क्या धर्म बदलने से अपने आप 'अनुसूचित जनजाति' का दर्जा खत्म हो जाता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

Shahadat

15 Sept 2026 9:49 AM IST

  • क्या धर्म बदलने से अपने आप अनुसूचित जनजाति का दर्जा खत्म हो जाता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दूसरे धर्म में धर्म परिवर्तन करने से ही किसी व्यक्ति का 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता।

    कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति ST का सदस्य बना रहता है या नहीं, यह तथ्यों पर निर्भर करता है। इसका फैसला आदिवासी पहचान की ज़रूरी विशेषताओं की जांच करके किया जाएगा, जिसमें पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित आदिवासी समुदाय द्वारा स्वीकार्यता शामिल है।

    जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने यह बात 'चिंथडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कही।

    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जनजाति के दर्जे का फैसला इस बात पर होना चाहिए कि क्या दावा करने वाले व्यक्ति के पास अभी भी आदिवासी पहचान है या नहीं।

    मामले की संक्षिप्त जानकारी

    नन्हकी उर्फ ​​नईमुन्निसा, जिन्होंने भुइयां ST समुदाय से होने का दावा किया था, उन्होंने दुद्धी, सोनभद्र के डिप्टी कलेक्टर द्वारा जारी 3 अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी। इन आदेशों में उनके पक्ष में हुए ज़मीन के 3 ट्रांसफर को अमान्य घोषित कर दिया गया था।

    ये ट्रांसफर 'यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950' की धारा 157-B / 'उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006' की धारा 99 के प्रावधानों का उल्लंघन करते पाए गए। नतीजतन, यह निर्देश दिया गया कि ज़मीन राज्य सरकार के अधिकार में आ जाए।

    बता दें, 1950 के अधिनियम की धारा 157-B और 2006 की संहिता की धारा 99, अनुसूचित जनजाति की ज़मीन को ऐसे व्यक्ति को ट्रांसफर करने पर रोक लगाती हैं, जो अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है।

    हालांकि, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनका जन्म भुइयां अनुसूचित जनजाति (ST) में हुआ था और उनके पास तहसीलदार द्वारा जारी वैध ST प्रमाण पत्र था।

    उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विवादित ज़मीन बेचने वाले लोग गौर अनुसूचित जनजाति के हैं, इसलिए ये लेन-देन अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के बीच हुए हैं और इसलिए वैध हैं।

    दूसरी ओर, राज्य ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या उनका आदिवासी दर्जा अभी भी बरकरार है या नहीं। यह मामला इस बात पर आधारित था कि याचिकाकर्ता ने इस्लामिक रीति-रिवाजों से एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी की थी, बाद में वह 'नईमुन्निसा' के नाम से जानी जाने लगी, कई दशकों तक उस व्यक्ति के साथ रही और उसके दो बच्चे हुए, जिनके नाम मुस्लिम हैं। परिवार रजिस्टर में भी उसका धर्म मुस्लिम दर्ज है।

    वास्तव में, राज्य का तर्क यह था कि अपनी बाद की धार्मिक और सामाजिक पहचान के कारण, संबंधित तारीख तक उसे ST (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा नहीं मिल सकता।

    इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह अभी भी भुइयां अनुसूचित जनजाति से जुड़ी हुई है और मुस्लिम से शादी करने के बावजूद उसने अपना मूल धर्म या जनजातीय पहचान नहीं छोड़ी है।

    उसका साफ कहना था कि वह अपने गाँव में ही रहती रही और अनुसूचित जनजाति के रीति-रिवाजों का पालन करती रही। ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि वह भुइयां समुदाय से अलग हो गई।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    शुरुआत में ही, हाईकोर्ट ने कहा कि कानून का कोई ऐसा सामान्य नियम नहीं है, जिसके तहत कोई व्यक्ति केवल धर्म बदलने के कारण अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं रह जाता।

    बेंच ने आगे कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी कोई व्यक्ति जनजाति का सदस्य बना रह सकता है। यह असल में तथ्यों का सवाल है जिसे जनजाति की विशेषताओं, रीति-रिवाजों, परंपराओं और जनजातीय समुदाय के साथ लगातार बने रहने वाले जुड़ाव के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

    इस संबंध में बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 'चिंथडा आनंद' फैसले का विस्तार से हवाला दिया और कहा:

    "सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में धर्म के आधार पर किसी को बाहर रखने का कोई प्रावधान नहीं है और अनुसूचित जनजाति के दर्जे का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि क्या दावा करने वाले व्यक्ति में जनजातीय पहचान की ज़रूरी विशेषताएं (जैसे पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकृति) मौजूद हैं और उन्हें इसके लिए मान्यता प्राप्त है या नहीं।"

    मौजूदा मामले में इस सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने कई दशकों की परिस्थितियों, उसकी शादी, बाद में रखे गए नाम, पारिवारिक जीवन, बच्चों के नाम, परिवार-रजिस्टर में दर्ज जानकारी और जांच से जुड़ी अन्य सामग्रियों पर विचार किया।

    कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि वह भुइयां समुदाय से जुड़ी रही थी।

    बेंच ने कहा,

    "सबसे ज़रूरी बात यह है कि याचिकाकर्ता के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि भुइयां समुदाय के साथ उसका जुड़ाव लगातार बना हुआ था। सक्षम अधिकारी और इस कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों और जानकारी पर विचार करने के बाद कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता भुइयां समुदाय के साथ अपने लगातार जुड़ाव को संतोषजनक ढंग से साबित नहीं कर पाई। वह ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे यह पता चले कि उन हालात के बावजूद, उसने भुइयां अनुसूचित जनजाति के रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन जारी रखा, उसके सामाजिक और सामुदायिक जीवन में हिस्सा लेती रही और उस समुदाय द्वारा पहचानी और स्वीकार की जाती रही।"

    खास बात यह है कि कोर्ट ने कहा कि वह कोई बहुत सख्त पैमाना नहीं अपना रही है। उसने साफ़ किया कि किसी व्यक्ति से यह साबित करने के लिए नहीं कहा जा सकता कि उसने जीवन भर समुदाय के हर रीति-रिवाज का पालन किया। इसी तरह सिर्फ़ एक दस्तावेज़ जिसमें किसी व्यक्ति को मुस्लिम बताया गया हो, उससे अनुसूचित जनजाति का दर्जा तय नहीं किया जा सकता।

    हालांकि, इस मामले में कोर्ट का निष्कर्ष "हालात के कुल असर" और, सबसे ज़रूरी बात, आदिवासी जीवन के लगातार बने रहने को साबित करने वाले सबूतों की कमी पर आधारित है।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र पर भी विचार किया। उसने कहा कि प्रमाण पत्र "निस्संदेह एक अहम सबूत" है, लेकिन इसके होने से अधिकारियों को यह जांचने से नहीं रोका जा सकता कि क्या उसके पास ज़रूरी ST दर्जा बना हुआ था, खासकर तब जब उस दर्जे से जुड़ी नई जानकारी उनके सामने आई हो।

    आखिरकार, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रही कि विवादित बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित होने की तारीखों पर भी उसके पास भुइयां ST का दर्जा बना हुआ था।

    कोर्ट ने कहा,

    "...प्रतिवादियों द्वारा पेश किए गए सबूतों से पता चलता है कि कई दशकों तक वह अलग नाम से और अलग धार्मिक और सामाजिक माहौल में रही।"

    कोर्ट ने साफ़ किया कि उसका निष्कर्ष सिर्फ़ उसकी शादी, धर्म परिवर्तन के आरोप या धर्म को मुस्लिम दिखाने वाली किसी एक एंट्री पर आधारित नहीं है।

    बल्कि, यह लंबे समय तक चले हालात और भुइयां रीति-रिवाजों का पालन जारी रखने, सामुदायिक जीवन में भागीदारी और भुइयां समुदाय द्वारा स्वीकार किए जाने को दिखाने वाले ठोस सबूतों की कमी पर आधारित है।

    इसलिए कोर्ट ने माना कि ये लेन-देन उन लोगों के पक्ष में ट्रांसफर पर लागू होने वाली कानूनी रोक के दायरे में आते हैं जो अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है।

    इसके अनुसार रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं और राजस्व प्राधिकरण के आदेशों को बरकरार रखा गया।

    Case title - Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others along with connected petitions 2026 LiveLaw (AB) 705

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