इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1999 के चारहरे हत्याकांड में माँ और उसके 'प्रेमी' के खिलाफ नाबालिग बेटों की गवाही के आधार पर सज़ा बरकरार रखी

Shahadat

8 April 2026 8:35 PM IST

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1999 के चारहरे हत्याकांड में माँ और उसके प्रेमी के खिलाफ नाबालिग बेटों की गवाही के आधार पर सज़ा बरकरार रखी

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की सज़ा और आजीवन कारावास बरकरार रखी। इस व्यक्ति ने 1999 में अपनी कथित प्रेमिका (सह-आरोपी, अब मृत) के साथ मिलकर एक क्रूर चारहरे हत्याकांड को अंजाम दिया था।

    जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस ज़फीर अहमद की बेंच ने 2 नाबालिग बच्चों की 'स्वाभाविक' और 'लगातार' गवाही पर काफी भरोसा किया। इन बच्चों ने अपराध को अपनी आँखों से देखा था और अपनी माँ (सह-आरोपी, अब मृत) और उसके कथित प्रेमी (अपीलकर्ता) के खिलाफ गवाही दी थी।

    अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 18 और 19 मई, 1999 की दरमियानी रात को आरोपी पत्नी (गुरदीप कौर) ने एक FIR दर्ज कराई। उसने आरोप लगाया कि हथियारबंद बदमाश उनके घर में घुस आए और उसके पति, उसकी पहली पत्नी, उसकी माँ और एक मेहमान की हत्या की।

    जांच ​​के दौरान, कौर और उसके कथित प्रेमी/तरसेम सिंह (अपीलकर्ता) के नाम सामने आए। पता चला कि उन्होंने हत्याएं इसलिए की थीं, क्योंकि उन्हें पता चल गया कि उसके पति को उनके प्रेम-संबंध के बारे में पता चल गया और वह उन्हें मारने की योजना बना रहा है।

    आरोपी पत्नी (कौर) की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई और उसके खिलाफ चल रही कार्यवाही समाप्त की गई। अपीलकर्ता-तरसेम सिंह को ट्रायल कोर्ट ने 2008 में दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को मुख्य रूप से मृतक के दो नाबालिग बेटों की आंखों देखी गवाही के आधार पर दोषी ठहराया। गवाही देते समय उनकी उम्र 15 और 12 साल थी। आधी रात को गोलियों की आवाज़ सुनकर बच्चे जाग गए।

    कोर्ट में उन्होंने गवाही दी कि उन्होंने तरसेम सिंह (अपीलकर्ता) को एकनाली बंदूक के साथ और अपनी माँ (कौर) को एक बड़ा चाकू लिए हुए देखा था।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि नाबालिगों ने घटना का एक स्पष्ट और विस्तृत ब्योरा दिया, जिसमें घटनाओं के क्रम को छोटी-छोटी, विशिष्ट जानकारियों के साथ बताया गया।

    हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि बच्चों को सिखा-पढ़ाकर तैयार किया गया और उनकी गवाही अविश्वसनीय थी, क्योंकि उन पर सिखाने का असर पड़ सकता था और उनकी गवाही में कई बड़ी विसंगतियाँ थीं। यह तर्क भी दिया गया कि प्रत्यक्षदर्शी और मेडिकल सबूतों के बीच काफ़ी विसंगतियां हैं, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी संदिग्ध हो जाती है।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने पाया कि नाबालिगों द्वारा घटना के बारे में दिया गया ब्योरा—जिसमें अंदर आने का तरीका, साथ लाए गए हथियार और हमले का क्रम शामिल था—साफ़ तौर पर यह दिखाता था कि उन्होंने वास्तव में घटना को अपनी आँखों से देखा था।

    बेंच ने राय दी कि उनकी गवाही स्वाभाविक थी और उसमें आंतरिक सच्चाई थी। बेंच ने आगे कहा कि उन्होंने जो विवरण बताए, वे घटना की वास्तविक जानकारी के बिना मनगढ़ंत नहीं हो सकते थे।

    बेंच ने टिप्पणी की,

    "ट्रायल कोर्ट ने सही ही कहा कि कोई बच्चा आमतौर पर हत्या जैसे गंभीर अपराध में अपनी ही माँ को झूठा नहीं फंसाएगा, जबकि उसे पूरी तरह पता हो कि ऐसा करने से उसकी माँ को सज़ा हो सकती है। इस टिप्पणी का काफ़ी महत्व है।"

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि प्रत्यक्षदर्शी की गवाही मेडिकल सबूतों से पूरी तरह मेल खाती थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्टों से इस बात की पुष्टि हुई कि पीड़ितों को गोली लगने के घाव और गहरे चाकू के घाव, दोनों तरह की चोटें आई थीं।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि फोरेंसिक जांच से बरामद हथियार की बैरल में सीसे और नाइट्राइट के अवशेष मिले, जिससे यह साफ़ हो गया कि उस हथियार का इस्तेमाल किया गया।

    कोर्ट ने पाया कि आरोपी की निशानदेही पर अपराध से जुड़े सामान और हथियार की बरामदगी, साथ ही हथियार के इस्तेमाल की पुष्टि करने वाले फोरेंसिक सबूतों ने अभियोजन पक्ष के मामले को और भी मज़बूत बना दिया।

    हाईकोर्ट ने अंततः अपील खारिज की और ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि सबूत लगातार आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा कर रहे थे। ऐसा कोई उचित आधार नहीं था, जिसके आधार पर आरोपी को निर्दोष माना जा सके।

    Case title - Tarsem Singh vs State of UP 2026 LiveLaw (AB) 189

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