बिक्री की रकम को लेकर विवाद से रजिस्टर्ड सेल डीड अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • बिक्री की रकम को लेकर विवाद से रजिस्टर्ड सेल डीड अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि खरीदार द्वारा बिक्री की रकम के भुगतान को लेकर हुए विवाद के आधार पर ही 'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' की धारा 54 के तहत किसी रजिस्टर्ड सेल डीड को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि जिस विक्रेता को भुगतान न मिलने की शिकायत है, उसे पैसे की वसूली के लिए मुकदमा करना चाहिए, न कि इस आधार पर सेल डीड रद्द करवाना चाहिए।

    'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' की धारा 54 बिक्री को इस तरह परिभाषित करती है: कीमत के बदले मालिकाना हक का ट्रांसफर, चाहे वह कीमत चुका दी गई हो, जिसका वादा किया गया हो, या जिसका कुछ हिस्सा चुका दिया गया हो और कुछ हिस्से का वादा किया गया हो।

    जस्टिस अब्दुल शाहिद ने कहा,

    "यह स्पष्ट है कि उक्त सेल डीड के संबंध में खरीदार द्वारा वादी/अपीलकर्ता को बिक्री की पूरी रकम का भुगतान कर दिया गया। यदि पैसे को लेकर कोई विवाद है तो अपीलकर्ता/वादी को पैसे की वसूली के लिए उचित सिविल कार्यवाही शुरू करने का अधिकार है। 'ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882' की धारा 54 को देखते हुए मौजूदा सेल डीड को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता।"

    अपीलकर्ता-वादी ने 10.12.2008 की रजिस्टर्ड सेल डीड के ज़रिए हापुड़ ज़िले की धौलाना तहसील के हसनपुर लोधा गाँव में लगभग 3.34 हेक्टेयर ज़मीन प्रतिवादी कंपनी को बेची थी। उसने दावा किया कि तय दर 44,25,000 रुपये प्रति बीघा थी, यानी कुल 5,84,24,750 रुपये का भुगतान 20 मासिक किश्तों में किया जाना था और कब्ज़ा पूरी रकम के भुगतान के बाद ही दिया जाना था।

    उसने दावा किया कि कीमत के तौर पर दिए गए चेक बाउंस हो गए और उसे केवल 2,13,20,000 रुपये ही मिले, जबकि 3,71,04,750 रुपये बकाया रह गए। उसने सेल डीड रद्द करने के लिए मुकदमा किया और तर्क दिया कि बिना भुगतान के और धोखाधड़ी से हासिल की गई डीड से कोई मालिकाना हक नहीं मिलता।

    कंपनी ने बताई गई दर और कुल रकम के दावे को नकारते हुए कहा कि ज़मीन 800 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से बेची गई। 2,13,76,000/- रुपये की पूरी कीमत मिल गई और डीड (दस्तावेज़) बनने के दिन ही कब्ज़ा सौंप दिया गया। उनका तर्क था कि डीड रद्द करने का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

    ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज किया और पहली अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद वादी ने हाई कोर्ट में दूसरी अपील की।

    अदालत ने देखा कि डीड में ही पूरी कीमत मिलने और मौके पर ही कब्ज़ा सौंपने की बात लिखी थी। अदालत ने पाया कि वादी ने जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान माना कि डीड में जो कुछ भी लिखा वह सही है, बिना किसी आपत्ति के कंपनी के नाम पर म्यूटेशन (मालिकाना हक का ट्रांसफर) हो गया और विवाद सिर्फ़ पैसे का था, न कि सेल डीड का।

    इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 91 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जब किसी रजिस्टर्ड सेल डीड रद्द करने की मांग की जाती है तो डीड में लिखी बातों पर ही ध्यान दिया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा,

    "वादी/अपीलकर्ता द्वारा अपनी शिकायत और बयान में कही गई बातें, जिनका सेल डीड की सामग्री से कोई लेना-देना नहीं है, उन पर इस सिविल मुकदमे में विचार नहीं किया जा सकता।"

    दहीबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली और रज़िया बेगम बनाम नफीसा बेगम अब्दुल हामिद के मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का ज़िक्र किया कि डीड बनने और रजिस्टर होने के साथ ही मालिकाना हक ट्रांसफर हो जाता है और कीमत का कुछ हिस्सा न मिलने पर भी बिक्री वैध रहती है; ऐसे में विक्रेता के पास बचा हुआ पैसा वसूलने का ही उपाय होता है।

    यह देखते हुए कि रजिस्टर्ड दस्तावेज़ को सही माना जाता है और इसे केवल मज़बूत सबूतों से ही गलत साबित किया जा सकता है। यह भी कि ढाई साल तक बिना किसी आपत्ति के कंपनी के नाम पर म्यूटेशन रहा, अदालत ने माना कि वादी अपना पक्ष साबित करने में नाकाम रहा।

    इसके अनुसार, कानून के अहम सवाल का जवाब अपीलकर्ता के खिलाफ देते हुए अदालत ने दूसरी अपील खारिज कर दी और निचली दोनों अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा।

    Case Title : Devendra Singh v. Great Home Developers Pvt. Ltd

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story