बेदखली के खिलाफ अपील में देरी को माफ़ करने से पहले भी किरायेदार को अंतरिम सुरक्षा दी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

25 Aug 2026 8:05 PM IST

  • बेदखली के खिलाफ अपील में देरी को माफ़ करने से पहले भी किरायेदार को अंतरिम सुरक्षा दी जा सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालत की अपील में अंतरिम सुरक्षा देने की शक्ति केवल इसलिए खत्म नहीं होती कि उस अपील के साथ देरी को माफ़ करने (Condonation of Delay) की अर्ज़ी पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावित अपील के विषय-वस्तु (Subject Matter) को सुरक्षित रखने का आदेश, उस अपील को सुनने या उस पर फैसला करने के आदेश से अलग होता है।

    जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,

    "देरी को माफ़ करने की अर्ज़ी का लंबित होना, अपने आप में अपीलीय अदालत को उचित सुरक्षात्मक आदेश पारित करने की शक्ति से वंचित नहीं करता, जब परिस्थितियां प्रस्तावित अपील के विषय-वस्तु को सुरक्षित रखने की मांग करती हों।"

    याचिकाकर्ता-मकान मालिक ने U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 की धाराओं 4(3), 4(7) और 21(2) के तहत कानपुर नगर के रेंट अथॉरिटी में प्रतिवादी-किरायेदारों की बेदखली और किराये की बकाया राशि के लिए अर्ज़ी दी थी। किराये का मामला 2 सितंबर 2025 को मंज़ूर कर लिया गया। किरायेदारों ने कानपुर नगर के एडिशनल ज़िला जज, कोर्ट नंबर 9 में अपील की और अपील के साथ देरी को माफ़ करने और अंतरिम सुरक्षा के लिए अर्ज़ियाँ भी दाखिल कीं।

    पक्षकारों को पहले मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेजा गया। इस बीच रेंट अथॉरिटी के आदेश के तहत कार्रवाई आगे बढ़ गई, जिसमें 25 मार्च 2026 को अमीन परवाना (बेलिफ़ को डिक्री-धारक को संपत्ति का कब्ज़ा सौंपने का निर्देश देने वाला वारंट) जारी किया गया। यह मानते हुए कि अन्यथा अपील निष्फल (Infructuous) हो सकती है, अपीलीय अदालत ने उस आदेश पर रोक लगाई।

    हाईकोर्ट के सामने मकान मालिक ने तर्क दिया कि जब तक देरी माफ़ नहीं की जाती, तब तक कोई अंतरिम सुरक्षा नहीं दी जा सकती। उन्होंने मध्यस्थता केंद्र की रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि मध्यस्थता समाप्त हो गई और पक्षकार इसे आगे बढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं, यह कहते हुए कि जिस आधार पर अपीलीय अदालत ने कार्रवाई की थी, वह अब मौजूद नहीं है। उनके वकील ने इस बात का खंडन नहीं किया कि रिपोर्ट कभी भी अपीलीय अदालत के सामने पेश नहीं की गई।

    कोर्ट ने कहा कि हालाँकि देरी से की गई अपील को कानून के अनुसार समय-सीमा (Limitation) की बाधा को पार करना होता है, लेकिन उस सवाल के लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत इस बीच विषय-वस्तु को इस तरह बदलने दे जिसे बाद में ठीक न किया जा सके, जिससे अपील का उपाय ही बेकार (Illusory) हो जाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसी सुरक्षा से यह तय नहीं होता कि बताई गई वजह काफ़ी है या नहीं, और न ही इससे अपील करने वाले को कोई ठोस अधिकार मिलता है।

    हालांकि, कोर्ट ने चेतावनी दी कि यह अधिकार सीमा (लिमिटेशन) से बचने का ज़रिया नहीं है; सुरक्षा बनाए रखने का अधिकार क्षेत्र सुरक्षात्मक और अस्थायी होता है, जबकि अपील पर फ़ैसला करने का अधिकार क्षेत्र तब शुरू होता है जब ज़रूरी शुरुआती शर्तें पूरी हो जाती हैं।

    आगे कहा गया,

    “यह फ़र्क़ अहम है और इसे बनाए रखना ज़रूरी है, ताकि अपील के ज़रिए मिलने वाले उपाय को असरदार बनाए रखने के लिए दिया गया कोई आदेश, देर से की गई अपील के लिए ज़रूरी कानूनी शर्तों को दरकिनार करने का ज़रिया न बन जाए।”

    मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि अपीलीय कोर्ट ने अपील के गुण-दोष (मेरिट्स) पर न तो सुनवाई की थी और न ही कोई फ़ैसला सुनाया था; उसने बस यह देखकर सुरक्षा बढ़ा दी थी कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसके तहत कार्रवाई शुरू हो गई। इसलिए कोर्ट ने माना कि उसके आदेश का मतलब न तो देरी को माफ़ करना था और न ही यह तय करना था कि अपील सुनवाई के लायक है।

    मध्यस्थता केंद्र (मेडिएशन सेंटर) की रिपोर्ट पर कोर्ट ने उस आदेश की समीक्षा करने से इनकार किया, जो ऐसी सामग्री के आधार पर मांगा जा रहा था जिसे आदेश देने वाले कोर्ट के सामने कभी पेश ही नहीं किया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    “अपीलीय कोर्ट द्वारा अपने विवेक का इस्तेमाल सही था या नहीं, इसका आकलन उन तथ्यों और हालात के आधार पर किया जाना चाहिए जो आदेश देते समय उसके सामने थे, न कि बाद में कोई ऐसा अहम दस्तावेज़ पेश करके जिसके बारे में उसे पहले पता ही नहीं था।”

    कोर्ट ने कहा कि ऐसी सामग्री के बाद में मिलने पर अपीलीय कोर्ट से ही संपर्क किया जा सकता है, लेकिन इससे अधिकार क्षेत्र में कोई कमी या साफ़ तौर पर कोई गलती साबित नहीं होती। कोर्ट ने माना कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधिकार क्षेत्र निगरानी का है, न कि अपील सुनने का; इसलिए कोर्ट सिर्फ़ इसलिए अपनी राय नहीं थोपेगा, क्योंकि कोई दूसरी राय भी संभव हो सकती है।

    इस तरह स्टे (रोक) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज हो गई।

    आखिर में मांगी गई सीमित राहत पर कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए रेंट ट्रिब्यूनल/अपीलीय कोर्ट को निर्देश दिया कि वे देरी माफ़ करने की अर्ज़ी पर जल्द से जल्द फ़ैसला लें और उसके बाद अपील का निपटारा करें। यह काम, आदेश की सर्टिफाइड कॉपी पेश किए जाने के साठ दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। इसमें 2021 के एक्ट की धारा 33(2) का ध्यान रखा जाए। किसी भी पक्ष को बेवजह सुनवाई टालने (एडजर्नमेंट) की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।

    Case Title: Neelabh Gupta vs. Purshottam Das Gupta And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 622

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