किसी और के नाम से ईमेल ID बनाना पहली नज़र में IT Act की धारा 66-C के तहत 'आइडेंटिटी थेफ्ट' नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
6 Sept 2026 7:40 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने शुरुआती तौर पर माना कि किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से सिर्फ़ ईमेल ID बनाना, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2008 (IT Act) की धारा 66-C के तहत अपराध नहीं है। बता दें, उक्त धारा 'आइडेंटिटी थेफ्ट' (पहचान की चोरी) की सज़ा से संबंधित है।
IT Act की धारा 66-C में तब सज़ा का प्रावधान है, जब कोई व्यक्ति धोखाधड़ी या बेईमानी से किसी दूसरे व्यक्ति के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर, पासवर्ड या किसी अन्य यूनिक आइडेंटिफिकेशन फ़ीचर (विशिष्ट पहचान विशेषता) का इस्तेमाल करता है।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने गौर किया कि इस प्रावधान में खास तौर पर "इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर", "पासवर्ड" या "यूनिक आइडेंटिफिकेशन फ़ीचर" का ज़िक्र है, लेकिन "ई-मेल ID" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया।
बेंच ने यह बात एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान कही। यह याचिका याचिकाकर्ताओं के खिलाफ़ BNS की धारा 356(2) और IT एक्ट की धारा 66-C के तहत दर्ज FIR को चुनौती देने के लिए दायर की गई।
FIR में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ताओं ने किसी तीसरे व्यक्ति के नाम से एक ई-मेल ID बनाई और उसका इस्तेमाल करके कई लोगों को फ़र्ज़ी शिकायतें भेजी थीं।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ई-मेल ID बनाना इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर, पासवर्ड या किसी यूनिक आइडेंटिफिकेशन फ़ीचर का इस्तेमाल नहीं माना जाएगा, खासकर इसलिए क्योंकि किसी व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति के नाम से ई-मेल ID बनाने पर कोई रोक नहीं है।
याचिका का विरोध करते हुए प्रतिवादी नंबर 4 के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से ई-मेल ID बनाई थी और वे इसका इस्तेमाल फ़र्ज़ी मैसेज और शिकायतें भेजने के लिए कर रहे थे, जिसमें लोकायुक्त को भेजी गई शिकायतें भी शामिल थीं।
यह तर्क दिया गया कि ऐसा व्यवहार किसी तीसरे व्यक्ति के "यूनिक आइडेंटिफिकेशन फ़ीचर" का इस्तेमाल करने जैसा होगा और इसलिए यह IT Act की धारा 66-C के तहत अपराध माना जाएगा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को शुरुआती तौर पर "गलत और गलतफहमी पर आधारित" पाया। बेंच ने कहा कि जब कानून बनाने वाली संस्था ने अपनी समझदारी से धारा 66-C के तहत "इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर", "पासवर्ड" या "यूनिक आइडेंटिफिकेशन फ़ीचर" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और "ई-मेल ID" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया तो कोर्ट के सामने मौजूद आरोपों के आधार पर पहली नज़र में यह नहीं कहा जा सकता कि धारा 66-C के तहत कोई अपराध हुआ।
इसे देखते हुए कोर्ट ने पाया कि पहली नज़र में दखल देने का मामला बनता है।
इसलिए कोर्ट ने विवादित FIR पर रोक लगाई और निर्देश दिया कि अगले आदेश तक अधिकारी इस FIR के आधार पर याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई न करें।
आपराधिक मानहानि के अलग आरोप पर याचिकाकर्ताओं ने 'सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि आपराधिक मानहानि की कार्यवाही FIR के ज़रिए शुरू नहीं की जा सकती और इसे पीड़ित व्यक्ति की शिकायत के ज़रिए ही शुरू किया जाना चाहिए।
आदेश में इस दलील का ज़िक्र है, लेकिन इस चरण में इस मुद्दे पर कोई अंतिम फ़ैसला नहीं लिया गया।
निर्देश दिया गया कि प्रतिवादियों द्वारा अपने काउंटर-एफ़िडेविट (जवाब) दाखिल करने के बाद मामले को उचित बेंच के सामने लिस्ट किया जाए।
Case title - Krishna Kant Pandey And Another vs. State Of U.P. Thru Prin. Secy. Home Lko And Others


