिक संचार तक सीमित नहीं थे, बल्कि इनमें नियोक्ता के केबिन में कथित शारीरिक हरकतें, यात्रा के दौरान कथित छेड़छाड़, धमकियां और रोजगार संबंध का कथित दुरुपयोग भी शामिल था।

    बेंच ने कहा,

    "शुरुआती चरण में चैट या रिकॉर्डिंग का न होना यह साबित नहीं करता कि आरोप झूठे हैं।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि FIR दर्ज होने के बाद जांच एजेंसी कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन रिकॉर्ड, सब्सक्राइबर विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूत इकट्ठा कर सकती है।

    इसलिए कोर्ट ने माना कि पीड़िता द्वारा ऐसी सामग्री पेश न करने को FIR दर्ज करने से इनकार करने का आधार बनाना पुलिस के लिए उचित नहीं था।

    बेंच ने यह भी कहा,

    "जब पीड़िता संज्ञेय अपराधों की जानकारी लेकर पुलिस के पास जाती है तो उस चरण में कानूनी जांच करने की जिम्मेदारी पीड़िता पर नहीं डाली जा सकती।"

    ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट ने फिर से कहा कि अगर जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का पता चलता है, तो FIR दर्ज करना ज़रूरी है।

    कोर्ट ने निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का भी हवाला दिया और दोहराया कि पुलिस के पास संज्ञेय अपराधों की जांच करने का कानूनी अधिकार और कर्तव्य है।

    बेंच ने कहा:

    "पुलिस को जानकारी दर्ज करनी होती है, आरोपों की जांच करनी होती है और सबूत इकट्ठा करने होते हैं। उन्हें FIR दर्ज करने के चरण में आरोपों के सही या गलत होने का अंतिम फ़ैसला करने की ज़रूरत नहीं होती है।"

    कोर्ट ने आगे यह भी कहा:

    "पुलिस का कर्तव्य है कि वह शिकायत ले, संज्ञेय अपराध होने पर FIR दर्ज करे, निष्पक्ष जांच करे और जांच का नतीजा सक्षम अदालत के सामने रखे। आरोपों की सच्चाई, गवाहों की विश्वसनीयता, सबूतों की स्वीकार्यता और पर्याप्तता, और आरोपी के दोषी या निर्दोष होने के बारे में अंतिम फ़ैसला कानून के अनुसार आपराधिक अदालत को करना होता है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि FIR दर्ज करने से पहले पुलिस द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट केवल पुलिस की शुरुआती राय थी और इसे आरोपों के सही या गलत होने के बारे में अंतिम फ़ैसला नहीं माना जा सकता।

    याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता महिला के ख़िलाफ़ पहले दर्ज की गई जबरन वसूली (Extortion) की FIR का भी हवाला दिया और तर्क दिया कि यौन अपराध के आरोप जवाबी कार्रवाई (Counter-Blast) के तौर पर लगाए गए।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने गौर किया कि दोनों FIR अलग-अलग घटनाओं से संबंधित थीं और पहले से चल रहे मामले का मतलब यह नहीं था कि बाद में लगाए गए आरोप झूठे थे। बेंच ने कहा कि यौन अपराध की शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच कानून के अनुसार की जानी चाहिए।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने FIR को रद्द करने से इनकार किया। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि जब शिकायतकर्ता महिला ने शुरू में पुलिस से संपर्क किया था, तो पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया।

    कोर्ट ने कहा:

    "यह समझना मुश्किल है कि जब शिकायतकर्ता महिला ऐसे आरोपों के साथ संबंधित पुलिस स्टेशन गई, जिनसे पहली नज़र में ही संज्ञेय अपराध का पता चलता था, तो पुलिस ने FIR क्यों दर्ज नहीं की।"

    नतीजतन, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे जांच करें कि FIR क्यों दर्ज नहीं की गई और गाज़ियाबाद के पुलिस कमिश्नर सहित संबंधित पुलिस कर्मियों के आचरण की भी जांच करें। DGP को खास तौर पर यह जांचने का निर्देश दिया गया कि क्या 16 जुलाई, 2026 की पुलिस रिपोर्ट कानूनी और निष्पक्ष शुरुआती जांच के बाद तैयार की गई थी, और क्या शिकायतकर्ता महिला द्वारा WhatsApp चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या सोशल मीडिया का मटीरियल पेश न कर पाने को FIR दर्ज करने से इनकार करने का कानूनी आधार माना जा सकता था।

    DGP को जांच की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने और चार हफ़्ते के भीतर व्यक्तिगत हलफ़नामे के ज़रिए रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया। इस रिपोर्ट में जांचे गए अधिकारियों, उनके स्पष्टीकरण, नतीजों और प्रस्तावित या की गई कार्रवाई का ब्योरा होना चाहिए।

    कोर्ट ने गाज़ियाबाद के पुलिस कमिश्नर को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि जांच "निष्पक्ष, बिना किसी भेदभाव के और कानून के अनुसार" की जाए।

    Case title - Arpit Gupta vs State of U.P. and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 571

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