हालातों की पूरी कड़ी के बिना सिर्फ़ 'आखिरी बार साथ देखे जाने' के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1986 के मर्डर केस में आरोपी को बरी किया

  • हालातों की पूरी कड़ी के बिना सिर्फ़ आखिरी बार साथ देखे जाने के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1986 के मर्डर केस में आरोपी को बरी किया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में 1986 के मर्डर केस में उम्रकैद की सज़ा पाए एक व्यक्ति (अपील करने वाले अकेले जीवित व्यक्ति) को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि "आखिरी बार साथ देखे जाने" की थ्योरी "बहुत कमज़ोर सबूत" है और सिर्फ़ इसके आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

    जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने कहा कि अदालतों को यह पक्का करना चाहिए कि 'हालात से जुड़े सबूत' (circumstantial evidence) और घटनाओं की कड़ी इस तरह पूरी हो कि वे सिर्फ़ आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा करें, और आरोपी के बेगुनाह होने की किसी भी संभावना की गुंजाइश न रहे।

    इन बातों को ध्यान में रखते हुए डिवीज़न बेंच ने हरदोई के सेशन जज का 1989 का फ़ैसला रद्द किया और आरोपी को शक का फ़ायदा (benefit of doubt) देते हुए बरी कर दिया।

    केस की संक्षिप्त जानकारी

    सरकारी पक्ष के अनुसार, 2 नवंबर 1986 की शाम को शाहबाद में बिजली के सामान की दुकान चलाने वाले 17 साल के दीपक कुमार घर से निकले और कभी वापस नहीं लौटे।

    अगले दिन उनके पिता ने FIR दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ दिनों से अफ़वाहें फैल रही थीं कि उनके बेटे के एक शादीशुदा महिला (सह-आरोपी की बहन) के साथ नाजायज़ संबंध थे। इस वजह से महिला का परिवार अंदर ही अंदर दुश्मनी पाले हुए। हालांकि ऊपर से वे अच्छे संबंध बनाए हुए।

    यह भी आरोप लगाया गया कि महिला के भाई (लक्ष्मी कांत/मूल अपीलकर्ता नंबर 1) ने उनके बेटे को राजदूत मोटरसाइकिल पर बिठाया और उसके बाद उसने और उसके साथियों ने शायद उसकी हत्या कर दी या हत्या करने की नीयत रखी।

    जिस दिन FIR दर्ज हुई, उसी दिन एक होम गार्ड को मृतक का गोलियों से छलनी शव मिला और बाद में सूचना देने वाले ने शव की पहचान अपने बेटे के रूप में की।

    चूंकि घटना का कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने आरोपी लक्ष्मी कांत (अब मृत) और सुनील कुमार (जीवित अपीलकर्ता) को दोषी ठहराते हुए उन गवाहों पर भरोसा किया, जिन्होंने दावा किया कि उन्होंने मरने से कुछ समय पहले पीड़ित को आरोपी के साथ काली राजदूत मोटरसाइकिल पर जाते देखा था। अपनी सज़ा को चुनौती देते हुए दोनों आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की। ​​अपील पर सुनवाई के दौरान लक्ष्मी कांत की मौत हो गई और अपील सिर्फ़ दूसरे अपीलकर्ता सुनील कुमार के मामले में ही लंबित रही।

    बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि विवादित फ़ैसला और आदेश रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और सामग्री पर ठीक से विचार किए बिना और अपीलकर्ताओं के ख़िलाफ़ परिस्थितियों की पूरी कड़ी बनाए बिना सुनाया गया।

    दूसरी ओर, राज्य पक्ष ने तर्क दिया कि विवादित फ़ैसला सही था और उसमें किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं थी।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट को मुख्य गवाहों के बयानों में बड़ी विसंगतियां मिलीं।

    कोर्ट ने देखा कि पहले गवाह (PW-1) ने दावा किया कि उसने पीड़ित को लक्ष्मी कांत के साथ देखा, लेकिन उसने कभी भी जीवित अपीलकर्ता सुनील कुमार का नाम नहीं लिया। असल में PW-2 (सूचना देने वाले/मृतक के पिता) और PW-3 ने भी अपीलकर्ता सुनील कुमार का नाम नहीं लिया।

    इसके अलावा, बेंच ने गौर किया कि पीड़ित के एक स्वतंत्र दोस्त (सुशील कुमार सिंह), जिसने कथित तौर पर मृतक को अपीलकर्ताओं के साथ देखा, से अभियोजन पक्ष ने पूछताछ नहीं की थी।

    हालांकि, मृतक की बुआ (PW-4/कृष्णा कुमारी) ने अपीलकर्ता (सुनील कुमार) का नाम लिया और "आख़िरी बार साथ देखे जाने" (last seen) की दो घटनाओं के बारे में बयान दिया, लेकिन कोर्ट ने उनकी इस बात को खारिज किया कि आरोपी और पीड़ित बार-बार मोटरसाइकिल पर उनके घर के सामने से गुज़रे थे।

    बेंच ने कहा,

    "...अगर आरोपी का मृतक को मारने का इरादा होता तो हमें नहीं लगता कि कोई भी समझदार व्यक्ति बार-बार P.W.4 के घर के सामने से गुज़रता, क्योंकि उनके देखे जाने की पूरी संभावना थी... इसलिए, P.W.4 की गवाही बहुत ही अविश्वसनीय लगती है।"

    इसके अलावा, बेंच ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह PW-5 और PW-6 अपने बयान से मुकर गए; इसलिए अपराध का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है।

    इसे देखते हुए बेंच ने कहा कि मुख्य गवाहों के मुकर जाने के कारण अपराध का कोई सीधा प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और 'आखिरी बार साथ देखे जाने' (last seen together) के सिद्धांत पर टिका था।

    अदालत ने कहा कि यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि जिन परिस्थितियों से अपराध का निष्कर्ष निकाला जाता है, उन्हें ठोस और मज़बूती से साबित किया जाना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियां एक पूरी कड़ी बनानी चाहिए जिससे यह पता चले कि पूरी संभावना के साथ अपराध आरोपी ने ही किया।

    बेंच ने कहा,

    "हालांकि, अगर अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की कड़ी को दिखाने और साबित करने में विफल रहता है और आरोपी के दोषी होने के अलावा किसी अन्य संभावना को खारिज नहीं कर पाता है तो 'परिस्थितिजन्य साक्ष्य' के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती और वह टिक नहीं पाएगी।"

    चेतन बनाम कर्नाटक राज्य (2025 LiveLaw (SC) 657) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि लंबे समय का अंतर "आखिरी बार साथ देखे जाने" (last seen) के सबूत को अपने आप अमान्य नहीं करता है, लेकिन अभियोजन पक्ष पर यह साबित करने की बड़ी ज़िम्मेदारी होती है कि अपराध होने से पहले किसी तीसरे पक्ष के शामिल होने की कोई उचित शंका नहीं है।

    हालांकि, मौजूदा मामले में बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने स्वतंत्र गवाहों को पेश नहीं किया और बहुत ही अविश्वसनीय गवाही पेश की, जिससे परिस्थितियों की कड़ी टूट गई।

    इसके अलावा, मृतक के एक शादीशुदा महिला के साथ कथित प्रेम संबंध को उसकी हत्या का मकसद बताए जाने की दलील पर बेंच ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए "प्रेम पत्रों" पर विचार किया, जिनके बारे में कहा गया कि वे आरोपी की बहन ने लिखे थे।

    हालांकि, अदालत ने इन पत्रों की बरामदगी को बहुत संदिग्ध पाया और कहा कि लिखावट को निश्चित रूप से साबित नहीं किया जा सका। बेंच ने कहा कि हालांकि हालात पर आधारित मामलों में मकसद (motive) अहम होता है, लेकिन "मकसद और अपराध साबित करने के लिए सिर्फ़ अफ़वाह को सबूत नहीं माना जा सकता"।

    इस बात को ध्यान में रखते हुए बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और जानकारी पर ठीक से विचार किए बिना, और सिर्फ़ अंदाज़ों और अटकलों के आधार पर दोषी ठहराया।

    इसे देखते हुए बेंच ने फैसला सुनाया कि एकमात्र जीवित अपीलकर्ता को 'संदेह का लाभ' (benefit of the doubt) मिलना चाहिए और उसे बरी कर दिया गया। इस तरह ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया गया।

    हाईकोर्ट ने अपराध में कथित तौर पर इस्तेमाल की गई राजदूत मोटरसाइकिल को ज़ब्त करने के मामले पर भी गौर किया। ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 452 के तहत गाड़ी को राज्य के पक्ष में ज़ब्त करने का आदेश दिया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि मोटरसाइकिल मृतक आरोपी के ससुर की थी, जो न तो इस मामले में आरोपी थे और न ही गवाह। इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि ज़ब्त की गई मोटरसाइकिल उन्हें वापस कर दी जाए।

    Case title - Laxmi Kant @ Pappu (dead) and another vs State of UP 2026 LiveLaw (AB) 326

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