अधिकारियों की देरी, किसान कल्याण दावे को खारिज करने का आधार नहीं; लाभार्थी की दुर्दशा के प्रति उदासीनता अस्वीकार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
21 March 2026 7:46 PM IST

राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं के तहत एक मृत किसान के परिवार द्वारा मांगी गई वित्तीय सहायता से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण किसी कल्याणकारी योजना के तहत ऐसी सहायता पाने के लिए किसान की विधवा को बार-बार कोर्ट के चक्कर लगवाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने टिप्पणी की,
“इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई, जिसमें किसी कल्याणकारी योजना के लाभार्थी की दुर्दशा के प्रति उदासीनता झलकती हो, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध संवैधानिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकती।”
“मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना” और “मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना” राज्य सरकार की ऐसी कल्याणकारी योजनाएं हैं, जिनका उद्देश्य योजना के तहत निर्धारित आकस्मिकताओं (जैसे मृत्यु या स्थायी विकलांगता) के मामलों में किसानों के परिवारों को सहायता प्रदान करना है।
याचिकाकर्ता के पति एक किसान थे, जिनकी 2016 में एक भैंस के हमले में मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता ने “मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना” के तहत वित्तीय सहायता के लिए राज्य के अधिकारियों से संपर्क किया। हालांकि, उनके दावे को देरी के आधार पर खारिज कर दिया गया।
इस अस्वीकृति को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने दलील दी कि लेखपाल ने जानबूझकर अनावश्यक देरी की थी और परिवार को आवश्यक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं करा रहा था। वर्ष 2018 में जब लेखपाल का तबादला हुआ, तब जाकर दस्तावेज़ परिवार को सौंपे गए। विभिन्न अधिकारियों के पास से गुजरने के बाद वर्ष 2019 में “किसान एवं सर्वहित बीमा योजना समिति” की बैठक में इस दावे को 'समय-सीमा समाप्त' (Time-Barred) होने के आधार पर खारिज किया गया।
हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बाद याचिकाकर्ता ने एक नया अभ्यावेदन (Representation) प्रस्तुत किया, जिसे 20 महीने की देरी के आधार पर पुनः खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने अपना दावा निर्धारित समय-सीमा के भीतर ही प्रस्तुत किया, परंतु तत्कालीन लेखपाल ने दस्तावेज़ों को समय पर आगे नहीं बढ़ाया और न ही अपने तबादले के समय वे दस्तावेज़ अपने उत्तराधिकारी को सौंपे। कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि लेखपाल के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू की गई थी, किंतु अंततः उसे केवल एक चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
“इस प्रकार, जहां संबंधित अधिकारी को अपनी लापरवाही के लिए कोई गंभीर परिणाम नहीं भुगतना पड़ा, वहीं याचिकाकर्ता को एक कल्याणकारी योजना के लाभ से वंचित कर दिया गया, जिसका उद्देश्य संकट के समय तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना है। याचिकाकर्ता, जिसने अचानक अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य को खो दिया, अब उस समय पर मिलने वाली सहायता के बिना संघर्ष करने के लिए अकेली रह गई है, जो इस योजना के तहत प्रदान की जानी थी।”
न्यायालय ने संज्ञान लिया कि दिनांक 10.07.2014 के सरकारी आदेश के अनुसार—जिसमें योजना के कार्यान्वयन के लिए दिशानिर्देश और खंड 11 के तहत दावों के निपटान की प्रक्रिया निर्धारित की गई—आवश्यक आवेदन दाखिल करने में हुई देरी को घटना की तारीख से 1 वर्ष तक क्षम्य (माफ़ करने योग्य) माना गया।
न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि याचिकाकर्ता के दावे को अस्वीकार करने का विवादित आदेश, रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर उचित रूप से विचार किए बिना पारित किया गया। यह टिप्पणी की गई कि लेखपाल द्वारा दस्तावेज़ों को आगे भेजने में की गई चूक को राज्य के अधिकारियों द्वारा नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
आगे कहा गया,
“यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 'मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना' को किस उद्देश्य से तैयार किया गया। इस योजना को राज्य सरकार द्वारा एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय के रूप में शुरू किया गया, ताकि उन किसानों के परिवारों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान की जा सके, जिनकी आकस्मिक मृत्यु हो जाती है या जो स्थायी रूप से विकलांग हो जाते हैं। इस योजना का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृतक किसान के आश्रितों को तत्काल वित्तीय सहायता प्राप्त हो ताकि वे परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य को खोने के कारण उत्पन्न हुई अचानक आर्थिक कठिनाई से उबर सकें। इसलिए यह योजना राज्य की उस कल्याणकारी नीति का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य समाज के कमज़ोर वर्गों—विशेष रूप से कृषक समुदाय—को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है।”
परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के कारण याचिकाकर्ता को हुई कठिनाई और उसके बाद लेखपाल की निष्क्रियता के कारण उसे झेलनी पड़ी पीड़ा को देखते हुए न्यायालय ने यह निर्णय दिया:
“इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को किसी कल्याणकारी योजना के लाभ से वंचित करना न्याय का उपहास करने जैसा होगा; विशेष रूप से तब, जब आवेदन में हुई देरी स्पष्ट रूप से प्रशासनिक चूक का परिणाम है, न कि स्वयं दावाकर्ता की किसी गलती का। अधिकारियों की लापरवाही या निष्क्रियता का खामियाज़ा याचिकाकर्ता को नहीं भुगतना पड़ना चाहिए।”
न्यायालय ने बलिया के ज़िलाधिकारी को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के दावे पर उसके गुण-दोष के आधार पर और विधि के अनुसार पुनर्विचार करें।
तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार की गई।
Case Title: Lalsa Devi Versus State of U.P. and 4 others

