NLU प्रयागराज जातिगत भेदभाव का मामला: हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने प्रोफेसर की अपील की सुनवाई से खुद को अलग किया

  • NLU प्रयागराज जातिगत भेदभाव का मामला: हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने प्रोफेसर की अपील की सुनवाई से खुद को अलग किया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली ने खुद को उस अपील की सुनवाई से अलग कर लिया, जो एक प्रोफेसर ने सिंगल जज के उस आदेश के खिलाफ दायर की थी, जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज में जाति-आधारित अपमान और भेदभाव के आरोपों की जांच न्यायिक अधिकारियों से कराने का निर्देश दिया गया।

    चीफ जस्टिस भंसाली यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं।

    यह अपील चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने तब आई, जब इससे पहले एक डिवीजन बेंच ने रिट याचिका में आगे की कार्यवाही पर रोक लगाई और न्यायिक अधिकारियों के ज़रिए आरोपों की जांच कराने के सिंगल जज के फैसले पर सवाल उठाया था। बेंच ने कहा कि यूनिवर्सिटी के 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल' (समान अवसर सेल) को, पहली नज़र में, आरोपों की जांच करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि स्पेशल अपील की अगली सुनवाई की तारीख तक रिट-सी में आगे की कार्यवाही रुकी रहेगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर न्यायिक अधिकारियों की रिपोर्ट दाखिल की जाती है तो उसे सीलबंद लिफ़ाफ़े में रखा जाए।

    यह मामला दो छात्रों - एक Ph.D. रिसर्च स्कॉलर और पांचवें सेमेस्टर के B.A. छात्र (जो यूनिवर्सिटी का LL.B. (ऑनर्स) छात्र भी है) - द्वारा लॉ डिपार्टमेंट के हेड और बॉयज़ हॉस्टल के वार्डन (प्रतिवादी नंबर 6/अपीलकर्ता) के खिलाफ उठाए गए मुद्दों से जुड़ा है।

    उनकी शिकायत थी कि प्रतिवादी नंबर 6 (जो अब HC के सामने अपीलकर्ता हैं/डॉ. दीपक शर्मा) ने अपने एकेडमिक और प्रशासनिक अधिकार का इस्तेमाल "जाति-आधारित अपमान और बदले की भावना" के हथियार के तौर पर किया।

    पांचवें सेमेस्टर के छात्र ने 20 अगस्त, 2026 को वाइस-चांसलर को शिकायत सौंपी थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि बार-बार याद दिलाने और और शिकायतें करने के बावजूद यूनिवर्सिटी ने उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की।

    शिकायत में छात्र ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर 6 ने चौथे सेमेस्टर की शुरुआत में टिप्पणी की:

    "जो कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ में सबसे ज़्यादा नंबर लाया है, अब मेरे सब्जेक्ट में भी नंबर लाए"। [जिसने कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ में सबसे ज़्यादा मार्क्स पाए, उसे अब मेरे सब्जेक्ट में भी सबसे ज़्यादा मार्क्स मिलने चाहिए]

    स्टूडेंट ने आगे आरोप लगाया कि उसकी आंसर शीट की सख़्त चेकिंग उसकी जाति की वजह से की गई और दावा किया कि संबंधित फैकल्टी मेंबर ने जाति और रिज़र्वेशन को लेकर सबके सामने अपमानजनक बातें कही थीं।

    शिकायत में ऐसी ही कथित टिप्पणी का ज़िक्र किया गया:

    "तुम तो अच्छे परिवार से हो, तुम्हें रिज़र्वेशन क्यों चाहिए?"

    स्टूडेंट ने रिज़र्व्ड कैटेगरी के तहत नियुक्त फैकल्टी मेंबर के बारे में की गई कथित टिप्पणियों का भी ज़िक्र किया।

    अपने पिछले आदेश में हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि वह आरोपों की सच्चाई पर कोई फ़ैसला नहीं सुना रहा है, और कहा:

    "आरोप गंभीर हैं, इसीलिए ज़रूरी है कि जिस व्यक्ति पर ये आरोप लगाए गए, उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका देने के बाद किसी निष्पक्ष एजेंसी से इनकी जांच कराई जाए।"

    कोर्ट ने यह भी कहा,

    "इस आदेश में कही गई किसी भी बात को आरोपों की सच्चाई पर राय के तौर पर नहीं समझा जाना चाहिए।"

    सिंगल जज ने अर्चना सिंह-I (जज, स्मॉल कॉज़ कोर्ट, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, प्रयागराज) और अरुण कुमार यादव (स्पेशल चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, प्रयागराज) से जांच करने और हाईकोर्ट को रिपोर्ट सौंपने का अनुरोध किया।

    जांच का मकसद यह पता लगाना था कि क्या SC-ST समुदायों के स्टूडेंट्स को रेस्पॉन्डेंट नंबर 6 या यूनिवर्सिटी में काम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जाति-आधारित अपमान या भेदभाव का सामना करना पड़ा है।

    डिविज़न बेंच का आदेश

    डिविज़न बेंच के सामने यह बात रखी गई कि यूनिवर्सिटी में पहले से ही 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल' (समान अवसर सेल) मौजूद है और छात्रों ने खुद ही उस सिस्टम के ज़रिए जांच की मांग की, लेकिन संबंधित व्यक्ति (जिसके खिलाफ शिकायत थी) को उस प्रक्रिया से बाहर रखा गया।

    अपील करने वाले (डॉ. दीपक शर्मा) ने तर्क दिया कि ऐसी स्थितियों में जांच यूनिवर्सिटी के अपने सिस्टम के ज़रिए होनी चाहिए, न कि ज्यूडिशियल अधिकारियों (न्यायिक अधिकारियों) द्वारा।

    दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी ने कहा कि रिट कार्यवाही के दौरान, उसने निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट द्वारा प्रस्तावित समिति के गठन पर सहमति व्यक्त की थी।

    छात्रों के वकील ने भी कहा कि हालांकि उन्होंने शुरू में 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल रेगुलेशंस' के तहत जांच की मांग की, लेकिन जब यूनिवर्सिटी कोर्ट के प्रस्ताव पर सहमत हो गई तो उन्होंने ज्यूडिशियल अधिकारियों द्वारा जांच का विरोध नहीं किया।

    सभी पक्षकारों की बातें सुनने के बाद डिविज़न बेंच ने 23 सितंबर को कहा कि जब यूनिवर्सिटी में 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल' मौजूद था और छात्रों ने खुद ही संबंधित व्यक्ति को छोड़कर उस सेल के ज़रिए जांच की मांग की थी तो प्रथम दृष्टया (पहली नज़र में) ज्यूडिशियल अधिकारियों द्वारा जांच कराने की कोई वजह नहीं थी।

    कोर्ट ने इस प्रकार टिप्पणी की:

    "भले ही आरोप गंभीर प्रकृति के हों, लेकिन ठीक से गठित 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल' के माध्यम से ऐसे आरोपों की जांच करने की यूनिवर्सिटी की शक्ति को छीना नहीं जाना चाहिए, क्योंकि छात्रों के कल्याण का ध्यान रखना और उत्पन्न होने वाली स्थितियों से निपटना यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र में आता है।"

    बेंच ने निर्देश दिया कि यदि जांच रिपोर्ट पहले ही तैयार हो चुकी है, तो उसे अगली तारीख पर विचार के लिए सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।

    इसके बाद डिविज़न बेंच ने निर्देश दिया,

    "स्पेशल अपील की अगली सुनवाई की तारीख तक रिट सी नंबर 37012/2026 में आगे की कार्यवाही पर रोक रहेगी"।

    अपीलकर्ता ने पिछले आदेश के पैराग्राफ 17 में दिए गए निर्देशों पर रोक लगाने की भी मांग की।

    बेंच ने कहा कि इस चरण में उसने केवल जांच के दायरे और लागू नियमों की जांच की। साथ ही अन्य निर्देशों से संबंधित अनुरोध पर अगली तारीख पर विचार किया जा सकता है।

    Case title - Dr. Deepak Sharma vs. State Of U.P. And 6 Others

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