मेरिट-बेस्ड सेलेक्शन से लेकर महिलाओं की भागीदारी तक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी स्टेट लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति पर गाइडलाइंस जारी कीं

  • मेरिट-बेस्ड सेलेक्शन से लेकर महिलाओं की भागीदारी तक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी स्टेट लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति पर गाइडलाइंस जारी कीं

    इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने सोमवार को उत्तर प्रदेश में स्टेट लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति के लिए 8-पॉइंट वाली सख्त गाइडलाइंस जारी कीं।

    कोर्ट ने राज्य सरकार को सख्ती से निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि सिलेक्शन प्रोसेस पारदर्शी और मेरिट-बेस्ड हो और महिला वकीलों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले (अगर वे उपलब्ध हों)।

    कोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिया कि नियुक्ति करने से पहले अधिकारियों की ज़रूरत का आकलन करे और चुने जाने वाले लोगों की प्रोफेशनल ईमानदारी और आपराधिक बैकग्राउंड की जांच करे।

    कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जहां तक ​​संभव हो, सिलेक्शन प्रोसेस (जिसमें योग्यता के नियम और आकलन शामिल हैं) को सार्वजनिक किया जाए।

    जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की बेंच ने ये गाइडलाइंस 3 जुड़े हुए मामलों की सुनवाई के दौरान जारी कीं। इन मामलों में उत्तर प्रदेश में सरकारी वकीलों और अन्य स्टेट लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति को लेकर चिंताएं जताई गई थीं।

    उल्लेखनीय है कि तीनों रिट याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि राज्य सरकार स्टेट लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति के लिए गाइडलाइंस बनाए।

    ये निर्देश सरकारी वकील, एडिशनल सरकारी वकील, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल, एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल, स्टैंडिंग काउंसिल और ब्रीफ होल्डर्स (सिविल और क्रिमिनल) पर लागू होंगे।

    मामलों की पृष्ठभूमि

    2017 में राज्य सरकार ने सरकारी वकीलों की एक लिस्ट जारी की थी, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इसके बाद राज्य सरकार ने 23 अक्टूबर 2017 को एक संशोधित लिस्ट जारी की।

    2022 में एक और PIL (जनहित याचिका) दायर की गई, जिसमें लगभग वैसी ही चिंताएं जताई गईं और 'स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम बृजेश्वर सिंह चहल' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का पालन करने की मांग की गई।

    इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और निष्पक्ष बनाने के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दे। राज्य सरकार से यह भी बताने को कहा गया कि क्या उसने ज़रूरत, योग्यता, समान अवसर और सिलेक्शन प्रोसेस के पैमानों का आकलन किया। एक याचिकाकर्ता ने राज्य की 2023 की लिस्ट को इस आधार पर चुनौती दी कि उसने 2017 में स्टेट लॉ ऑफिसर के तौर पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, बड़ी संख्या में सरकारी वकील नियुक्त करने से पहले राज्य ने कोई सार्वजनिक सूचना या विज्ञापन जारी नहीं किया और न ही ज़रूरत का कोई निष्पक्ष आकलन किया।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    अपने 38 पन्नों के आदेश में, हाई कोर्ट ने राज्य के इस तर्क पर विचार किया कि बृजेश्वर सिंह चहल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश पर लागू नहीं किया जा सकता।

    बेंच इस बात से सहमत थी कि चहल मामले का फ़ैसला यूपी पर यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग तथ्यात्मक और नियामक ढांचे पर विचार किया।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि उत्तर प्रदेश में पहले से ही 'लीगल रिमेंब्रेंसर मैनुअल' है जो नियुक्तियों को नियंत्रित करता है और राज्य के पास उम्मीदवारों की जांच-परख के लिए एक समिति भी है।

    हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भले ही स्टेट लॉ ऑफिसर्स की संख्या और नियुक्ति का तरीका राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है, फिर भी नियुक्तियां योग्यता के आधार पर ही होनी चाहिए।

    बेंच ने टिप्पणी की,

    "हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि हम स्टेट लॉ ऑफिसर्स की कुल संख्या या उनकी नियुक्ति के तरीके पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं; यह पूरी तरह से राज्य का काम है; लेकिन जो भी तरीका अपनाया जाए, यह दिखाया जाना चाहिए कि नियुक्तियां केवल योग्यता के आधार पर की गई थीं, न कि किसी अन्य वजह से।"

    अपने आदेश में कोर्ट ने पाया कि राज्य ऐसा कोई पर्याप्त सबूत पेश करने में नाकाम रहा जिससे यह पता चले कि उसने राज्य के मुकदमों को प्रभावी ढंग से लड़ने के लिए ज़रूरी स्टेट लॉ ऑफिसर्स की अनुमानित संख्या तय करने के लिए कोई ठोस आकलन किया।

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि लॉ ऑफिसर्स की संख्या तय करने में राज्य के पास अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल "मनमाने ढंग से, यांत्रिक रूप से या सिर्फ़ खुश करने के मकसद से" नहीं किया जा सकता, और न ही इसकी वजह से सरकारी खजाने पर बोझ डालकर अनावश्यक या ज़रूरत से ज़्यादा नियुक्तियां करने की इजाज़त दी जा सकती है।

    बेंच ने आगे कहा कि जब ऐसे अधिकार के इस्तेमाल पर सवाल उठाया जाता है तो राज्य को नियुक्तियां करने के लिए अपनाए गए आधार, मानदंड और तरीके को साबित करने में सक्षम होना चाहिए। बेंच ने 'लीगल रिमेंब्रेंसर मैनुअल' में गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों की कमी पर भी चिंता जताई।

    कोर्ट ने गौर किया कि स्टैंडिंग काउंसिल के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के बारे में जानकारी मांगने वाली एक RTI अर्जी के जवाब में सवाल को 'गुमराह करने वाला' बताया गया।

    कोर्ट ने कहा कि उसे यह समझ नहीं आया कि राज्य विधि अधिकारी (State Law Officer) के तौर पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति के आपराधिक रिकॉर्ड की जांच को गुमराह करने वाला कैसे माना जा सकता है।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि LR मैनुअल में राज्य विधि अधिकारी की नियुक्ति या पद पर बने रहने के लिए, उनके खिलाफ लंबित गंभीर आपराधिक मामलों के आधार पर किसी अयोग्यता का ज़िक्र नहीं था, और न ही ऐसे व्यक्ति की उपयुक्तता के आकलन के बारे में ठीक से बताया गया।

    कोर्ट ने ज़ोर दिया कि राज्य विधि अधिकारी राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और न्याय दिलाने में कोर्ट की मदद करता है, इसलिए उनकी नियुक्ति में ईमानदारी, आपराधिक रिकॉर्ड, पेशेवर आचरण और जनता के भरोसे जैसी बातों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

    बेंच ने टिप्पणी की,

    "अगर आम वकीलों के आपराधिक रिकॉर्ड की जांच ज़रूरी है, तो राज्य विधि अधिकारियों की जांच कम स्तर पर करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। बल्कि, यह मानक और ऊंचा होना चाहिए।"

    बेंच ने छह मुख्य स्थायी वकीलों (Chief Standing Counsels) की नियुक्ति की भी समीक्षा की। उसने देखा कि लीगल रिमेंब्रेंसर मैनुअल के पैरा 5.01 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए एक और उसकी लखनऊ बेंच के लिए एक मुख्य स्थायी वकील का प्रावधान है, इसके अलावा सरकार जितने चाहे उतने स्थायी वकील नियुक्त कर सकती है।

    कोर्ट ने कहा कि उसके सामने मौजूद जानकारी से यह पता नहीं चल सका कि 6 मुख्य स्थायी वकील क्यों नियुक्त किए गए, क्योंकि राज्य ने इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।

    साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उचित मामले में हाईकोर्ट के काम के बोझ और प्रशासनिक ज़रूरतों के आधार पर एक से ज़्यादा मुख्य स्थायी वकील नियुक्त करना सही ठहराया जा सकता है।

    बेंच ने कहा कि ऐसी किसी भी नियुक्ति के लिए वास्तविक ज़रूरत और काम के बोझ का उचित और निष्पक्ष आकलन होना ज़रूरी है।

    हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का मकसद पहले से की गई नियुक्तियों पर बुरा असर डालना या उन्हें बदलना नहीं था। कोर्ट ने कहा कि भविष्य में नियुक्तियां करते समय बताई गई कमियों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    आखिरकार, कोर्ट ने 8 दिशानिर्देश तय किए और निर्देश दिया कि राज्य सरकार राज्य विधि अधिकारियों की नियुक्ति करते समय इनका सख्ती से पालन करे।

    दिशानिर्देश इस प्रकार हैं:

    1. राज्य से जुड़े मुकदमों को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए ज़रूरी राज्य विधि अधिकारियों की संख्या का ज़रूरत-आधारित आकलन करें।

    2. योग्यता और चयन के लिए साफ़, निष्पक्ष और पारदर्शी नियम तय करें, जिसमें पेशेवर अनुभव, क्षमता, ईमानदारी, व्यवहार और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाए।

    3. यह पक्का करें कि आपराधिक रिकॉर्ड या खराब व्यवहार वाले लोगों को स्टेट लॉ ऑफिसर के तौर पर नियुक्त न किया जाए।

    4. LR मैनुअल के पैरा 4.19 के तहत काम के बोझ का आकलन करने की प्रक्रिया को सिर्फ़ आपराधिक मामलों तक सीमित न रखकर सभी तरह के मामलों के लिए लागू करें।

    5. यह पक्का करें कि चयन और नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया, जिसमें योग्यता के नियम और आकलन शामिल हैं, पारदर्शी हो और जहाँ तक संभव हो, उसे सार्वजनिक किया जाए।

    6. महिला वकीलों की उपलब्धता के आधार पर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दें।

    7. यह ज़रूरी करें कि स्टेट लॉ ऑफिसर के ख़िलाफ़ दर्ज किसी भी FIR या आपराधिक मामले की जानकारी और ज़रूरी कार्रवाई के लिए उसे बिना देरी के एडवोकेट जनरल को भेजा जाए।

    8. यह ज़रूरी करें कि अगर कोई स्टेट लॉ ऑफिसर राज्य के ख़िलाफ़ पेश हो रहा है (खासकर तब जब राज्य खुद एक पक्ष या विरोधी पक्ष हो), तो वह सक्षम अधिकारी से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) ले और उसे वकालतनामा के साथ लगाए।

    कोर्ट ने साफ़ किया कि राज्य के ख़िलाफ़ प्रतिनिधित्व से जुड़ी पाबंदी 'ब्रीफ़ होल्डर्स' पर लागू नहीं होगी और यह LR मैनुअल के संबंधित प्रावधान के अधीन रहेगी।

    कोर्ट ने राज्य सरकार को यह जांचने का भी निर्देश दिया कि क्या कोई स्टेट लॉ ऑफिसर अपने पद पर रहते हुए बार एसोसिएशन या बार काउंसिल का चुनाव लड़ सकता है या उसमें हिस्सा ले सकता है।

    कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह उचित फ़ैसला लेने से पहले संबंधित लोगों से सलाह-मशविरा करे और ज़रूरत पड़ने पर उचित निर्देश जारी करे।

    कोर्ट ने इसी तरह इन तीनों संबंधित याचिकाओं का निपटारा किया।

    Case Title : Mahendra Singh Pawar vs. State of U.P. Thru. Prin.Secy to the C.M. and 2 others and 2

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story