कथित तौर पर 45 साल पहले हुई बिक्री विलेख के आधार पर म्यूटेशन की अनुमति नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

22 March 2026 8:22 PM IST

  • कथित तौर पर 45 साल पहले हुई बिक्री विलेख के आधार पर म्यूटेशन की अनुमति नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि भले ही राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन (नाम परिवर्तन) के लिए कोई समय सीमा निर्धारित न हो, लेकिन कथित तौर पर 45 साल पहले हुई किसी बिक्री विलेख (Sale Deed) के आधार पर इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस चंद्र कुमार राय ने टिप्पणी की:

    "यह बताना महत्वपूर्ण है कि निजी प्रतिवादियों ने 45 साल से भी अधिक समय बाद म्यूटेशन के लिए आवेदन दायर किया। यह आवेदन उस सेल डीड के आधार पर किया गया, जिसके बारे में दावा है कि वह उनके पक्ष में निष्पादित किया गया। इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यद्यपि म्यूटेशन आवेदन दायर करने के लिए कोई समय सीमा नहीं है, लेकिन 45 साल से भी अधिक समय बाद आवेदन दायर करने से विचाराधीन दस्तावेज़ की प्रामाणिकता पर संदेह पैदा होता है।"

    विचाराधीन भूखंडों पर मूल रूप से नाथू सिंह का नाम दर्ज था। 1968 में उनकी मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिसों—याचिकाकर्ताओं और परिवार के अन्य सदस्यों—के नाम रिकॉर्ड में म्यूटेट (दर्ज) किए गए। वर्ष 2012 में टोडी सिंह के वारिसों ने 'उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950' की धारा 229-B के तहत एक मुकदमा दायर किया। इस मुकदमे में उन्होंने भूखंड के आधे हिस्से (½) में सह-हिस्सेदार होने की घोषणा की मांग की। यह मुकदमा खारिज कर दिया गया। इसके बाद दायर अपील भी खारिज हो गई।

    इसके बाद वर्ष 2016 में संजय नामक एक व्यक्ति ने म्यूटेशन के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। यह आवेदन उस बिक्री विलेख के आधार पर किया गया, जिसके बारे में दावा कि उसे वर्ष 1970 में श्री नाथू सिंह द्वारा निष्पादित किया गया। इस आवेदन को खारिज कर दिया गया। इसके उपरांत अन्य प्रतिवादियों द्वारा म्यूटेशन के लिए एक और आवेदन दायर किया गया। यह आवेदन नाथू सिंह द्वारा वर्ष 1968 में निष्पादित एक सेल डीड के आधार पर अपने नाम दर्ज कराने के लिए किया गया। इस आवेदन को स्वीकार कर लिया गया।

    वर्तमान मामले के याचिकाकर्ताओं ने SDO (उप-प्रभागीय अधिकारी) के समक्ष अपील दायर की, जिसे स्वीकार कर लिया गया। अतिरिक्त आयुक्त ने SDO के आदेश के विरुद्ध दायर अपील खारिज की। हालांकि, राजस्व बोर्ड ने SDO और अतिरिक्त आयुक्त—दोनों के आदेशों को रद्द किया और SDM (उप-प्रभागीय मजिस्ट्रेट) को इस मामले पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया। इस आदेश के विरुद्ध याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक मामले 'शार्दुल रंजन और अन्य बनाम उप निदेशक, चकबंदी और अन्य' पर भरोसा किया, जिसमें यह फैसला दिया गया था:

    “हालांकि म्यूटेशन (नाम बदलने) के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई, लेकिन किसी बिना रजिस्टर्ड वसीयत के आधार पर विरासत के मामले में, वसीयत को सामने लाने में हुई देरी से ही उसकी असलियत पर शक पैदा हो जाता है। इन हालात में वसीयत के आस-पास शक पैदा करने वाले हालात थे और वसीयत पेश करने वाले लोग इन शक पैदा करने वाले हालात की कोई संतोषजनक सफाई नहीं दे पाए।”

    यह मानते हुए कि SDO ने 45 साल बाद म्यूटेशन की अर्जी को सही ही खारिज किया, कोर्ट ने फैसला दिया कि म्यूटेशन को अनिश्चित काल तक लटकाकर नहीं रखा जा सकता और इसे जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।

    तदनुसार, कोर्ट ने राजस्व बोर्ड का आदेश रद्द किया और उप-विभागीय अधिकारी का आदेश बरकरार रखा।

    Case Title: Dalbir And 3 Others Versus Board Of Revenue Prayagraj And 18 Others 2026 LiveLaw (AB) 121

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