इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1983 के 'सामूहिक बलात्कार' मामले में 3 लोगों को बरी किया, कहा- कोई मेडिकल सबूत नहीं
Shahadat
11 May 2026 9:20 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में 1983 के एक कथित सामूहिक बलात्कार मामले में 3 लोगों को बरी किया। इस मामले में पीड़िता घटनाक्रम के समय 7 महीने की गर्भवती थी।
जस्टिस अवनीश सक्सेना की बेंच ने आरोपियों को 'संदेह का लाभ' दिया। बेंच ने पाया कि FIR दर्ज करने में बिना किसी वजह के देरी हुई और मामले की पुष्टि करने वाले मेडिकल सबूतों की पूरी तरह कमी है।
कोर्ट ने FIR को 'अस्पष्ट' भी बताया, क्योंकि कथित तौर पर पीड़िता के साथ चार लोगों ने बलात्कार किया था, लेकिन FIR में सिर्फ तीन लोगों के नाम थे।
बेंच ने टिप्पणी की,
"...अभियोजन पक्ष के सबूतों से यह भरोसा नहीं होता कि आरोपियों/अपीलकर्ताओं ने बलात्कार किया... उन्हें आरोपों से बरी किया जाता है, क्योंकि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर प्रत्यक्ष और दस्तावेजी सबूतों से बलात्कार के अपराध में आरोपी अपीलकर्ताओं की संलिप्तता साबित नहीं होती।"
उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर 7 महीने की गर्भवती महिला के साथ 4 लोगों ने एक घंटे तक सामूहिक बलात्कार किया होता तो इससे "गंभीर मेडिकल इमरजेंसी" पैदा होने की पूरी संभावना थी, लेकिन मेडिकल रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है।
इसके साथ ही बेंच ने मथुरा के एडिशनल सेशन जज के मई 1984 का फैसला रद्द किया। अपीलकर्ता हेतराम, शंकर और भूदत, जिन्हें मूल रूप से IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया गया था और 7 साल की सज़ा सुनाई गई थी, उन्हें बरी कर दिया गया।
संक्षेप में मामला
अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि 9 मई 1983 को शिकायतकर्ता अपनी बकरियां चराकर घर लौटा तो उसने पाया कि उसका घर अंदर से बंद था। घर की चारदीवारी फांदकर अंदर जाने पर, उसने कथित तौर पर तीन आरोपियों को भागते हुए देखा।
उसकी पत्नी (कथित पीड़िता) उस समय 7 महीने की गर्भवती थी। उसने उसे बताया कि 4 लोगों ने - जिनमें एक अनजान ड्राइवर भी शामिल था - चाकू की नोक पर उसके साथ लगभग एक घंटे तक बलात्कार किया।
FIR कथित घटना के पांच दिन बाद, यानी 14 मई 1983 को दर्ज की गई। ट्रायल के दौरान, प्रॉसिक्यूशन ने FIR दर्ज करने में हुई देरी को इस आधार पर सही ठहराया कि आरोपी/अपीलकर्ताओं से शिकायतकर्ता को डर था, क्योंकि शिकायतकर्ता गाँव में एकमात्र अनुसूचित जाति का परिवार था।
ट्रायल जज ने इस तर्क को मान लिया और आरोपियों को दोषी ठहराया; उन्होंने मुख्य रूप से पति, पीड़िता और एक स्वतंत्र गवाह की आँखों देखी गवाही पर भरोसा किया।
ट्रायल जज ने यह भी कहा कि पीड़िता के हाथों पर जो चोटें थीं, वे शायद सूख गई होंगी; ये चोटें उसे टूटी हुई चूड़ियों की वजह से लगी थीं। ट्रायल कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि चूंकि पीड़िता यौन संबंधों की आदी है (क्योंकि वह शादीशुदा है), इसलिए उसके गुप्तांगों पर कोई चोट नहीं मिली।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हालांकि, हाईकोर्ट को प्रॉसिक्यूशन के केस में कई बड़ी कमियां नज़र आईं। कोर्ट ने FIR में अस्पष्टता को नोट किया और पाया कि मेडिकल सबूत हिंसक गैंगरेप के आरोपों का समर्थन नहीं करते थे।
दरअसल, बेंच ने पाया कि कथित घटना के 5 दिन बाद तैयार की गई मेडिको-लीगल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर या गुप्तांगों पर चोट का कोई निशान नहीं मिला। पैथोलॉजिकल रिपोर्ट ने पुष्टि की कि वह 7 महीने की गर्भवती थी और उसकी प्रेग्नेंसी सामान्य थी। साथ ही उसके शरीर में कोई स्पर्म भी नहीं मिला।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 'लल्लीराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि, हालांकि रेप साबित करने के लिए शारीरिक चोट का होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन जब पीड़िता की गवाही में विश्वसनीयता की कमी होती है, तो चोट का न होना एक अहम पहलू बन जाता है।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के इस दावे को भी खारिज किया कि हमले के दौरान टूटी हुई चूड़ियों की वजह से उसके हाथों से खून बहा था; कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी (IO) को घटनास्थल से कोई टूटी हुई चूड़ी नहीं मिली और डॉक्टर ने भी ऐसी किसी चोट का ज़िक्र नहीं किया।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच इस निष्कर्ष पर पहुंची कि प्रॉसिक्यूशन के सबूतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को बरी किया।
Case title - Hetram and others vs State of UP 2026 LiveLaw (AB) 269

