पुलिस-राजस्व अधिकारियों की अनदेखी से बेअसर हो रहे सिविल कोर्ट के आदेश, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई गंभीर चिंता
Amir Ahmad
3 Sept 2026 1:38 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के आदेशों और डिक्री के प्रति पुलिस तथा राजस्व अधिकारियों के रवैये पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि हाल के समय में ऐसा चलन देखने को मिल रहा है जिसमें सिविल कोर्ट की डिक्री महज इसलिए बेअसर हो जाती है क्योंकि पुलिस और राजस्व अधिकारी उसके आदेशों को कोई महत्व नहीं देते।
जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने विश्व जाट संघ चैरिटेबल एंड रिलीजियस ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। मामला ट्रस्ट की उस संपत्ति से जुड़ा था, जिस पर उसके कब्जे की रक्षा के लिए सिविल कोर्ट ने स्थायी निषेधाज्ञा जारी की थी।
ट्रस्ट के पक्ष में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) ने वर्ष 2020 में स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री पारित की। इसके तहत एक पक्ष को ट्रस्ट के कब्जे में हस्तक्षेप करने, उसे संपत्ति से बेदखल करने, संपत्ति को नष्ट या हस्तांतरित करने तथा उसे खोदने या नुकसान पहुंचाने से रोक दिया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि डिक्री के बावजूद लगातार उसकी अवहेलना होती रही। यहां तक कि हाईकोर्ट के बाद के आदेश से भी ट्रस्ट के संपत्ति संबंधी अधिकारों की रक्षा की गई।
खंडपीठ ने कहा कि सामान्य स्थिति में याचिकाकर्ताओं को डिक्री के क्रियान्वयन के लिए सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए, यदि आम जनता और राज्य के अधिकारी कानून तथा सामान्य मूल अधिकार क्षेत्र वाले सिविल कोर्ट की स्थिति को समझते।
कोर्ट ने पुलिस और राजस्व अधिकारियों के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाल में ऐसा चलन सामने आया, जिसमें सिविल कोर्ट की डिक्री अर्थहीन हो रही हैं, क्योंकि राज्य के पुलिस और राजस्व अधिकारी सिविल कोर्ट को लगभग कोर्ट ही नहीं मानते और उसके आदेशों तथा डिक्री को कोई प्रभाव नहीं देते।
खंडपीठ ने कहा कि अधिकारी ऐसी डिक्री और आदेशों के साथ खिलवाड़ करते हैं। यहां तक कि जब कोई सिविल कोर्ट का जज अपने आदेश को लागू कराने के लिए कदम उठाता है तो अधिकारी प्रशासनिक आधार पर हाईकोर्ट में शिकायत तक कर देते हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ता पहले भी हाईकोर्ट पहुंचे थे। तब राज्य की ओर से दी गई जानकारी में बताया गया कि स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री पहले ही पारित हो चुकी है। पुलिस और जिला प्रशासन यह सुनिश्चित कर रहे थे कि सिविल कोर्ट के आदेश का पालन हो और संपत्ति का कब्जा किसी तीसरे पक्ष को सौंपने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।
उस समय यह भी बताया गया कि ट्रस्ट संपत्ति पर कब्जे में है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता कब्जे में बने रहेंगे और संपत्ति का उपयोग तथा उसका लाभ लेते रहेंगे। किसी तीसरे पक्ष की ओर से किसी कृत्य से परेशानी होने पर उन्हें कानून के अनुसार स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री का क्रियान्वयन कराने की बात कही गई।
लेकिन वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि सिविल कोर्ट की डिक्री और हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद ट्रस्ट को संपत्ति पर निर्माण कराने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।
इस पर खंडपीठ ने कहा,
“सिविल कोर्ट की एक डिक्री और इस कोर्ट का एक आदेश भी याचिकाकर्ताओं को शांति दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं रहा।”
कोर्ट ने कहा कि पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह चौबीसों घंटे यह सुनिश्चित करे कि याचिकाकर्ताओं के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप न हो। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और अंततः याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट की डिक्री तथा हाईकोर्ट के आदेश को लागू कराने के लिए मथुरा के जिलाधिकारी के पास जाना पड़ा।
खंडपीठ ने इस स्थिति को “सर्वोच्च स्तर की दुस्साहस और अवमानना” करार दिया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी को निर्देश दिया कि सिविल कोर्ट की डिक्री और 4 फरवरी 2026 के हाईकोर्ट के आदेश का पूरी तरह और बिना किसी चूक के पालन सुनिश्चित किया जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि किसी भी परिस्थिति में कोई व्यक्ति वादग्रस्त संपत्ति के आसपास भी न पहुंच सके। इसके लिए जरूरत पड़ने पर चौबीसों घंटे पुलिस बल तैनात करने का भी निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सिविल कोर्ट की डिक्री और उसके आदेशों को पुलिस को हर हाल में लागू करना होगा। कोर्ट ने अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं के संपत्ति संबंधी अधिकारों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप न हो।


