लखनऊ कोर्ट हिंसा | हाईकोर्ट के आदेश में बदलाव: अब वकीलों की गुप्त जांच IB नहीं, UP Police का इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट करेगा

Shahadat

4 Sept 2026 12:39 PM IST

  • लखनऊ कोर्ट हिंसा | हाईकोर्ट के आदेश में बदलाव: अब वकीलों की गुप्त जांच IB नहीं, UP Police का इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट करेगा

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को लखनऊ कोर्ट हिंसा मामले में स्वतः संज्ञान (suo moto) लेते हुए अपने पिछले आदेश में बदलाव किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन वकीलों पर आरोप लगे हैं, उनके बैकग्राउंड और गतिविधियों की गुप्त जांच इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के बजाय उत्तर प्रदेश पुलिस का इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट करेगा।

    जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने लखनऊ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में 21 जुलाई, 2026 को हुई घटना से जुड़ी स्वतः संज्ञान कार्यवाही में यह आदेश पारित किया।

    यह आदेश तब बदला गया, जब डिप्टी सॉलिसिटर जनरल एस.बी. पांडे ने कोर्ट को बताया कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) का काम और प्रकृति अलग है और कोर्ट द्वारा निर्देशित जांच उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

    कोर्ट ने दर्ज किया:

    "...भारत सरकार के इंटेलिजेंस ब्यूरो का काम और प्रकृति बहुत अलग है। इसलिए हमारे 28.07.2026 के आदेश के पैराग्राफ 43 में जारी निर्देश... के अनुसार कार्रवाई नहीं की जा सकेगी... क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर होगा"।

    इस दलील को स्वीकार करते हुए बेंच ने अपने पिछले निर्देशों में इस प्रकार बदलाव किया:

    "इंटेलिजेंस ब्यूरो के स्थानीय कार्यालय के बजाय यूपी पुलिस का इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट, जिसके प्रमुख डायरेक्टर जनरल हैं, आदेश के अनुसार गुप्त जांच करवाएगा"।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश राज्य, लखनऊ के डायरेक्टर जनरल (इंटेलिजेंस) को विपक्षी पक्ष (Opposite Party) के रूप में शामिल किया जाए और उन्हें आदेश की सूचना दी जाए।

    पृष्ठभूमि: लखनऊ कोर्ट हिंसा

    यह कार्यवाही 21 जुलाई को लखनऊ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट परिसर के अंदर दिल्ली के तीन वकीलों (जिनमें दो महिला वकील शामिल हैं) और उनके क्लाइंट पर कथित हमले से संबंधित है।

    यह मामला लखनऊ बेंच के सामने एक विशेष सुनवाई में तब आया, जब दिल्ली के वकील अभिप्स मोहंती, कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि वकील सौरभ कुमार वर्मा और उनके सहयोगियों ने उन पर हमला किया और उन्हें एक सिविल केस में पेश होने से रोका।

    आरोपों के अनुसार, वकील एक सिविल केस में वकालतनामा (Vakalatnama) दाखिल करने गए, तभी उन्हें कथित तौर पर पेश होने से रोका गया। आरोप है कि उनके क्लाइंट (मोहम्मद शाकिर) के साथ मारपीट और बदसलूकी की गई, जबकि वकीलों का आरोप है कि जब उन्होंने उसे बचाने की कोशिश की तो उन पर भी हमला किया गया।

    इसके बाद हाईकोर्ट ने डिस्ट्रिक्ट जज की रिपोर्ट, पुलिस कमिश्नर की रिपोर्ट, वीडियो फुटेज और CCTV फुटेज पर विचार करने के बाद स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए कार्यवाही शुरू की।

    कोर्ट ने पहले ही कहा था कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह पता चलता है कि आदेश में नामित वकीलों ने "गंभीर पेशेवर कदाचार, कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग, न्यायिक कार्यवाही में गंभीर हस्तक्षेप और न्याय प्रशासन में बाधा" डाली है।

    28 जुलाई के अपने पिछले आदेश में बेंच ने चार वकीलों [सौरभ कुमार वर्मा, हर्षित पांडे, यश पांडे और अभय प्रताप वर्मा] के बैकग्राउंड और गतिविधियों की गुप्त जांच का निर्देश दिया था।

    कोर्ट ने इन चार वकीलों को पिछले 10 वर्षों के अपने इनकम टैक्स रिटर्न, अपनी संपत्ति, व्यवसायों और जीवित परिवार के सदस्यों का विवरण, और पिछले पांच वर्षों के दौरान उनके या उनके परिवार के सदस्यों द्वारा की गई किसी भी संपत्ति की बिक्री, पट्टे या उपहार का विवरण देने का भी निर्देश दिया।

    बेंच ने कहा कि कानूनी बिरादरी के भीतर "काली भेड़ों" (गलत काम करने वालों) की पहचान करना आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि निर्दोष और ईमानदार वकीलों को परेशान न किया जाए।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "हमें काली भेड़ों की पहचान करने और उन्हें जल्द-से-जल्द जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है... जो लोग कैंपस के अंदर या बाहर माहौल खराब करने पर अड़े हैं, उनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए।"

    हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसके निर्देशों का इस्तेमाल "किसी भी निर्दोष और नेक इरादे वाले वकील" को परेशान करने के आधार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

    बेंच ने उन आरोपों को भी दर्ज किया कि वकीलों के कुछ समूह "गुंडों की तरह व्यवहार करते हैं" और संपत्ति हड़पने के लिए वकील के तौर पर अपनी स्थिति और जिला अदालत परिसर में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं।

    यह भी देखा गया कि ऐसे लोग दस्तावेज बनाते हैं, संपत्ति हड़पने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए मुकदमे शुरू करते हैं और अदालतों पर दबाव भी डालते हैं।

    2 सितंबर का आदेश

    नवीनतम आदेश में हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि 28 जुलाई के आदेश के तहत संबंधित वकीलों से अपेक्षित हलफनामे और खुलासे अभी तक दाखिल नहीं किए गए हैं। बेंच ने कहा कि वह अगली तारीख पर इस पहलू पर विचार करेगी।

    कोर्ट ने दो जवाबी हलफनामों को भी रिकॉर्ड पर लिया, जिनमें से एक पुलिस कमिश्नर द्वारा और दूसरा डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस द्वारा दाखिल किया गया। यह मामला अब 15 सितंबर को इससे जुड़े मामलों के साथ सुनवाई के लिए आएगा।

    Case title: Suo Motu Cognizance Of Incident Dated 21/07/2026 In The Court Premises

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