क्या बच्चे 'सीनियर सिटीजन्स एक्ट' के तहत बेदखली आदेशों के खिलाफ अपील कर सकते हैं? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

  • क्या बच्चे सीनियर सिटीजन्स एक्ट के तहत बेदखली आदेशों के खिलाफ अपील कर सकते हैं? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया जवाब

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के तहत पारित बेदखली के आदेशों से प्रभावित बच्चे, इस अधिनियम की धारा 16 के अंतर्गत अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) के समक्ष इन आदेशों को चुनौती दे सकते हैं।

    जस्टिस प्रकाश पाडिया और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ (Bench) ने हाईकोर्ट के ही पुराने फैसले 'अखिलेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019)' का हवाला दिया। उस मामले में यह माना गया कि ट्रिब्यूनल द्वारा पारित बेदखली के आदेश से प्रभावित बच्चों द्वारा दायर की गई अपील स्वीकार्य (Maintainable) है।

    कोर्ट ने गौर किया कि भले ही धारा 16 को शाब्दिक रूप से पढ़ने पर ऐसा नहीं लगता कि बेदखली के आदेश से प्रभावित बच्चे अपील कर सकते हैं, लेकिन 'अखिलेश कुमार' मामले में खंडपीठ ने इस प्रावधान की एक व्यापक व्याख्या (Purposive Interpretation) अपनाई थी। इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों/माता-पिता और बच्चों के बीच होने वाले "स्पष्ट भेदभाव" को रोकना था, जो तब होता जब अपील का अधिकार केवल एक पक्ष को दिया जाता और दूसरे पक्ष को इससे वंचित रखा जाता।

    कोर्ट ने 'स्टेयर डिसीसिस' (Stare Decisis - पूर्व के न्यायिक निर्णयों का पालन करने का सिद्धांत) का हवाला देते हुए कहा,

    "इसलिए खंडपीठ के रूप में हम एकरूपता बनाए रखने के लिए अपने ही कोर्ट के 'अखिलेश कुमार' मामले वाले फैसले का पालन करते हैं।"

    महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच को यह भी बताया गया कि केंद्र सरकार बच्चों को अपील का अधिकार देने के मुद्दे पर विचार कर रही है। हालांकि, भारत संघ की ओर से पेश वकील ने बेंच को सूचित किया कि अभी तक इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।

    इसके साथ ही कोर्ट ने डॉ. उपासना गिरी द्वारा दायर रिट याचिका का निपटारा किया। उन्होंने प्रयागराज की तहसील सदर के उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) द्वारा 2007 के अधिनियम की धारा 7(1) के तहत पारित एक आदेश को चुनौती दी थी।

    सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और अन्य हाई कोर्ट्स के कई फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में अलग-अलग राय व्यक्त की गई थी कि क्या बच्चे इस अधिनियम के तहत बेदखली के आदेशों के खिलाफ अपील कर सकते हैं या नहीं।

    राज्य सरकार ने 'अखिलेश कुमार' मामले में 2019 के खंडपीठ के फैसले का भी सहारा लिया। अखिलेश कुमार (उपर्युक्त) मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'परमजीत कुमार सरोया बनाम भारत संघ' मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले और 'बालमुरुगन बनाम रुक्मणी' मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को ध्यान में रखा था।

    दोनों मामलों में अदालतों ने यह राय दी कि धारा 16(1) की व्याख्या उसके उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए, और दोनों पक्षों को अपील करने का अधिकार है।

    इन फैसलों को ध्यान में रखते हुए, और इस तथ्य को देखते हुए कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी 'रीता रॉय बनाम मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और सब-डिविजनल ऑफिसर' मामले में यही दृष्टिकोण अपनाया था—कि बेदखली के आदेश से पीड़ित बच्चों द्वारा की गई अपील स्वीकार्य है—अदालत ने कहा कि उसके पास कोई अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई कारण नहीं है।

    अब, मामले के तथ्यों पर आते हुए खंडपीठ ने गौर किया कि याचिकाकर्ता (प्रतिवादी संख्या 5 की संतान) अपीलीय प्राधिकरण के पास जाने के लिए तैयार थी। इसलिए अदालत ने उसे प्रयागराज के जिला मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में भेज दिया।

    अदालत ने प्रयागराज के जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे सभी पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दें और अधिनियम की धारा 16(6) के अनुसार, अपील दायर होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर पूरी अपील पर फैसला सुनाएं।

    पीठ ने प्रतिवादी संख्या 5 के वकील द्वारा दिए गए इस आश्वासन को भी दर्ज किया कि जब तक अपीलीय प्राधिकरण अंतरिम राहत (Interim Relief) की अर्जी पर फैसला नहीं ले लेता, तब तक प्रतिवादी बेदखली की कार्रवाई नहीं करेगा और न ही इसके लिए जोर डालेगा।

    इस आश्वासन को देखते हुए अदालत ने कहा कि अब कोई और सुरक्षा देने की आवश्यकता नहीं है।

    हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को अनुमति दी कि वह तीन दिनों के भीतर जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील और अंतरिम राहत की अर्जी दायर कर सकती है।

    अदालत ने निर्देश दिया कि यदि इस अवधि के भीतर अपील और अर्जी दायर की जाती है तो जिला मजिस्ट्रेट को 16 नवंबर, 2026 को या उससे पहले अंतरिम राहत की अर्जी पर उचित आदेश पारित करना होगा।

    महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने SDM के आदेश को चुनौती देने वाले मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई फैसला नहीं सुनाया है। इसने 3 अक्टूबर, 2026 के आदेश में कोई हस्तक्षेप किए बिना अपील दायर करने की अनुमति दे दी, और यह अपील प्राधिकारी पर छोड़ दिया कि वह तथ्यों और लागू कानून की स्वतंत्र रूप से जांच करे।

    तदनुसार, रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।

    Case Title : Dr. Upasana Giri vs. State Of U.P. And 4 Others 2026 LiveLaw (AB) 918

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