न्यायिक समीक्षा के सीमित आधार और 20 साल की देरी: हाईकोर्ट ने अंबेडकर नगर निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की
Shahadat
14 Oct 2026 8:21 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (जिसमें अलापुर निर्वाचन क्षेत्र को अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित करना भी शामिल है) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।
बेंच ने कहा कि याचिका न्यायिक हस्तक्षेप के लिए आधार स्थापित करने में विफल रही और इसे परिसीमन आदेश पारित होने के लगभग दो दशक बाद दायर किया गया।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने स्पष्ट किया कि परिसीमन आयोग द्वारा पारित आदेश की न्यायिक समीक्षा केवल दो सीमित आधारों तक ही सीमित है:
• विधायी क्षमता का अभाव; और
• संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत किसी मौलिक अधिकार या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन।
कोर्ट ने याचिका दायर करने में देरी के संबंध में प्रतिवादियों की आपत्ति में भी दम पाया। कोर्ट ने गौर किया कि परिसीमन आदेश दिसंबर 2006 में प्रकाशित किया गया था, और तब से इसके आधार पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव कराए गए।
मामले का संक्षिप्त विवरण
याचिकाकर्ता (दिलीप कुमार) अंबेडकर नगर जिले के जहांगीरगंज के निवासी हैं और वहां के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक के मतदाता हैं। उन्होंने जिले के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन और आरक्षण को संशोधित और सही करने के निर्देश देने की मांग की।
उन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों के बीच जनसंख्या वितरण को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि यह संविधान के अनुच्छेद 170(2) और परिसीमन अधिनियम, 2002 का उल्लंघन करता है। उन्होंने अलापुर को अनुसूचित जाति निर्वाचन क्षेत्र के रूप में आरक्षित करने पर भी सवाल उठाया।
2001 की जनगणना का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग 16.62 करोड़ थी और 403 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र थे, जिसके परिणामस्वरूप प्रति निर्वाचन क्षेत्र औसत जनसंख्या लगभग 4,12,402 थी।
उन्होंने आंतरिक परिसीमन दिशानिर्देशों का हवाला दिया, जो औसत जनसंख्या से प्लस या माइनस 10% के विचलन की अनुमति देते हैं और तर्क दिया कि स्वीकार्य जनसंख्या सीमा लगभग 3,71,178 से 4,53,642 होनी चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, जलालपुर की आबादी 4,60,245 थी, जो तय ऊपरी सीमा से ज़्यादा थी, जबकि अकबरपुर की आबादी 3,68,722 थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि अकबरपुर और अलापुर जैसे छोटे निर्वाचन क्षेत्रों से इलाके निकालकर जलालपुर और कटेहरी जैसे बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में मिला दिए गए, जिससे आबादी का असंतुलन और बढ़ गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि अलापुर में अनुसूचित जाति की आबादी 26.90% थी, जबकि जलालपुर में यह 26.43% थी।
उन्होंने कहा कि अगर अलापुर में अशरफ़पुर किछौछा नगर पंचायत को शामिल किया जाता तो वहां अनुसूचित जाति की आबादी का प्रतिशत 26.39% होता, इसलिए उस निर्वाचन क्षेत्र को सामान्य सीट माना जाना चाहिए।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
न्यायिक समीक्षा के दायरे की जांच करते हुए बेंच ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 10(2) का ज़िक्र किया। यह धारा राजपत्र (गजट) में प्रकाशित परिसीमन आदेशों को अंतिम मानती है और कहती है कि आम तौर पर ऐसे आदेशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से नहीं हो सकती। हालांकि, अदालत ने कहा कि न्यायिक जांच केवल दो आधारों तक सीमित है: विधायी क्षमता की कमी और संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन।
जगदीश सिंह बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले के फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि परिसीमन आयोग का आदेश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि कानून के समान होता है। न्यायिक समीक्षा की स्वीकार्य सीमाओं के अलावा, इस पर 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (Mandamus) या 'सर्टिओरारी' (Certiorari) लागू नहीं होती है।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने कमीशन की तरफ से कानूनी अधिकार की कमी के बारे में न तो कोई दलील दी और न ही इसे साबित किया।
उनका मामला मुख्य रूप से अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या के आंकड़ों और अनुसूचित जाति के प्रतिशत की दोबारा गणना पर आधारित है।
बेंच ने माना कि ऐसी प्रक्रिया असल में कार्यप्रणाली और तकनीकी निर्धारण का मामला है जो परिसीमन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है और इससे अपने आप में किसी मौलिक अधिकार या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं होता है।
कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 170(2) के तहत जनसंख्या और सीटों के बीच अनुपात को "जहां तक संभव हो" बनाए रखना ज़रूरी है, जिससे आयोग को भौगोलिक निकटता, प्रशासनिक सीमाओं और अन्य संबंधित बातों को ध्यान में रखने की छूट मिलती है।
इसने माना कि प्लस या माइनस 10% के अंतर की अनुमति देने वाले आंतरिक दिशानिर्देश केवल दिशानिर्देश थे, न कि कानूनी रूप से अनिवार्य नियम जिन्हें 'रिट ऑफ़ मैंडमस' के ज़रिए सख्ती से लागू किया जा सके।
बेंच ने कहा कि अगर कोई अंतर साबित भी हो जाए तो भी वह अपने आप में परिसीमन को असंव इसने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति की जनसंख्या के तुलनात्मक प्रतिशत के आधार पर यह तय किया जाना चाहिए कि कौन सी सीट आरक्षित होनी चाहिए।
जगदीश सिंह और चंद्र मणि प्रसाद बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि तुलनात्मक जनसंख्या के आधार पर आरक्षित सीटों को बदलना या उनका पुनर्वितरण करना संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है और हाईकोर्ट अपनी रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए ऐसा करने का निर्देश नहीं दे सकता।
बेंच ने इस आरोप को भी मानने से इनकार किया कि क्षेत्रीय इकाइयों का स्थानांतरण सत्ता के दुर्भावनापूर्ण या असंवैधानिक इस्तेमाल को दर्शाता है।
इसने कहा कि परिसीमन में स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय इकाइयों का पुनर्गठन शामिल होता है। इस प्रक्रिया को केवल इसलिए दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता, क्योंकि किसी मतदाता ने कोई अलग गणना की, जिसे वह ज़्यादा उचित मानता है।
बेंच ने कहा कि दो दशकों से लागू चुनावी व्यवस्था को बदलना अनुचित और जनहित के खिलाफ होगा, खासकर तब जब 2026 की जनगणना पूरी होने वाली हो और सामान्य प्रक्रिया के तहत नया परिसीमन हो सकता हो।
याचिका में स्वीकार्यता या गुण-दोष के आधार पर कोई दम न पाते हुए हाईकोर्ट ने बिना किसी खर्च के आदेश के इसे खारिज किया।
Case Title : Dileep Kumar vs. Union of India,Thru. Secy. Ministry of Law and Justice New Delhi and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 839

