गवाहों को पेश करने के लिए समन व कार्रवाई लागू न करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई चिंता

  • गवाहों को पेश करने के लिए समन व कार्रवाई लागू न करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई चिंता

    हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट के पिछले आदेशों के बावजूद गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिये समन जारी करने और दंडात्मक उपायों को लागू करने में पुलिस की नाकामी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

    IPC की धारा 363, 366, 376, 384 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5/6 और आईटी अधिनियम की धारा 67ए के तहत अपराधों के लिए 2022 से जेल में बंद आरोपियों की दूसरी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस अजय भनोट ने कहा,"वैधानिक जनादेश के बावजूद मुकदमे में गवाहों की उपस्थिति को मजबूर करने के लिए पुलिस अधिकारियों द्वारा समन की तामील करने या कठोर उपायों को निष्पादित करने में विफलता के कारण परीक्षणों में देरी गंभीर चिंता का विषय है।

    हालांकि अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि उस पर नाबालिग के बलात्कार का आरोप लगाया गया था, अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को उचित समय-सीमा के भीतर, अधिमानतः, हाईकोर्ट के आदेश की प्राप्ति की तारीख से एक वर्ष के भीतर मुकदमे को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

    ट्रायल कोर्ट को उन गवाहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए जो मुकदमे की कार्यवाही में पेश होने में विफल रहते हैं, कोर्ट ने कहा कि देरी मुख्य रूप से समन की तामील न होने और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने में पुलिस अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की कमी के कारण हुई।

    भंवर सिंह @ कर्मवीर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिनांक 10-11-2008 को अपने निर्णय में यह उल्लेख किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने भंवर सिंह @ करमवीर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया है।और जितेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जहां पुलिस प्राधिकारियों को समन की समय पर तामील सुनिश्चित करने और विचारण में उपस्थित न होने वाले गवाहों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए थे, न्यायालय ने विचारण न्यायालय को उपर्युक्त आदेशों के अनुपालन की जांच करने का निदेश दिया।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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