'डिक्री-धारक के अधिकारों को अर्थहीन नहीं होने दिया जाना चाहिए': इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • डिक्री-धारक के अधिकारों को अर्थहीन नहीं होने दिया जाना चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपनी पर्यवेक्षी अधिकारिता (Supervisory Jurisdiction) का इस्तेमाल करते हुए वह निष्पादन अदालत (Executing Court) को यह निर्देश दे सकता है कि वह 'सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908' (CPC) के 'आदेश XXI नियम 97' के तहत दायर किसी आपत्ति पर एक तय समय-सीमा के भीतर फैसला ले। हाई कोर्ट को इस प्रक्रिया में आपत्ति के गुण-दोष (Merits) पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

    अदालत ने कहा कि इस तरह के निर्देश से न तो आपत्ति जताने वाले व्यक्ति को अपना पक्ष रखने के अवसर से वंचित किया जाता है और न ही पहले से यह तय किया जाता है कि फैसला क्या होगा।

    जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,

    "भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इस अदालत की पर्यवेक्षी अधिकारिता का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है कि निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) अनावश्यक रूप से लंबे समय तक लंबित न रहे, और डिक्री-धारक के अधिकार किसी ऐसी देरी के कारण अर्थहीन न हो जाएं, जिसे टाला जा सकता था। जहां परिस्थितियां ऐसी दखलअंदाजी की मांग करती हैं, वहां कार्यवाही को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए निश्चित समय-सीमा वाले निर्देश जारी किए जा सकते हैं। ऐसा करते समय निष्पादन अदालत के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विवादित सवालों के निपटारे में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।"

    श्रीमती निर्मला देवी ने मेरठ के साकेत स्थित परिसर संख्या A-38 के संबंध में परिसर खाली कराने और किराए की बकाया राशि की वसूली के लिए पंजाब नेशनल बैंक और उसके अधिकारियों के खिलाफ SCC वाद संख्या 52/2010 दायर किया था। इस मामले में 27.08.2012 को डिक्री (फैसला) पारित की गई। जब यह मामला लंबित था, तब 'मेरठ सहकारी आवास समिति लिमिटेड' ने इसमें पक्षकार बनने (Impleadment) की मांग की थी, जिसे 25.01.2012 को खारिज कर दिया गया।

    याचिकाकर्ता ने श्रीमती निर्मला देवी (जिनका 03.02.2024 को निधन हो गया) द्वारा 20.11.2021 को निष्पादित एक पंजीकृत वसीयत के आधार पर दावा पेश किया और 'निष्पादन मामला संख्या 7/2025' (Execution Case No. 7 of 2025) दायर किया। इस मामले में उक्त समिति ने CPC के 'आदेश XXI नियम 97' के तहत आपत्ति दर्ज कराई है।

    डिक्री के खिलाफ बैंक की पुनरीक्षण याचिका (Revision) पर, हाई कोर्ट ने 11.03.2026 को उसे चाबियां जमा करने का निर्देश दिया था, जिसका पालन 01.04.2026 को किया गया। इसके बाद निष्पादन न्यायालय (Executing Court) ने चाबियां वापस पाने और कब्ज़ा लेने के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन पर तब तक के लिए रोक लगाई, जब तक कि आपत्ति (Objection) का निपटारा न हो जाए।

    कोर्ट ने कहा कि आपत्ति के स्वीकार्य होने (Maintainability) और सोसाइटी द्वारा जताए गए अधिकारों का मामला निष्पादन न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।

    कोर्ट ने कहा गया,

    “आपत्ति जताने वाले को निष्पक्ष मौका देने की ज़रूरत का मतलब यह नहीं है कि निष्पादन की कार्यवाही में अनावश्यक या अनिश्चितकालीन देरी की जाए। साथ ही जल्द निष्पादन के उद्देश्य से उस प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता, जो किसी आपत्ति पर फैसला लेने के लिए तय की गई।”

    पहले की गई अस्वीकृति के प्रभाव पर कोर्ट ने कहा,

    “'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) या 'कंस्ट्रक्टिव रेस ज्यूडिकाटा' (Constructive Res Judicata) लागू होगा या नहीं, यह केवल इस आधार पर तय नहीं किया जा सकता कि पहले पक्षकार बनने (Impleadment) का आवेदन खारिज कर दिया गया था।”

    'राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी' मामले का हवाला देते हुए - जिसमें कहा गया कि प्रक्रियात्मक देरी के कारण किसी सफल वादी को डिक्री के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए - कोर्ट ने कहा कि अपनी पर्यवेक्षी शक्ति (Supervisory Jurisdiction) का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है कि निष्पादन की कार्यवाही बेवजह लंबी न खिंचे।

    इसके अनुसार, मेरठ के एडिशनल जिला जज (कोर्ट नंबर 18) को निर्देश दिया गया कि वे आदेश की प्रमाणित प्रति पेश किए जाने के तीन महीने के भीतर आपत्ति पर फैसला लें। उसके बाद याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करें। आपत्ति के स्वीकार्य होने या उसके गुण-दोष (Merits) पर कोई राय दिए बिना, कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

    Case Title : Smt. Nirmala Devi (Since Deceased) v. Punjab National Bank and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 917

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