गैर-कानूनी हिरासत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया 25 हज़ार का मुआवजा, कहा- पुलिस को लगता है कि उनके गलत कामों पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा
Shahadat
8 Jun 2026 10:22 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि पुलिस अधिकारी लगातार नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, यह सोचकर कि उनके गलत कामों पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा। उन्हें लगता है कि हज़ारों उल्लंघनों में से शायद ही कोई नागरिक अपने अधिकारों को लागू करवाने और उन्हें जवाबदेह ठहराने के लिए आगे आएगा।
इस कड़ी टिप्पणी के साथ जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने एक व्यक्ति को 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसे सिर्फ़ एक घरेलू झगड़े के कारण 24 घंटे तक पुलिस हिरासत (लॉकअप) में गैर-कानूनी तरीके से रखा गया था।
बेंच ने अपने 16 पन्नों के आदेश में कहा,
"...जब कोई नागरिक अपने अधिकार को लागू करवाने के लिए आगे आता है और इस कोर्ट में आता है, तो यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उस अधिकार को लागू करें जो संविधान, कानूनों, राज्य सरकार की नीति और हमारी व्याख्या के तहत पहले से ही उसका अधिकार है। आखिरकार, चारों ओर ऐसे अधिकारी हैं जो मानते हैं कि उल्लंघन पर अक्सर किसी का ध्यान नहीं जाएगा।"
संक्षेप में मामला
26 नवंबर 2022 को प्रयागराज के रहने वाले और याचिकाकर्ता (मतंबर मिश्रा) अपने खेतों से घर लौटे। तभी एक पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी सब-इंस्पेक्टर सूर्य प्रकाश दुबे उनके घर में घुसे और उन्हें घसीटते हुए बाहर ले गए, जबकि उन्होंने सिर्फ़ लुंगी और कुर्ता पहना हुआ था।
बिना कोई कारण बताए मिश्रा को पुलिस स्टेशन ले जाया गया और 24 घंटे के लिए लॉकअप में बंद कर दिया गया। हिरासत के दौरान, SI (दुबे) ने उन्हें छोड़ने के बदले 20,000 रुपये की रिश्वत मांगी।
पूरी पुलिस कार्रवाई याचिकाकर्ता के भाई की बहू द्वारा दर्ज कराई गई घरेलू हिंसा की शिकायत के आधार पर शुरू की गई, एक ऐसा मामला जिसमें कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) दर्ज नहीं किया गया।
हाईकोर्ट के सामने SI ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्ता आपसी समझौते के ज़रिए विवाद को सुलझाने के लिए स्वेच्छा से पुलिस चौकी में उनसे मिलने आया था। हालांकि, बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि "आखिरकार दुबे (SI) कोई आध्यात्मिक गुरु, पंच परमेश्वर या समुदाय के नेता नहीं थे", जिनके पास याचिकाकर्ता और उनकी बहू अपनी मर्जी से विवाद के समाधान और सलाह के लिए जाते।
बेंच ने आगे कहा कि एक पुलिस अधिकारी के तौर पर लोग उनसे डरते थे, क्योंकि उनके पास राज्य की ज़बरदस्ती करने वाली ताकत थी, और यह 'असंभव' था कि याचिकाकर्ता अपनी मर्जी से समझौता करने के लिए उनके पास जाते।
इसके अलावा, गैर-कानूनी हिरासत को छिपाने के लिए पुलिस ने मिश्रा को गैर-कानूनी हिरासत से रिहा करने के दो दिन बाद उनके खिलाफ CrPC की धारा 107 और 116 के तहत कार्रवाई शुरू की।
बेंच ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि उसने देखा कि ये कार्यवाही मुख्य रूप से सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए होती है और घरेलू हिंसा के निजी मामले में इनका इस्तेमाल कभी नहीं किया जा सकता।
बेंच ने कहा कि ये कार्यवाही SI-दुबे द्वारा याचिकाकर्ता के साथ किए गए कामों के बचाव का दिखावा करने के लिए "घबराहट में" की गई।
एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने भी विवाद की घरेलू प्रकृति पर विचार किए बिना अनजाने में नोटिस जारी करने के लिए कोर्ट से बिना शर्त माफ़ी मांगी।
इस प्रकार, यह मानते हुए कि SI ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत याचिकाकर्ता के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का लापरवाही से उल्लंघन किया, बेंच ने ऐसे मामलों में उचित कार्रवाई के बारे में विचार किया।
इसने पंकज कुमार शर्मा बनाम दिल्ली सरकार (NCT) और अन्य मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें दिल्ली पुलिस द्वारा आधे घंटे के लिए गैर-कानूनी रूप से हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति को ₹50,000 का मुआवज़ा दिया गया।
इस मामले में यह भी देखा गया कि 'निंदा' (Censure) की प्रशासनिक सज़ा—जिसका पुलिस अधिकारियों के करियर पर कोई खास असर पड़ने की संभावना नहीं है—अधिकारी के लिए पर्याप्त निवारक (Deterrent) नहीं होगी। ऐसे मामलों में, जहां किसी व्यक्ति को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना उसकी आज़ादी से वंचित किया गया हो, वहां आर्थिक मुआवज़े की आवश्यकता होती है।
दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता ने केवल एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा SI के खिलाफ़ जांच का निर्देश मांगा था और औपचारिक रूप से आर्थिक मुआवज़े की मांग नहीं की थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने राहत तय करने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Power) का इस्तेमाल करते हुए कहा कि केवल औपचारिक माँग न होने से कोर्ट मौलिक अधिकार के खुलेआम उल्लंघन को ठीक करने के अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से वंचित नहीं हो जाता।
इसलिए उत्तर प्रदेश राज्य सरकार की 2021 की नीति—जिसमें अवैध पुलिस हिरासत के लिए 25,000 रुपये के मुआवज़े का प्रावधान है—पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (writ of mandamus) जारी किया और राज्य को निर्देश दिया कि वह 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को यह राशि दे।
इसके अलावा, कोर्ट ने मुकदमे के खर्च के तौर पर 10,000 रुपये भी दिए।
बेंच ने राज्य को यह छूट भी दी कि याचिकाकर्ता को दिए गए मुआवज़े और खर्च की राशि की वसूली दोषी पुलिस अधिकारी से उस तरीके से की जा सकती है, जिसे वे उचित समझें, जिसमें उसके वेतन से कटौती करना भी शामिल है।
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को मुआवज़े के लिए नियमित मुकदमा करने और अपनी अवैध हिरासत के संबंध में सक्षम अधिकार क्षेत्र वाले कोर्ट के समक्ष अपना दावा पेश करने की आज़ादी है, यदि कोई मुआवज़ा दिया जाता है तो उसमें पहले से दिए गए तदर्थ (Ad Hoc) मुआवज़े को ध्यान में रखा जाएगा।
Case Title: Matambar Mishra vs The State of U.P. and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 319

