दो दशक बाद भी भर्ती का परिणाम घोषित करना जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने KGMU को दिए औसत इंटरव्यू अंक के आधार पर परिणाम घोषित करने के निर्देश
Praveen Mishra
2 Nov 2026 3:28 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) को निर्देश दिया कि यदि वर्ष 2005 की भर्ती प्रक्रिया में याचिकाकर्ता के इंटरव्यू के अंक उपलब्ध रिकॉर्ड से सत्यापित नहीं हो पाते हैं, तो उसी चयन प्रक्रिया के उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर औसत इंटरव्यू अंक निर्धारित कर उसका परिणाम घोषित किया जाए।
जस्टिस इरशाद अली की पीठ ने कहा कि एक बार भर्ती प्रक्रिया शुरू हो जाने और अभ्यर्थियों के निर्धारित चयन चरणों में शामिल होने के बाद सक्षम प्राधिकारी का दायित्व है कि वह प्रक्रिया को कानूनी रूप से अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाए।
कोर्ट ने कहा कि अंतिम परिणाम घोषित करना सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का अनिवार्य हिस्सा है। केवल समय बीत जाने या पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के आधार पर परिणाम को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
दरअसल, 11 जनवरी 2005 को दैनिक जागरण में प्रकाशित विज्ञापन के जरिए KGMU ने ग्रुप 'C' और ग्रुप 'D' के पदों पर आवेदन आमंत्रित किए थे। इनमें जूनियर क्लर्क/टाइपिस्ट के 40 पद शामिल थे।
याचिकाकर्ता ने 4 अगस्त 2005 को टाइपिंग टेस्ट में हिस्सा लिया था। इसके बाद 29 अक्टूबर 2005 को इंटरव्यू बोर्ड के सामने भी उपस्थित हुई थी। 25 अक्टूबर 2005 को जारी नोटिफिकेशन में इंटरव्यू के लिए बुलाए गए अभ्यर्थियों की सूची में उनका रोल नंबर क्रम संख्या 3 पर दर्ज था।
हालांकि, चयन प्रक्रिया के बाद कोई अंतिम परिणाम घोषित नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें 9 नवंबर 2005 को पता चला कि 40 पदों में से 21 पदों पर नियुक्तियां कर दी गईं, लेकिन पूरी चयन प्रक्रिया का परिणाम सार्वजनिक नहीं किया गया। इनमें सामान्य श्रेणी के 9 पद भी शामिल थे। उन्होंने आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया में मनमाने तरीके से कुछ अभ्यर्थियों को चुना गया और पूरी मेरिट सूची घोषित नहीं की गई।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख करते हुए पूरी चयन प्रक्रिया का अंतिम परिणाम घोषित करने की मांग की। 21 नवंबर 2005 को हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि की गई नियुक्तियां आगे के आदेशों के अधीन रहेंगी।
KGMU ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान KGMU की ओर से दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के दायरे से बाहर ग्रुप 'C' पदों पर सीधी भर्ती के लिए लागू वर्ष 2002 के नियमों और 2003 के संशोधन के तहत टाइपिंग टेस्ट केवल क्वालिफाइंग प्रकृति का था।
चयन सूची टाइपिंग टेस्ट और इंटरव्यू सहित निर्धारित अंकों के आधार पर तैयार की जानी थी। विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने 51.4 अंक प्राप्त किए थे, जबकि सामान्य श्रेणी में अंतिम चयनित अभ्यर्थी के 57.02 अंक थे।
KGMU ने यह भी तर्क दिया कि वर्ष 2005 की भर्ती होने के कारण अब केवल वही रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, जिन्हें खोजा जा सका है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंटरव्यू के लिए बुलाए गए अभ्यर्थियों की सूची में नाम शामिल होने मात्र से किसी अभ्यर्थी को चयन सूची में स्थान पाने का अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी विज्ञापन के जरिए पदों की घोषणा होने से प्रत्येक रिक्त पद को भरना अनिवार्य नहीं हो जाता। हालांकि, यह सवाल अलग है कि शुरू की गई चयन प्रक्रिया को कानूनी रूप से पूरा किया गया या नहीं।
विश्वविद्यालय द्वारा पेश किए गए मूल रिकॉर्ड में कोर्ट को चयन का कोई अंतिम परिणाम नहीं मिला। इस पर कोर्ट ने कहा कि जब अंतिम चयन सूची या चयन के परिणाम को प्रमाणित करने वाला कोई समकालीन दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, तो केवल जवाबी हलफनामे में बताए गए अंकों को निर्णायक या पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद दोबारा इंटरव्यू कराना या नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करना न तो व्यावहारिक है और न ही मांगी गई सीमित राहत के लिए जरूरी। ऐसी स्थिति में रिकॉर्ड की कमी को मनमाने अनुमान के बजाय वस्तुनिष्ठ तरीके से पूरा किया जाना चाहिए।
औसत इंटरव्यू अंक देने का निर्देश
कोर्ट ने निर्देश दिया कि KGMU पहले उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच करे और यह पता लगाए कि क्या याचिकाकर्ता के इंटरव्यू के वास्तविक अंक विश्वसनीय दस्तावेजों से निर्धारित किए जा सकते हैं। यदि ऐसा संभव नहीं होता है, तो उसी भर्ती प्रक्रिया में इंटरव्यू देने वाले अन्य अभ्यर्थियों के उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर याचिकाकर्ता को औसत इंटरव्यू अंक दिए जाएं। विश्वविद्यालय को औसत अंक की गणना और उसके आधार को लिखित रूप में दर्ज करना होगा।
इसके बाद लागू भर्ती नियमों के अनुसार याचिकाकर्ता के कुल अंक निर्धारित कर कारणों सहित उनका परिणाम घोषित किया जाए। हाईकोर्ट ने इसके लिए आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से तीन महीने का समय दिया।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश केवल याचिकाकर्ता का परिणाम घोषित करने तक सीमित है। इससे उन्हें नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं मिलेगा। न ही विश्वविद्यालय को सभी 40 पद भरने या पहले से की गई नियुक्तियों में बदलाव करने का निर्देश दिया गया है।
इन्हीं टिप्पणियों और निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया।

