गुज़ारा-भत्ता न देने से पत्नी का जीवन बदहाल हो जाता है, जो आर्टिकल 21 के तहत सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

11 Aug 2026 10:40 AM IST

  • गुज़ारा-भत्ता न देने से पत्नी का जीवन बदहाल हो जाता है, जो आर्टिकल 21 के तहत सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते कहा कि गुज़ारा-भत्ता न देने से पत्नी की हालत बदतर हो जाती है, जो आर्टिकल 21 के तहत मिली संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन है। इस गारंटी में सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है।

    कोर्ट ने आगे कहा कि गुज़ारा-भत्ता यह पक्का करता है कि पत्नी को तंगहाली या बदहाली की ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर न होना पड़े, क्योंकि ऐसी स्थिति आर्टिकल 21 के तहत मिले सम्मान के अधिकार के ख़िलाफ़ होगी।

    जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने ये बातें तब कहीं जब वे पति की एक क्रिमिनल रिविज़न याचिका को खारिज कर रहे थे। पति ने गौतम बुद्ध नगर की फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे CrPC की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी को हर महीने ₹20,000 गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया।

    संक्षेप में मामला

    जोड़े की शादी जुलाई 2017 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई। पत्नी का आरोप था कि उससे और दहेज (जिसमें स्विफ्ट कार और 100 वर्ग गज का प्लॉट शामिल था) की मांग को लेकर परेशान किया गया और उसके साथ क्रूरता की गई।

    उसने आरोप लगाया कि 30 मार्च 2018 को उसके पति और उसके परिवार वालों ने उसके साथ मारपीट की और उसे घर में बंद किया, जिसके बाद उसने पुलिस को सूचना दी। 2 अप्रैल 2018 से वह अपने मायके में रह रही थी और उसने दावा किया कि वह अपने बूढ़े और आर्थिक रूप से कमज़ोर पिता पर निर्भर है।

    पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि उसका पति एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और लगभग ₹70,000 प्रति माह कमाता है। उसके और उसके परिवार के पास कई संपत्तियां और व्यवसाय हैं, जिनसे उन्हें लगभग ₹2,00,000 प्रति माह की आय होती है।

    उसने यह भी दावा किया कि उसकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है, इसलिए उसने गुज़ारा-भत्ते के रूप में ₹30,000 प्रति माह की मांग की।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि फ़ैमिली कोर्ट ने पाया था कि पत्नी के पास अलग रहने का पर्याप्त कारण था, वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ थी और पति अपनी हैसियत के अनुसार उसका भरण-पोषण नहीं कर रहा था। हाई कोर्ट को इन निष्कर्षों में कोई गलती नहीं मिली।

    हाईकोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करने की पति की ज़िम्मेदारी केवल कानूनी दायित्व से कहीं ज़्यादा है।

    कोर्ट ने कहा:

    "अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति का नैतिक कर्तव्य और सामाजिक ज़िम्मेदारी है।"

    इसमें आगे कहा गया कि पति का फ़र्ज़ "सिर्फ़ कानूनी ज़िम्मेदारी ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक ज़िम्मेदारी भी है", खासकर तब जब पत्नी के पास कमाई का कोई स्वतंत्र ज़रिया न हो।

    कोर्ट ने समझाया कि पति का सहयोग परिवार को बनाए रखता है और यह पक्का करता है कि पत्नी और बच्चे हाशिए पर न जाएँ या गरीबी में न धकेल दिए जाएं।

    कोर्ट ने यह भी कहा:

    "गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) पाने का अधिकार कोई दान-दक्षिणा नहीं है, बल्कि शादी और माता-पिता के फ़र्ज़ से जुड़ा एक कानूनी अधिकार है... गुज़ारा-भत्ता कोई तोहफ़ा नहीं, बल्कि एक अधिकार है और इसे न देने से पत्नी को गरीबी और बेबसी की ज़िंदगी जीने पर मजबूर होना पड़ेगा, जिसे कानून मंज़ूर नहीं कर सकता।"

    इसके बाद कोर्ट ने गुज़ारा-भत्ते के प्रावधानों के पीछे के संवैधानिक आधार की जाँच की।

    कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 39(a) और 39(f) का ज़िक्र किया, जो आजीविका के पर्याप्त साधनों और बच्चों के स्वस्थ विकास के मौकों से जुड़े हैं। बेंच ने कहा कि CrPC की धारा 125 और BNSS की धारा 144 के तहत गुज़ारा-भत्ते के प्रावधान इन निर्देशों को लागू करते हैं।

    बेंच ने यह भी कहा कि आर्टिकल 21 जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार की बात करता है, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है। बेंच ने आगे कहा कि गुज़ारा-भत्ता न देना और पत्नी को गरीबी और बेबसी में धकेलना इस संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्टिकल 15(3), 21 और 39 में निहित संवैधानिक भावना के अनुसार, पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करने के पति के फ़र्ज़ को "सिर्फ़ कानूनी ज़िम्मेदारी के तौर पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के एक पहलू के तौर पर" समझा जाना चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आर्टिकल 39 और 41 गुज़ारा-भत्ते के प्रावधानों के मकसद को मज़बूत करते हैं और पति की ज़िम्मेदारी को "देश की संवैधानिक चेतना" के दायरे में रखते हैं।

    बेंच ने भुवन मोहन सिंह बनाम मीना मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि गुज़ारा-भत्ता सामाजिक न्याय का एक ज़रिया है और इसका मकसद बेघर होने और गरीबी-बेबसी को रोकना है।

    बेंच ने चतुर्भुज बनाम सीताबाई मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2007 के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया ताकि इस बात पर ज़ोर दिया जा सके कि गुज़ारा-भत्ते का मकसद यह पक्का करना है कि पत्नी गरीबी में न रहे और पति की ज़िम्मेदारी शादी के रिश्ते से ही पैदा होती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) का अधिकार इसलिए है ताकि किसी को तंगी या गरीबी का सामना न करना पड़े और "यह अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उपेक्षा या लापरवाही साबित हो"।

    इस बात को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी की अपनी कोई स्वतंत्र आय न होने और पति के पास पत्नी का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त साधन होने की बात पर सही ढंग से विचार किया था।

    कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश पूरी तरह से तर्कसंगत और सही था और उसमें दखल देने की कोई वजह नहीं दिखी। इसलिए क्रिमिनल रिविज़न याचिका को खारिज कर दिया गया और गुज़ारा-भत्ता देने के फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा गया।

    Case title - Devansh Alias Chhotu vs State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 560

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