CrPC की धारा 319 के तहत आरोपी को समन करने से पहले दर्ज किए गए सबूतों के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
31 May 2026 10:43 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह फ़ैसला दिया कि किसी आरोपी की गैर-मौजूदगी में दर्ज किए गए सबूत, जिन पर CrPC की धारा 319 के तहत उसे समन करने के लिए भरोसा किया जाता है, बाद में उसकी सज़ा का आधार नहीं बन सकते।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने 2008 के एक मामले में हत्या के एक आरोपी को बरी करते हुए यह टिप्पणी की।
ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 302 (धारा 149 के साथ), धारा 307 (धारा 149 के साथ), धारा 148 और धारा 506(2) के तहत दोषी ठहराया था। उसे आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। यह सज़ा अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही पर आधारित थी, जो उसे ट्रायल का सामना करने के लिए समन किए जाने से पहले दर्ज की गईं।
संक्षेप में मामला
यह मामला विजय कुमार सिंह की हत्या से जुड़ा है, जिनकी मौत कथित तौर पर 4 आरोपियों द्वारा चलाई गई गोलियों से हुई थी। चार्जशीट में अपीलकर्ता (प्रमोद कुमार सिंह उर्फ गुड्डू सिंह) का नाम शामिल नहीं था, क्योंकि पुलिस घटना में उसकी संलिप्तता साबित नहीं कर पाई।
अब चार्जशीट में नामजद 4 आरोपियों के ट्रायल के दौरान, CrPC की धारा 319 के तहत अपीलकर्ता को ट्रायल का सामना करने के लिए समन करने हेतु एक अर्जी दायर की गई, जिसे जून 2012 में मंज़ूर कर लिया गया।
उल्लेखनीय है कि CrPC की धारा 319 के तहत यह अर्जी घायल शिकायतकर्ता/PW-1 (पिंटू सिंह), मृतक के चाचा (इंद्रपाल सिंह; जिनकी गवाही 2011 में दर्ज की गई) और स्वतंत्र गवाह (अजय कुमार सिंह; जिनकी गवाही 2009 में दर्ज की गई) की पिछली गवाहियों पर आधारित थी।
हालांकि, जैसा कि हाईकोर्ट ने पाया, अपीलकर्ता को समन किए जाने के बाद PW-1 और मृतक के चाचा, जिनकी 2013 में दोबारा जांच की गई, अपनी पिछली गवाहियों से पूरी तरह मुकर गए और मामले में अपीलकर्ता की संलिप्तता से इनकार किया।
दरअसल, PW-1 ने साफ़ तौर पर कहा कि उसने दबाव में आकर अपनी पिछली गवाही में अपीलकर्ता को झूठा फंसाया था। इसके अलावा, स्वतंत्र गवाह भी अपीलकर्ता को समन किए जाने के बाद दोबारा गवाही देने के लिए कभी सामने नहीं आया। इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने आगे बढ़कर मृतक के चाचा और एक स्वतंत्र गवाह के पिछले (समन जारी होने से पहले के) बयानों पर भरोसा करते हुए अपीलकर्ता को दोषी ठहरा दिया।
ट्रायल कोर्ट ने यह तर्क दिया था कि एक बार जब कोर्ट ने गवाहियों के आधार पर अपीलकर्ता को CrPC की धारा 319 के तहत ट्रायल का सामना करने के लिए समन जारी किया तो उन गवाहियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता और वे अपीलकर्ता को दोषी ठहराने का आधार बन सकती हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क पर आपत्ति जताई, क्योंकि उसने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने मृतक के चाचा के उस बयान पर भरोसा करके गंभीर गलती की थी, जिसमें उन्होंने अपीलकर्ता पर आरोप लगाया; क्योंकि यह बयान तब रिकॉर्ड किया गया, जब अपीलकर्ता को एक अतिरिक्त आरोपी के तौर पर समन जारी नहीं किया गया।
डिवीजन बेंच ने यह पाया कि इस बयान को अपीलकर्ता के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"ट्रायल कोर्ट ने इंद्रपाल सिंह के पहले रिकॉर्ड किए गए बयान पर कार्रवाई की, जबकि उस समय अपीलकर्ता को ट्रायल का सामना करने के लिए समन जारी नहीं किया गया; लेकिन कोर्ट ने उसी गवाह के उस बयान को नज़रअंदाज़ किया, जो अपीलकर्ता को समन जारी होने के बाद रिकॉर्ड किया गया, जिसमें उसने साफ तौर पर कहा था कि अपीलकर्ता इस घटना में शामिल नहीं था।"
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि CrPC की धारा 319 के तहत कार्रवाई करते समय कोर्ट के पास आरोपी के अपराध के संबंध में कोई राय बनाने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।
बेंच ने आगे यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 273 के प्रावधानों को नज़रअंदाज़ किया था; यह धारा यह अनिवार्य करती है कि ट्रायल या किसी अन्य कार्यवाही के दौरान दर्ज किए गए सभी सबूत आरोपी की मौजूदगी में ही दर्ज किए जाने चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"...जो सबूत उस समय रिकॉर्ड किए गए, जब ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को समन जारी नहीं किया। इसी वजह से वह ट्रायल के दौरान कोर्ट में मौजूद नहीं था, उन सबूतों पर ट्रायल कोर्ट भरोसा नहीं कर सकता।"
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, और यह देखते हुए कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य सबूत मौजूद नहीं था, जिससे अपीलकर्ता की कथित अपराध में संलिप्तता साबित हो सके, बेंच ने उसकी अपील स्वीकार कर ली और उसे दोषी ठहराने के फैसले को रद्द कर दिया।
बेंच ने यह निष्कर्ष निकाला:
"उपर्युक्त चर्चाओं को देखते हुए हमारी सुविचारित राय है कि अभियोजन पक्ष कथित अपराधों को करने में अपीलकर्ता के दोष को सिद्ध करने में विफल रहा है। ट्रायल कोर्ट ने मामले के उपर्युक्त पहलू पर ध्यान दिए बिना ही अपीलकर्ता को दोषी ठहराया, जिससे विचारण न्यायालय का निष्कर्ष दूषित हो जाता है और उसका निर्णय कानून की दृष्टि से अस्थिर हो जाता है।"
Case Title: Pramod Kumar Singh Alias Guddu Singh vs. State Of U.P. Thru. Secy. Deptt. Of Home Lko 2026 LiveLaw (AB) 304

