Article 161 | समय से पहले रिहाई देने की गवर्नर की शक्ति का मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Shahadat
17 Aug 2026 10:06 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत समय से पहले रिहाई देने की गवर्नर की शक्ति एक संप्रभु कार्यकारी शक्ति है, लेकिन इसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह लागू नियमों और सज़ा में छूट (रेमिशन) की नीति से नियंत्रित होती है।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने यह टिप्पणी तब की जब उन्होंने एक दोषी की समय से पहले रिहाई से इनकार करने वाला आदेश रद्द किया, जिसे 7 साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई गई थी।
कोर्ट ने पाया कि समय से पहले रिहाई से इनकार करने के फैसले में "रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से दिखने वाली गलती" थी, क्योंकि इसमें याचिकाकर्ता द्वारा काटी गई सज़ा की अवधि को गलत तरीके से दर्ज किया गया।
मामले का संक्षिप्त विवरण
याचिकाकर्ता (राम प्रताप सिंह) को 2002 में फतेहपुर के एडिशनल सेशन जज ने IPC की धारा 307/34 के तहत हत्या के प्रयास के मामले में दोषी ठहराया और 7 साल की कठोर कैद के साथ ₹2,000 का जुर्माना लगाया।
हाईकोर्ट में उनकी अपील 2019 में खारिज कर दी गई थी और उसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी स्पेशल लीव पिटिशन खारिज की थी।
सितंबर 2022 में उनकी समय से पहले रिहाई का प्रस्ताव जेल अधिकारियों और फतेहपुर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को भेजा गया, लेकिन यह लंबित रहा। बाद में याचिकाकर्ता ने फरवरी 2025 में प्रस्ताव पर फैसले के लिए एक आवेदन दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी सज़ा का आधे से ज़्यादा हिस्सा काट लिया।
जेल रिपोर्ट में दर्ज था कि उन्होंने कुल 7 साल की सज़ा में से बिना छूट के 4 साल, 6 महीने और 6 दिन और छूट के साथ 5 साल और 4 महीने जेल में बिताए थे। उनका आचरण संतोषजनक दर्ज किया गया।
हालांकि, जून 2025 में, उनकी समय से पहले रिहाई से इनकार करने का फैसला बताया गया, जिसका आधार यह था कि उन्होंने बिना छूट के केवल 2 साल और 6 दिन और छूट के साथ 2 साल, 1 महीने और 27 दिन जेल में बिताए।
हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि फैसले में जेल रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ किया गया और उनकी जेल की अवधि की गलत गणना की गई। उन्होंने यह भी कहा कि आदेश में उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल बात नहीं बताई गई और जेल में उनके संतोषजनक आचरण पर विचार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमत होते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश कैदी प्रोबेशन पर रिहाई नियम, 1938' के नियम 4 के उप-नियम (iii) के तहत लागू श्रेणी का कोई दोषी बिना छूट (Remission) के अपनी सज़ा का एक-तिहाई हिस्सा पूरा करने के बाद समय से पहले रिहाई के लिए पात्र हो जाता है।
चूंकि याचिकाकर्ता ने सात साल की सज़ा में से बिना छूट के असल में 4 साल, 6 महीने और 6 दिन बिताए, इसलिए कोर्ट ने पाया कि उसने सज़ा का आधे से ज़्यादा हिस्सा पूरा कर लिया था।
बेंच ने टिप्पणी की:
"इस निष्कर्ष का कोई आधार नहीं है, सिवाय इसके कि यह एक स्पष्ट गलती का नतीजा है और यह रिकॉर्ड पर ठीक से ध्यान न देने का मामला भी है"।
कोर्ट ने जेल में बिताई गई अवधि को गलत तरीके से पढ़ने को "साफ़ तौर पर गैर-कानूनी" भी बताया।
अनुच्छेद 161 के तहत गवर्नर की शक्ति की प्रकृति पर बेंच ने कहा कि इसका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। बेंच ने ज़ोर दिया कि यह शक्ति नियमों और छूट नीति (Remission Policy) द्वारा नियंत्रित होती है।
कोर्ट ने कहा,
"भले ही अनुच्छेद 161 के तहत शक्ति एक संवैधानिक शक्ति है - जो CrPC की धारा 432 के तहत राज्य सरकार की कानूनी शक्ति से अलग है - फिर भी इसका फ़ैसला मनमाना या किसी स्पष्ट गलती पर आधारित नहीं हो सकता, खासकर तब जब मामला दोषी द्वारा जेल में बिताई गई अवधि का हो।"
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर हिरासत की सही अवधि के बारे में प्रतिवादियों (Respondents) को जानकारी दी गई होती, तो नतीजा कुछ और हो सकता था।
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि अस्वीकृति का आदेश समय से पहले रिहाई के खिलाफ़ ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक की सिफ़ारिशों पर आधारित था। हालांकि, न तो विवादित आदेश में और न ही राज्य के जवाब में उन रिपोर्टों की जानकारी दी गई।
बेंच ने कहा कि अगर सिफ़ारिशें "बिना किसी कारण के और अधिकारियों की अपनी मनमानी राय (ipse dixit)" पर आधारित थीं तो संबंधित अधिकारियों से नई राय लेनी होगी। नतीजतन, कोर्ट ने माना कि विवादित आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
इसके बाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका को मंज़ूरी दी और याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई से इनकार करने वाला 26 जून, 2025 का आदेश रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई की अर्ज़ी पर नए सिरे से फ़ैसला लेने के लिए मामला सरकार को भेजा गया; यह फ़ैसला हाई कोर्ट का आदेश मिलने के 1 महीने के भीतर लिया जाना है।
याचिकाकर्ता के वकील: सैयद मोहम्मद जाफ़र हुसैन, सैयद वाजिद अली
Case title - Ram Pratap Singh vs. State of U.P. and others 2026 LiveLaw (AB) 588


