इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कस्टडी में हुई मौत के मामले में मुआवज़ा न देने के आरोप में यूपी के होम सेक्रेटरी को किया तलब

Shahadat

26 July 2026 10:34 PM IST

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कस्टडी में हुई मौत के मामले में मुआवज़ा न देने के आरोप में यूपी के होम सेक्रेटरी को किया तलब

    इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (गृह) संजय प्रसाद को अवमानना ​​याचिका के मामले में व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए तलब किया। यह याचिका कस्टडी में हुई मौत के मामले में मुआवज़ा देने और ऐसे मामलों में मुआवज़ा देने के लिए गाइडलाइंस बनाने के डिवीज़न बेंच के आदेश का पालन न करने के आरोप में दायर की गई।

    अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सौरभ लवानिया की बेंच ने पाया कि राज्य सरकार डिवीज़न बेंच के 20 फरवरी, 2026 के फैसले में दिए गए दो मुख्य निर्देशों का पालन करने में विफल रही है।

    कोर्ट ने पाया कि राज्य ने मृतक के कानूनी वारिसों को 10 लाख रुपये का पूरा मुआवज़ा नहीं दिया। कोर्ट ने यह भी पाया कि कस्टडी में हुई मौत के मामलों में मुआवज़ा देने के लिए डिवीज़न बेंच के फैसले के पैरा 23 के तहत जिन गाइडलाइंस को बनाने का निर्देश दिया गया था, वे अब तक नहीं बनाई गईं।

    कोर्ट ने कहा:

    "इस प्रकार, यह कोर्ट मानता है कि संबंधित अधिकारी 1971 के अधिनियम की धारा 12 के तहत सज़ा का पात्र है। इसलिए अगली तारीख पर संबंधित अधिकारी, यानी श्री संजय प्रसाद, प्रमुख सचिव, गृह विभाग, यूपी सरकार, सिविल सचिवालय, लखनऊ की इस कोर्ट के समक्ष उपस्थिति आवश्यक है..."

    मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को होगी, जिसमें आरोप तय करने की प्रक्रिया भी शामिल है।

    गौरतलब है कि अवमानना ​​की कार्यवाही एक महिला (प्रेमा देवी) द्वारा 'कंटेंप्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट, 1971' की धारा 12 के तहत शुरू की गई है। यह कार्यवाही 'प्रेमा देवी बनाम यूपी राज्य (प्रमुख सचिव, गृह विभाग, लखनऊ के माध्यम से) व अन्य' (2026 LiveLaw AB 91) मामले में हाई कोर्ट के 20 फरवरी, 2026 के आदेश के उल्लंघन के कारण शुरू की गई।

    इस मामले में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि अपनी कस्टडी में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, भले ही मौत स्पष्ट रूप से अप्राकृतिक आत्महत्या ही क्यों न हो।

    जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजिव शुक्ला की बेंच ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और मानवीय गरिमा का अधिकार एक ऐसा मौलिक, कभी न छीना जा सकने वाला और हर जगह लागू होने वाला अधिकार है, जो उस व्यक्ति को भी मिलता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया हो।

    इसके अलावा, बेंच ने हिरासत में दी जाने वाली यातना को मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन बताया और कहा कि हिरासत में हिंसा और मौतें कानून के शासन की नींव पर चोट करती हैं।

    रिट याचिका स्वीकार करते हुए डिवीजन बेंच ने राज्य को आदेश दिया कि वह मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को 3 हफ़्ते के भीतर 10 लाख रुपये का भुगतान करे।

    बेंच ने यूपी सरकार से यह भी कहा कि वह हिरासत में मौत के मामलों में मुआवज़ा देने के लिए उम्र, आय और आश्रितों पर आधारित 'मल्टीप्लायर मेथड' (जैसा कि मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 में है) जैसे उचित और ठोस पैमाने अपनाए।

    अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस लवानिया ने पाया कि इनमें से किसी भी निर्देश का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया। इसलिए कोर्ट ने अब इस मामले में आगे की कार्यवाही के लिए प्रमुख सचिव (गृह) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया।

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