संभल हिंसा मामला: यूपी सरकार व ASP ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR के आदेश को दी हाईकोर्ट में चुनौती
Amir Ahmad
9 Feb 2026 4:01 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार और संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (ASP) अनुज चौधरी द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की।
इन याचिकाओं में संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा एएसपी चौधरी एवं अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश को चुनौती दी गई यह आदेश नवंबर 2024 की संभल हिंसा से संबंधित है।
उक्त आदेश पिछले माह CJM विभांशु सुधीर द्वारा यामीन नामक व्यक्ति की अर्जी पर पारित किया गया। यामीन हिंसा में घायल युवक का पिता है और उसने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उसके बेटे को जान से मारने की नीयत से गोली चलाई थी।
उल्लेखनीय है कि इस आदेश के ठीक एक सप्ताह बाद ही सीजेएम विभांशु सुधीर का तबादला हाईकोर्ट द्वारा सुल्तानपुर कर दिया गया।
राज्य सरकार और पुलिस अधिकारी की ओर से एडिशनल एडवोकेट जरनल (AAG) मनीष गोयल ने दलीलें रखते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की सीमाओं का उल्लंघन किया है और कानून में निहित अनिवार्य सुरक्षा प्रावधानों की अनदेखी की।
AAG गोयल ने कहा कि CJM ने BNSS की धारा 175 के तहत FIR दर्ज करने का आदेश तो पारित किया लेकिन धारा 175(4) में निर्धारित कठोर और अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया जो अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान कार्य करने वाले लोक सेवकों को निरर्थक और दुर्भावनापूर्ण आपराधिक कार्यवाहियों से संरक्षण प्रदान करती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि BNSS धारा 175(4) के तहत किसी लोक सेवक के विरुद्ध जांच का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को दो चरणों की प्रक्रिया अपनानी होती है-
(क) किसी उच्च अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करना।
(ख) उस घटना के संबंध में लोक सेवक द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण और परिस्थितियों पर विचार करना
एएजी गोयल ने दलील दी,
“इस मामले में उप-धारा (4) के खंड (क) का तो पालन किया गया लेकिन खंड (ख) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। पुलिस अधिकारियों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों पर कोई विचार नहीं किया गया। खंड (ख) वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यद्यपि CJM ने सीनियर अधिकारियों से रिपोर्ट मंगवाई थी और वह रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत भी की गई, लेकिन आदेश में उस रिपोर्ट का कहीं कोई उल्लेख तक नहीं है।
राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता द्वारा CJM के समक्ष दायर आवेदन में यह तक नहीं बताया गया कि उसने पहले संबंधित थाने में शिकायत दर्ज कराई या नहीं, जबकि यह कानून के तहत एक आवश्यक शर्त है।
एएजी गोयल ने कहा,
“CJM ने न केवल अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया बल्कि पुलिस रिपोर्ट को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि घटना के संबंध में पहले से एक मामला दर्ज है और उसकी जांच चल रही है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि नवंबर, 2024 की संभल हिंसा कोई एकल घटना नहीं थी, बल्कि उस स्थान पर उत्पन्न अव्यवस्था और तनाव का परिणाम थी।
राज्य की ओर से अपने तर्कों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों पर भरोसा किया गया जिनमें ओम प्रकाश अंबाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) तथा एक्सएक्सएक्स बनाम केरल राज्य व अन्य (2026) शामिल हैं। एएजी गोयल ने एक्सएक्सएक्स मामले से महत्वपूर्ण अंश पढ़ते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार बना रहता है कि वह लोक सेवक के विरुद्ध धारा 175(3) के तहत दायर आवेदन को खारिज कर सके, यदि आरोप पूरी तरह निराधार, असंगत या स्वभावतः अविश्वसनीय हों।
सुनवाई के अंत में एएजी ने यह भी रेखांकित किया कि संबंधित पुलिस अधिकारियों का बयान तक सीजेएम द्वारा दर्ज नहीं किया गया।
मामले की सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी।

