'पढ़ाई पर ध्यान दें': इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के खिलाफ बार-बार बेबुनियाद याचिकाएं दायर करने पर हाईकोर्ट ने छात्र को चेतावनी दी, अपील खारिज की
Shahadat
20 Oct 2026 11:20 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक BA छात्र की अपील खारिज की। छात्र ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के खिलाफ अपनी याचिकाएं खारिज होने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने उसे बेबुनियाद याचिकाएं दायर करने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि ऐसे मामले दायर करने पर उसके खिलाफ सख्त आदेश दिए जा सकते हैं।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने पाया कि छात्र का इरादा अपनी पढ़ाई करने का नहीं, बल्कि पढ़ाई से इतर गतिविधियों में शामिल होने का लग रहा था।
कोर्ट ने कहा,
"इस अपील में कोई दम नहीं है; इसलिए इसे खारिज किया जाता है। अपीलकर्ता को चेतावनी दी जाती है कि वह इस कोर्ट में बेबुनियाद याचिकाएं दायर न करे, वरना कोर्ट ऐसे आदेश देने के लिए मजबूर हो जाएगा जो अपीलकर्ता के लिए कई तरह से नुकसानदेह हो सकते हैं।"
बेंच ने अपने आदेश में यह भी कहा कि उन्होंने अपीलकर्ता को ऐसी "बेबुनियाद कानूनी कार्यवाही" से दूर रहने और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह दी थी, लेकिन "उसने कोर्ट के सुझावों पर कभी ध्यान नहीं दिया।"
मामले का संक्षिप्त विवरण
अपीलकर्ता ने 2022-23 शैक्षणिक सत्र में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से जुड़े एक कॉलेज में 3 साल के BA डिग्री कोर्स में दाखिला लिया था। 2024 में हुई BA पार्ट-I की परीक्षाओं में फेल होने के बाद, उसने अपनी पढ़ाई आगे नहीं बढ़ाई।
इसके बाद वह हाईकोर्ट पहुंचा और कई मांगें रखीं, जिनमें शामिल थीं: पहले साल की परीक्षा रद्द करना, फेल हुए छात्रों को दूसरे साल में प्रमोट करना, यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में बदलाव, लड़कों के हॉस्टल का नवीनीकरण और आवंटन, कथित व्यवस्थागत खामियों की जांच के लिए रिटायर्ड जजों की स्वतंत्र समिति का गठन और मानसिक परेशानी के लिए 5 लाख रुपये का मुआवजा।
इससे पहले, सिंगल जज ने इन मांगों को "अस्पष्ट और ठोस तर्कों के अभाव" के कारण खारिज कर दिया था।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर छात्र की मार्कशीट बिना किसी ठोस कारण के रोकी गई है तो उसे दी जानी चाहिए। साथ ही यूनिवर्सिटी के नियमों के अनुसार और किसी कानूनी बाधा के न होने पर, उसे 2026 में सप्लीमेंट्री या नई परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जा सकती है। इस आदेश से असंतुष्ट होकर, छात्र ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर की, जिसमें 164 दिनों की देरी थी।
डिवीजन बेंच ने देरी को माफ़ किया, क्योंकि प्रतिवादियों ने देरी को माफ़ करने के आवेदन का कोई विरोध नहीं किया। इसके बाद बेंच ने अपील के गुण-दोषों (Merits) पर विचार करना शुरू किया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
बेंच ने पाया कि रिट याचिका में मांगी गई 6 राहतों में से कोई भी अपीलकर्ता की किसी विशिष्ट शिकायत से संबंधित नहीं थी, सिवाय उस हिस्से के जिसमें उसने दूसरे वर्ष में प्रमोट (Promotion) किए जाने की मांग की थी।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अन्य मांगी गई राहतें बहुत ही सामान्य और अस्पष्ट हैं। कोर्ट की राय में अपीलकर्ता इनका दावा नहीं कर सकता, क्योंकि वह B.A. पार्ट-I में फेल हो गया और उसने आगे कभी पढ़ाई ही नहीं की।"
बेंच ने यह भी गौर किया कि रिट याचिका में मार्कशीट से जुड़ी कोई राहत नहीं मांगी गई, जबकि अपीलकर्ता को मार्कशीट पहले ही जारी की जा चुकी थी।
कोर्ट ने आगे कहा कि सिंगल जज ने छात्र के प्रति काफी उदारता दिखाई, क्योंकि उन्होंने उसे सप्लीमेंट्री या नई परीक्षा में बैठने का मौका दिया—हालांकि यह B.A. पार्ट-I में फेल होने के कारण पैदा हुई कानूनी बाधाओं के अधीन है।
अपील के आधारों और दलीलों को देखने के बाद बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता का अपनी पढ़ाई जारी रखने का कोई इरादा नहीं लगता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"ऐसा लगता है कि वह पढ़ाई-लिखाई से इतर अन्य गतिविधियों में शामिल रहने में ही अधिक खुश है।"
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि अपीलकर्ता ने विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे और कामकाज को लेकर कई सुझाव दिए, जिनमें पानी और बिजली की सुविधा, शौचालय, करियर-उन्मुख पाठ्यक्रम, समय पर दाखिले, लाइब्रेरी की किताबें, क्लासरूम और डिजिटल बोर्ड शामिल थे।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि छात्र ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों पर आरोप लगाए थे और अपनी अपील में सिंगल जज के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया।
हालांकि, बेंच ने कहा कि वह उस भाषा को अपने आदेश में दोहराना नहीं चाहती।
कोर्ट ने अपीलकर्ता को यह कहते हुए माफ़ कर दिया,
"वह अभी 12वीं पास एक युवा लड़का है, जिसे कोर्ट की कार्यवाही की मर्यादाओं के बारे में बहुत कम या कोई जानकारी नहीं है।"
हाईकोर्ट ने सिंगल जज के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार न पाते हुए अपील खारिज की और छात्र को भविष्य में इस तरह के बेबुनियाद मुकदमेबाजी से दूर रहने की चेतावनी दी।
Case Title : XYZ vs. University of Allahabad through its Registrar and 4 others 2026 LiveLaw (AB) 862

