धर्म की आज़ादी का मतलब यह नहीं कि ईसाई समुदाय कब्रिस्तान के लिए ज़मीन का कोई खास टुकड़ा मांग सके: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
13 Oct 2026 8:23 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि धर्म की आज़ादी के अधिकार (जिसमें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार भी शामिल है) के तहत किसी समुदाय को कब्रिस्तान बनाने के लिए स्थानीय निकाय की ज़मीन के किसी खास टुकड़े पर दावा करने का अधिकार नहीं मिलता।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने 'क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी' की रिट याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। सोसाइटी ने गाजियाबाद में बंजर ज़मीन के एक टुकड़े को ईसाई कब्रिस्तान में बदलने की अपनी अर्जी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा कि ग्राम सभा या स्थानीय निकाय को सौंपी गई ज़मीन को कब्रिस्तान के तौर पर इस्तेमाल के लिए सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन में बदलना असल में एक प्रशासनिक फैसला है, जिसमें कई कारकों और परिस्थितियों पर विचार करना होता है।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को ऐसी ज़मीन (जो सार्वजनिक उपयोग की नहीं है) को सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन में बदलने की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, जिसे अदालत में लागू करवाया जा सके।
बेंच ने आगे कहा कि अगर वाकई जगह की कमी हो और उस इलाके में रहने वाले नागरिकों के व्यापक और विविध जनहित को ध्यान में रखते हुए अधिकारी ऐसी अर्जी पर विचार कर सकते हैं तो वह एक अलग बात होगी।
मामले का संक्षिप्त विवरण
सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत रजिस्टर्ड याचिकाकर्ता सोसाइटी ने अपने अध्यक्ष विनय कुमार पॉल के ज़रिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। इसके बताए गए उद्देश्यों में से एक ईसाइयों के अंतिम संस्कार में मदद करना है।
यह विवाद गाजियाबाद ज़िले की मोदी नगर तहसील के जलालबाद परगना के विसोखर गांव में स्थित 0.3420 हेक्टेयर ज़मीन से जुड़ा था। सरकारी रिकॉर्ड में यह ज़मीन बंजर (ऊसर) ज़मीन के तौर पर दर्ज थी।
सोसाइटी का तर्क था कि आस-पास के इलाके में रहने वाले ईसाइयों को अंतिम संस्कार करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, क्योंकि बेगमाबाद बुडाना में मौजूद ईसाई कब्रिस्तान में जगह कम पड़ रही थी। यह बताया गया कि मोदी नगर की नगर पालिका परिषद के बोर्ड ने 22 जनवरी, 2018 को प्रस्ताव संख्या 11 पास किया, जिसमें ईसाई कब्रिस्तान के लिए ज़मीन आवंटित करने का प्रस्ताव था।
यह प्रस्ताव ज़िला अधिकारियों को भेजा गया, लेकिन ज़मीन को प्रस्तावित मकसद के लिए बदला या आरक्षित नहीं किया गया।
इसके बाद सोसाइटी ने अधिकारियों को कई बार अपनी बात रखी और सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मामले से जुड़ी जानकारी हासिल की।
इससे पहले भी उसने ईसाई समुदाय को ज़मीन का इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर करने की इजाज़त देने के निर्देश की मांग करते हुए जनहित याचिका (PIL) के ज़रिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
उन कार्यवाही में हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद गाज़ियाबाद के अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) ने इस साल जनवरी में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77(2) के तहत अनुरोध खारिज किया।
उस आदेश को चुनौती देते हुए सोसाइटी हाईकोर्ट पहुंची और तर्क दिया कि उपयुक्त ज़मीन आवंटित न करने से उसके सदस्यों के धर्म की आज़ादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है, जिसका एक हिस्सा अंतिम संस्कार करना भी है।
दूसरी ओर, ज़िला अधिकारियों का कहना था कि ज़मीन बंजर के तौर पर दर्ज थी और खाली पड़ी थी और पारंपरिक रूप से किसी भी समुदाय द्वारा इसका इस्तेमाल कब्रिस्तान के तौर पर नहीं किया जाता था।
हालांकि, उप-मंडल मजिस्ट्रेट की एक रिपोर्ट में स्थानीय निवासियों और समुदायों की अर्जियों का ज़िक्र किया गया, जिनमें यह आशंका जताई गई कि ईसाई समुदाय को ज़मीन आवंटित करने से भविष्य में सांप्रदायिक मतभेद पैदा हो सकते हैं।
यह भी बताया गया कि पास में ही पहले से एक ईसाई कब्रिस्तान मौजूद है और उसका इस्तेमाल हो रहा है।
इन हालात को देखते हुए ज़िला अधिकारियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि उस चरण में विवादित ज़मीन को ईसाई कब्रिस्तान के लिए आवंटित करने का कोई औचित्य नहीं है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
उत्तर प्रदेश रेवेन्यू कोड, 2006 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि गाँव सभा या स्थानीय निकाय को सौंपी गई ज़मीन को सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन में बदला जा सकता है, लेकिन यह असल में एक प्रशासनिक फ़ैसला है जिसमें कई तरह की स्थितियों और कारकों पर विचार किया जाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है, जिसके तहत वह गाँव सभा या स्थानीय निकाय के पास मौजूद ज़मीन के किसी खास हिस्से को कब्रिस्तान के लिए सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन में बदलने की माँग कर सके।
धार्मिक स्वतंत्रता के बारे में सोसाइटी की दलील पर बेंच ने माना कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा हो सकता है।
हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि इस अधिकार का दावा इस तरह से नहीं किया जा सकता कि सोसाइटी या ईसाई समुदाय के सदस्य स्थानीय निकाय के पास मौजूद ज़मीन के किसी खास हिस्से को ईसाई कब्रिस्तान के लिए आरक्षित करने की ज़िद कर सकें।
कोर्ट ने इस तरह टिप्पणी की:
"यह सच है कि याचिकाकर्ता यह कह सकता है कि अपने धर्म के नियमों के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार उनके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है, लेकिन इस अधिकार का दावा इस तरह से नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ता या ईसाई समुदाय के सदस्य स्थानीय निकाय के पास मौजूद ज़मीन के किसी खास हिस्से को ईसाई कब्रिस्तान बनाने के मकसद से आरक्षित करने की माँग कर सकें।"
इसलिए उस खास ज़मीन के लिए की गई मांग खारिज करने वाला आदेश रद्द करने का कोई कानूनी आधार न मिलने पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।
Case Title : Christian Community Welfare Society vs. State of U.P. and Others 2026 LiveLaw (AB) 834

