स्वेच्छा से हिंदू धर्म अपनाने वाले मुस्लिम व्यक्ति का धर्मांतरण आवेदन खारिज करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ADM को लगाई फटकार

Praveen Mishra

12 May 2026 11:57 AM IST

  • स्वेच्छा से हिंदू धर्म अपनाने वाले मुस्लिम व्यक्ति का धर्मांतरण आवेदन खारिज करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ADM को लगाई फटकार

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध कानून के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति के हिंदू धर्म अपनाने के मामले में ADM की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताई है। कोर्ट ने कहा कि ADM ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बार-बार पुलिस जांच करवाई और आपराधिक मामले को आधार बनाकर धर्मांतरण प्रमाणन आवेदन खारिज कर दिया।

    जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने फिलहाल प्रयागराज के ADM (प्रशासन) द्वारा पारित उस आदेश को स्थगित कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ता के 'सनातन धर्म' अपनाने की घोषणा को स्वीकार करने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने ADM को तीन सप्ताह के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।

    मामला इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अनिल पंडित (पूर्व नाम मोहम्मद अहसान) से जुड़ा है। उन्होंने 12 जनवरी 2022 को यूपी धर्मांतरण कानून की धारा 8 के तहत धर्म परिवर्तन की घोषणा दी थी। बाद में आर्य समाज मंदिर में 14 मार्च 2022 को विधिवत धर्मांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई।

    2022 और 2023 में पुलिस की दो जांच रिपोर्टों में स्पष्ट कहा गया कि धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ और इसमें किसी प्रकार का दबाव या प्रलोभन नहीं था। इसके बावजूद ADM ने एक और जांच रिपोर्ट मंगवाई, क्योंकि याचिकाकर्ता के ससुर ने उसके खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। ससुर अपनी बेटी की शादी का विरोध कर रहे थे।

    अंततः 9 अगस्त 2024 को ADM ने धर्मांतरण प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया। आदेश में FIR, चार्जशीट और दंपति के बीच हुए 1 लाख रुपये के लेनदेन को आधार बनाया गया। ADM ने माना कि धर्मांतरण विवाह के उद्देश्य से और कथित प्रभाव में किया गया।

    हाईकोर्ट ने दंपति से व्यक्तिगत बातचीत के बाद पाया कि दोनों ने स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। पत्नी ने कोर्ट को बताया कि 1 लाख रुपये की रकम मेडिकल इमरजेंसी के दौरान एक मित्र के रूप में दी गई आर्थिक सहायता थी।

    कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत केवल प्रक्रिया की जांच की जानी थी, न कि विवाह की वैधता या आपराधिक मामले की। पीठ ने टिप्पणी की कि FIR दर्ज होने के बाद बार-बार जांच कराना ADM द्वारा “ऐसी शक्ति का प्रयोग” था, जो कानून ने उसे दी ही नहीं।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल चार्जशीट दाखिल होने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अपराध सिद्ध होना ट्रायल का विषय है।

    अदालत ने दंपति को राहत देते हुए कहा कि वे सम्मानपूर्वक वैवाहिक जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं और पुलिस उनके जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेगी। मामले की अगली सुनवाई 27 मई 2026 को होगी।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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