POCSO पीड़िताओं के गर्भसमापन मामलों में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट चिंतित; 24 हफ्ते से पहले बेहतर व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई

Praveen Mishra

13 Feb 2026 5:42 PM IST

  • POCSO पीड़िताओं के गर्भसमापन मामलों में देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट चिंतित; 24 हफ्ते से पहले बेहतर व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि यद्यपि 24 सप्ताह तक गर्भसमापन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) मौजूद है, फिर भी बलात्कार पीड़िताएं अक्सर गर्भ का पता देर से चलने के कारण समयसीमा के अंतिम चरण में अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं।

    जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस इन्द्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि कानून 20 से 24 सप्ताह तक, विशेष परिस्थितियों—जैसे दुष्कर्म—में गर्भसमापन की अनुमति देता है, लेकिन जानकारी की कमी, सामाजिक दबाव और प्रक्रियागत समझ के अभाव में “कीमती समय” नष्ट हो जाता है। अदालत ने नोट किया कि जहां समय उपलब्ध होता है, वह त्वरित राहत देती रही है, फिर भी SOP लागू होने के बावजूद ऐसी याचिकाओं का सिलसिला जारी है।

    यह PIL उस रिट याचिका से उत्पन्न हुई थी, जिसमें एक POCSO पीड़िता ने गर्भसमापन की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कानून और SOP मौजूद हैं, जो राज्य की इच्छाशक्ति दर्शाते हैं; परन्तु क्रियान्वयन में कमियां हैं। अभियोजन पर जोर देते समय पुलिस अक्सर मानवीय पहलू की अनदेखी कर देती है और पीड़िता के अधिकार पीछे छूट जाते हैं।

    अदालत ने सुझाव दिया कि राज्य के पास एक समग्र नीति हो—स्पष्ट प्रक्रियात्मक विवरण और सभी स्तरों पर प्रभावी मॉनिटरिंग के साथ—जो दुष्कर्म की रिपोर्टिंग से लेकर गर्भसमापन की पेशकश/उपचार तक लागू हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि नोडल प्राधिकरण, विशेषज्ञ काउंसलर, प्रोबेशन अधिकारी और मेडिकल विशेषज्ञों की समन्वित व्यवस्था हो, ताकि पीड़िता और उसके परिवार को उपलब्ध विकल्पों—गर्भसमापन, पूर्ण अवधि तक गर्भ धारण, या दत्तक ग्रहण—के बारे में समय पर परामर्श मिल सके।

    खंडपीठ ने यह भी रेखांकित किया कि 24 सप्ताह की सीमा के उल्लंघन से बचने के लिए प्रारंभिक स्तर पर गर्भ-परीक्षण जैसी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि पीड़िता समयसीमा के भीतर निर्णय ले सके। साथ ही, पीड़िताओं के लिए मुआवजा योजनाएं और ट्रायल के लिए भ्रूण संरक्षण (जहां आवश्यक) जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देने को कहा।

    इस संदर्भ में अदालत ने प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, उत्तर प्रदेश से हलफनामा तलब किया है। मामले को 13.03.2026 को सूचीबद्ध किया गया है।

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