Fair Compensation Act | राज्य सरकार के पास कानूनी अधिकार के बिना ज़मीन अधिग्रहण रद्द होने पर DM के अर्ध-न्यायिक आदेश पर रोक लगाने की शक्ति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
11 Aug 2026 6:48 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013' की धारा 24 के तहत अधिग्रहण के रद्द होने (lapse) के दावे पर ज़िला मजिस्ट्रेट (DM) का फ़ैसला अर्ध-न्यायिक प्रकृति का होता है, और राज्य सरकार किसी कार्यकारी आदेश से उस पर रोक नहीं लगा सकती या उसे रद्द नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि धारा 24 राज्य सरकार को समीक्षा (review) की कोई शक्ति नहीं देती है।
जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस कुणाल रवि सिंह की बेंच ने कहा,
"एक बार ऐसा अर्ध-न्यायिक आदेश पारित हो जाने के बाद इसे केवल कानून द्वारा निर्धारित तरीके से ही बदला जा सकता है, जैसे कि अपील, पुनरीक्षण (revision), या सक्षम अदालत द्वारा न्यायिक समीक्षा के माध्यम से, यदि कानून इसकी अनुमति देता है। 2013 के अधिनियम की धारा 24 राज्य सरकार को उस प्रावधान के तहत पारित आदेश की समीक्षा करने या उसे रद्द करने की कोई शक्ति नहीं देती है।"
अधिनियम की धारा 24 उन अधिग्रहणों से संबंधित है, जो 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894' के तहत शुरू किए गए थे लेकिन नए अधिनियम के लागू होने पर अधूरे रह गए।
धारा 24(1)(a) के तहत, जहां पुराने अधिनियम की धारा 11 के तहत कोई अवार्ड (मुआवज़ा तय करने का आदेश) नहीं दिया गया, वहां मुआवज़ा तय करने के लिए केवल 2013 के अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं।
धारा 24(2) के तहत, जहां 2013 के अधिनियम के लागू होने से पाँच साल या उससे अधिक समय पहले ऐसा अवार्ड दिया गया, लेकिन भौतिक कब्ज़ा नहीं लिया गया या मुआवज़ा नहीं दिया गया तो कार्यवाही को रद्द (lapse) माना जाता है।
याचिकाकर्ताओं की ज़मीन मुरादाबाद के गाँव मनोहरपुर में तीन गाटा (भूखंड) मिलाकर लगभग 0.410 हेक्टेयर मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (MDA) के लिए 2000 में अधिसूचित 9.270 हेक्टेयर अधिग्रहण का हिस्सा थी। उनके तीन गाटा के लिए कभी कोई अवार्ड नहीं दिया गया; 2006 और 2009 में पारित दो अवार्ड अधिग्रहण के अन्य हिस्सों से संबंधित थे। 02.04.2003 के कब्ज़ा ज्ञापन (possession memo) में दर्ज किया गया कि पूरी 9.270 हेक्टेयर ज़मीन का कब्ज़ा ले लिया गया... अनुमानित मुआवज़े का 80% हिस्सा, यानी 1.07 करोड़ रुपये, सरकारी खजाने में जमा किया गया।
2013 का एक्ट लागू होने के बाद याचिकाकर्ताओं ने मुरादाबाद के कलेक्टर के पास आवेदन किया और दावा किया कि ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है। 24.03.2014 के सरकारी आदेश में ज़िला मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया गया कि वे ऐसे दावों पर विस्तृत आदेश (Speaking Orders) के ज़रिए फ़ैसला लें। ज़िला मजिस्ट्रेट ने 26.06.2014 को अधिग्रहण को खत्म घोषित कर दिया, लेकिन एक डिवीज़न बेंच ने MDA को नोटिस न दिए जाने के कारण 07.10.2014 को उस आदेश को रद्द कर दिया और मामले को कलेक्टर के पास वापस भेज दिया ताकि वे दोनों पक्षों की बात सुनकर नए सिरे से फ़ैसला ले सकें।
मामला वापस आने पर ज़िला मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया, दोनों पक्षों की बात सुनी और 16.01.2015 के विस्तृत आदेश में फिर से माना कि धारा 24(2) के तहत अधिग्रहण खत्म हो चुका है। पुणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम हरकचंद मिसरीमल सोलंकी मामले का हवाला देते हुए उन्होंने माना कि खजाने में मुआवज़े का 80% जमा करना ज़मीन मालिकों को भुगतान नहीं था, और संयुक्त निरीक्षण के बाद तहसील की रिपोर्ट के आधार पर यह माना कि ज़मीन का भौतिक कब्ज़ा याचिकाकर्ताओं के पास ही रहा।
MDA ने हाईकोर्ट में उस आदेश को चुनौती नहीं दी। उसने रिट याचिका दायर करने की अनुमति के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखा, लेकिन राज्य सरकार ने इसके बजाय 31.03.2015 को आदेश जारी कर ज़िला मजिस्ट्रेट के आदेश पर तुरंत रोक लगाई और 30.01.2015 के सरकारी आदेश के तहत आगे की कार्रवाई का निर्देश दिया; यह आदेश बाद में जारी किया गया और इसमें अधिग्रहण खत्म होने के दावों पर फ़ैसला लेने के लिए नई प्रक्रिया तय की गई।
दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि राज्य सरकार ने ऐसी अपीलीय शक्ति का इस्तेमाल किया, जो कानून में उन्हें नहीं दी गई। MDA ने तर्क दिया कि धारा 24(2) यहां लागू नहीं होती, क्योंकि धारा 11 के तहत कभी कोई अवार्ड (मुआवज़े का फ़ैसला) जारी नहीं किया गया, और ज़िला मजिस्ट्रेट के पास अधिग्रहण खत्म होने के दावे पर फ़ैसला लेने का कोई अधिकार क्षेत्र ही नहीं है।
Case Title: Kishan Lal Ahuja and another v. State of U.P. and 4 others 2026 LiveLaw (AB) 567


