रिटायरमेंट के समय लिया गया 'इंडेंनिटी बॉन्ड' राज्य को गलत तरीके से तय किए गए वेतन की वसूली करने का अधिकार नहीं देता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
18 Oct 2026 9:13 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी से उसके रिटायरमेंट के समय लिया गया कोई 'अंडरटेकिंग' या 'इंडेंनिटी बॉन्ड' राज्य को इस बात का अधिकार नहीं देता कि वह वेतनमान गलत तरीके से तय होने के कारण दिए गए अतिरिक्त वेतन की वसूली कर सके। ऐसी वसूली केवल तभी की जा सकती है, जब वह 'अंडरटेकिंग' वेतन तय करते समय ही दी गई हो, जिसे बाद में गलत पाया गया हो।
'पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बनाम जगदेव सिंह' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा:
"जगदेव सिंह मामले में यह स्पष्ट किया गया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी ने वेतनमान तय करते समय कोई 'अंडरटेकिंग' दी थी, तो उस 'अंडरटेकिंग' के आधार पर अतिरिक्त दी गई राशि की वसूली की जा सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रिटायरमेंट के समय लिया गया कोई भी 'अंडरटेकिंग' या 'इंडेंनिटी बॉन्ड' राज्य को वसूली करने का अधिकार दे देगा। जगदेव सिंह मामले में जिस 'अंडरटेकिंग' को आधार माना गया, वह वही 'अंडरटेकिंग' है, जो वेतनमान तय करते समय दी गई थी, जिसे बाद में गलत बताया गया।"
याचिकाकर्ता को कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया, बाद में वह हेड कांस्टेबल के पद पर प्रमोट हुआ और 31.07.2021 को रिटायर हो गया। उसके रिटायरमेंट से जुड़े भुगतान तब तक रोक दिए गए, जब तक कि उसने 29.09.2021 को एक 'अंडरटेकिंग' नहीं दी। इसमें उसने सहमति दी थी कि पेंशन और ग्रेच्युटी मंजूर होने पर यदि उसे कोई अतिरिक्त राशि मिल गई तो वह उसे वापस कर देगा।
27.07.2022 के एक पत्र के जरिए, यूपी पुलिस मुख्यालय के फाइनेंस कंट्रोलर ने मुरादाबाद स्थित 9वीं बटालियन PAC के कमांडेंट को बताया कि याचिकाकर्ता का वेतन 01.01.2016 तक सही तरीके से 39,200 रुपये तय किया गया। इसे 01.07.2016 से संशोधित करके 40,400 रुपये किया जाना चाहिए, लेकिन गलती से इसे 41,600 रुपये तय कर दिया गया। कमांडेंट ने 24.02.2010 से वेतनमान को फिर से निर्धारित (री-फिक्स) किया। 24.02.2023 के एक आदेश के जरिए, याचिकाकर्ता को मिलने वाली 9,36,083 रुपये की पेंशन राशि में से 6,74,404 रुपये की अतिरिक्त (एक्सेस) रकम वसूल कर ली गई, जिससे उसके पास 2,61,679 रुपये बचे।
इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बाद में उसे अपनी याचिका में संशोधन करने की अनुमति मिल गई, ताकि वह वेतनमान को फिर से निर्धारित करने वाले आदेशों को भी चुनौती दे सके। 'सुशील कुमार सिंघल बनाम प्रमुख सचिव, सिंचाई विभाग व अन्य' और 'उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य बनाम भीम सेन शर्मा' मामलों का हवाला देते हुए उसने तर्क दिया कि गलत वेतन निर्धारण के कारण हुए किसी भी अतिरिक्त भुगतान को रिटायरमेंट के बाद क्लास-III या क्लास-IV कर्मचारी से वसूल नहीं किया जा सकता। उसने यह भी कहा कि इसके बाद राज्य वेतनमान को फिर से निर्धारित नहीं कर सकता, और पेंशन की गणना अंतिम प्राप्त वेतन के आधार पर ही की जानी चाहिए।
राज्य के स्टैंडिंग काउंसिल ने 'चंडी प्रसाद उनियाल व अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य' मामले का हवाला देते हुए कहा कि अतिरिक्त भुगतान की गई रकम करदाताओं का पैसा है, जिसे राज्य अपनी गलती सुधारते हुए वापस वसूल कर सकता है। उन्होंने 'पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बनाम जगदेव सिंह' मामले का भी जिक्र किया और कहा कि याचिकाकर्ता अपने द्वारा दिए गए वचन (अंडरटेकिंग) से बंधा हुआ था। उन्होंने बताया कि 16.01.2007 के सरकारी आदेश को 07.05.2007 के एक अन्य आदेश के जरिए स्पष्ट किया गया, जो सुनवाई के बाद गलत भुगतान को सुधारने की अनुमति देता है।
कोर्ट ने गौर किया कि 16.01.2007 के सरकारी आदेश में इस तरह के पुन: निर्धारण (री-फिक्सेशन) के लिए सेवानिवृत्ति की तारीख से 34 महीने की अधिकतम समय-सीमा तय की गई। साथ ही 'सुशील कुमार सिंघल' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह के एक सरकारी आदेश पर विचार करते हुए यह माना कि रिटायरमेंट के बाद न तो गलती से दिए गए वेतन की वसूली की जा सकती है और न ही पेंशन को कम किया जा सकता है।
कोर्ट ने 'पंजाब राज्य व अन्य' मामले में बताई गई उन स्थितियों पर भी ध्यान दिया, जिनमें वसूली करना अनुमत नहीं है। रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर) मामले के संदर्भ में, जिसमें क्लास-III और क्लास-IV कर्मचारियों तथा रिटायर कर्मचारियों से वसूली की गई, रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि इनमें से कोई भी फैसला पलट दिया गया हो।
कोर्ट ने कहा,
“इसके अलावा, 07.05.2007 के सरकारी आदेश में यह स्पष्ट किया गया कि यदि वेतन का पुन: निर्धारण (Re-Fixation) आवश्यक हो तो संबंधित अधिकारियों का यह दायित्व है कि वे एक नोटिस जारी करें, स्पष्टीकरण देने का उचित अवसर दें। उसके बाद ही पुन: निर्धारण या वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाएं। लेकिन, इस मामले में न तो कोई नोटिस जारी किया गया और न ही याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का कोई अवसर दिया गया; बल्कि, सीधे याचिकाकर्ता के पेंशन लाभों में से कटौती करने का आदेश पारित कर दिया गया।”
अदालत ने वेतन के इस पुन: निर्धारण को अमान्य ठहराते हुए 27.07.2022, 22.08.2022 और 24.02.2023 के आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के आठ सप्ताह के भीतर 6,74,404 रुपये की राशि, 8% वार्षिक ब्याज के साथ वापस की जाए। याचिकाकर्ता की पेंशन का निर्धारण सेवानिवृत्ति के समय उसे मिले अंतिम वेतन के आधार पर किया जाना है।
इस प्रकार, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
Case Title : Suraj Singh v. State Of U.P. And 2 Others

