श्रम कानून उल्लंघन मामले में अज़ीम प्रेमजी को राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की आपराधिक कार्यवाही
Amir Ahmad
26 May 2026 1:33 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विप्रो के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अज़ीम प्रेमजी के खिलाफ श्रम कानून उल्लंघन के आरोपों से जुड़े आपराधिक मामला और समन आदेश रद्द किया।
जस्टिस जफीर अहमद की एकलपीठ ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के पद के आधार पर उस पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, जब तक कानून में स्पष्ट रूप से ऐसा प्रावधान न हो या उसके खिलाफ प्रत्यक्ष भूमिका के ठोस आरोप न हों।
अदालत ने कहा,
“केवल पदनाम के आधार पर यांत्रिक तरीके से आपराधिक दायित्व तय नहीं किया जा सकता, जब तक कि कानून में परोक्ष दायित्व का स्पष्ट प्रावधान न हो या आरोपी की सक्रिय भूमिका और जिम्मेदारी से जुड़े विशेष आरोप मौजूद न हों।”
मामला वर्ष 2016 में लखनऊ स्थित विप्रो कार्यालय में कथित श्रम कानून उल्लंघन और वैधानिक दायित्वों के पालन न किए जाने से जुड़ा था। इस संबंध में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में अज़ीम प्रेमजी समेत अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत दायर की गई थी।
हाईकोर्ट में प्रेमजी की ओर से कहा गया कि लखनऊ कार्यालय की सुरक्षा सेवाएं जी4एस सिक्योर सॉल्यूशंस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को आउटसोर्स की गई थीं। यह एजेंसी एक स्वतंत्र ठेकेदार है और अपने कर्मचारियों के वेतन, भविष्य निधि, ईएसआई तथा श्रम कानूनों के पालन के लिए स्वयं जिम्मेदार है।
यह भी दलील दी गई कि अज़ीम प्रेमजी का एजेंसी के कर्मचारियों या उसके कामकाज पर कोई प्रशासनिक या प्रबंधकीय नियंत्रण नहीं था। वह बेंगलुरु में रहते हैं और लखनऊ कार्यालय के दैनिक संचालन में भी शामिल नहीं हैं।
प्रेमजी की ओर से यह भी कहा गया कि कथित उल्लंघन को लेकर उन्हें या विप्रो के किसी प्रतिष्ठान को कोई नोटिस तक नहीं दिया गया। शिकायत में भी उनके खिलाफ किसी सक्रिय भूमिका या आपराधिक मंशा का कोई ठोस आरोप नहीं था।
वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शिकायत में अपराध का खुलासा होता है और ट्रायल कोर्ट द्वारा समन आदेश सही तरीके से पारित किया गया था।
हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में ऐसा कोई विशेष आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो कि प्रेमजी सीधे तौर पर कथित उल्लंघन में शामिल थे या लखनऊ कार्यालय के रोजमर्रा के कामकाज में उनकी कोई सक्रिय भूमिका थी।
अदालत ने समन आदेश को भी संक्षिप्त और बिना कारण वाला बताते हुए कहा कि यह रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर उचित विचार किए बिना औपचारिक तरीके से पारित किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा,
“किसी आपराधिक मामले में आरोपी को तलब करना गंभीर विषय है। समन जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट को मामले के तथ्यों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग करना आवश्यक है।”
अदालत ने यह भी कहा कि समन आदेश में कहीं यह नहीं दिखता कि अदालत ने आरोपी के खिलाफ पर्याप्त आधार होने पर संतोष दर्ज किया हो।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि इसी प्रकार के तथ्यों वाले मामले में पहले भी अदालत की समन्वय पीठ अज़ीम प्रेमजी के पक्ष में फैसला दे चुकी है।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने कहा कि मामले की कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने समन आदेश और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

