दुर्घटना में 5 माह या उससे अधिक के अजन्मे बच्चे की मृत्यु पर भी रेलवे मुआवजा देने का जिम्मेदार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

20 March 2026 10:18 PM IST

  • दुर्घटना में 5 माह या उससे अधिक के अजन्मे बच्चे की मृत्यु पर भी रेलवे मुआवजा देने का जिम्मेदार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह निर्णय दिया कि माँ के गर्भ में पाँच महीने या उससे अधिक आयु का अजन्मा बच्चा (भ्रूण) एक जीवित बच्चे के समान माना जाएगा और ऐसे भ्रूण की आकस्मिक मृत्यु के लिए रेलवे अलग से मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी होगा, जो माँ की मृत्यु के लिए दिए गए मुआवजे से पृथक होगा।

    जस्टिस प्रशांत कुमार की पीठ ने लखनऊ स्थित रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार करते हुए भ्रूण की मृत्यु के लिए दावेदार को अतिरिक्त ₹8,00,000/- का मुआवजा प्रदान किया।

    यह उल्लेखनीय है कि ट्रिब्यूनल ने गर्भवती महिला की मृत्यु के लिए मुआवजा दिया था, लेकिन उसके 8-9 महीने के भ्रूण की मृत्यु के लिए कोई राहत नहीं दी थी।

    कोर्ट ने कहा कि यद्यपि रेलवे अधिनियम, 1989 में 'भ्रूण' शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी वर्तमान मामले में मृत्यु रेलवे दुर्घटना से उत्पन्न 'अनटुवर्ड इंसीडेंट' के कारण हुई है, इसलिए धारा 124A के तहत रेलवे पर मुआवजा देने की वैधानिक जिम्मेदारी है।

    संक्षेप में, 2 सितंबर 2018 को भानमती नामक महिला मरुधर एक्सप्रेस से बाराबंकी से बांदीकुई रेलवे स्टेशन जा रही थी। ट्रेन में चढ़ते समय वह दुर्घटनावश गिर गई और घायल हो गई, बाद में इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।

    मृत्यु के समय वह लगभग 8-9 महीने के गर्भ से थी और भ्रूण की भी उसके साथ ही मृत्यु हो गई। इसके बाद मृतका के परिजनों ने मार्च 2019 में ट्रिब्यूनल के समक्ष दावा याचिका दायर की।

    ट्रिब्यूनल ने यह निष्कर्ष निकाला कि मृतका एक वैध यात्री थी और उसकी मृत्यु ट्रेन में चढ़ते समय गिरने से हुई, जो 'अनटुवर्ड इंसीडेंट' के दायरे में आता है, इसलिए फरवरी 2025 में ₹8,00,000/- का मुआवजा दिया गया।

    दावेदार ने हाईकोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी कि भ्रूण की मृत्यु के लिए कोई मुआवजा नहीं दिया गया।

    दावेदार के वकील ने कर्नाटक, दिल्ली और मद्रास हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया, जिनमें यह माना गया है कि मुआवजे की गणना के लिए भ्रूण की मृत्यु को बच्चे की मृत्यु के समान माना जाना चाहिए।

    इन निर्णयों से सहमत होते हुए पीठ ने कहा कि गर्भ में पाँच महीने या उससे अधिक आयु का अजन्मा बच्चा जन्म तक एक जीवित बच्चे के समान माना जा सकता है।

    कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि इस मामले में एक ऐसे मानव भ्रूण की मृत्यु हुई है जिसे व्यक्ति का दर्जा दिया जा सकता है, इसलिए उसकी मृत्यु के लिए हर्जाने का दावा किया जा सकता है।

    पीठ ने यह माना कि अपीलकर्ता-दावेदार भ्रूण की मृत्यु के लिए मुआवजे का हकदार है और भ्रूण को स्वतंत्र रूप से एक बच्चे के रूप में माना जाएगा।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत बच्चे के लिए मुआवजा अलग तरीके से निर्धारित किया जाता है और रेलवे दुर्घटना एवं अनटुवर्ड इंसीडेंट (मुआवजा) नियम, 1990 के अनुसार मृत्यु की स्थिति में मुआवजे की राशि ₹8,00,000/- निर्धारित है।

    अतः यह कहते हुए कि भ्रूण को बच्चे के समान माना जाएगा, पीठ ने कहा कि भ्रूण/बच्चे की मृत्यु को माँ की मृत्यु से अलग एक स्वतंत्र घटना माना जाएगा और इस प्रकार दावेदार को भ्रूण की मृत्यु के लिए अतिरिक्त ₹8,00,000/- का मुआवजा मिलेगा।

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