बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट के कब्ज़ा देने का आरोप: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाज़ियाबाद के गुलमोहर ग्रीन्स के निरीक्षण का आदेश दिया
Shahadat
21 Sept 2026 7:51 PM IST

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाज़ियाबाद के गुलमोहर ग्रीन्स के निरीक्षण और वहां की असल स्थिति की जांच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किए। यहां बिल्डर ने गाज़ियाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी से कंप्लीशन सर्टिफिकेट लिए बिना ही फ्लैट का कब्ज़ा दे दिया।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की बेंच ने वकील संजय कुमार ओम और प्रखर कुमार श्रीवास्तव को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया। उन्हें साइट पर जाकर प्रोजेक्ट की स्थिति और फ्लैट मालिकों के पास फ्लैट के कब्ज़े के बारे में सही जानकारी देने को कहा गया।
गाज़ियाबाद में गुलमोहर ग्रीन्स के फ्लैट मालिकों (याचिकाकर्ताओं) ने हाईकोर्ट में गाज़ियाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी के कंपाउंडिंग ऑर्डर को चुनौती दी थी। ओरिजिनल लेआउट प्लान के अनुसार, कुल 35 टावर बनने थे, जिनमें 904 फ्लैट होने थे। लेकिन, सिर्फ़ 34 टावर ही बनाए गए, जो ओरिजिनल मंज़ूर प्लान के मुताबिक नहीं था।
इसके बाद कंपनी के प्रमोटर ने ओरिजिनल मंज़ूर नक्शे में पहली कंपाउंडिंग के लिए आवेदन किया और 15.11.2011 को इसे मंज़ूरी मिल गई। प्रमोटर ने दूसरी कंपाउंडिंग के लिए भी आवेदन किया, जिसे भी मंज़ूरी दे दी गई। दलील दी गई कि कंपाउंडिंग के ज़रिए और फ्लैट जोड़ने का प्रस्ताव था, जिससे ओरिजिनल कॉमन एरिया कम हो गया। फ्लैट मालिकों ने तर्क दिया कि इससे यूपी अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और रखरखाव को बढ़ावा) एक्ट, 2010 का उल्लंघन हुआ।
इससे पहले कोर्ट ने कहा,
"इस मामले में यह बात निर्विवाद है कि आज तक बिल्डर-रेस्पोंडेंट नंबर 3 ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट हासिल नहीं किया। फिर भी फ्लैट का कब्ज़ा दे दिया गया। यह उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और रखरखाव को बढ़ावा) एक्ट, 2010 (संक्षेप में 'एक्ट, 2010') की धारा 4 (5) का खुला उल्लंघन है। ऐसा ही प्रावधान, यानी धारा 15-A, उत्तर प्रदेश शहरी योजना और विकास एक्ट, 1973 में भी है..."
कोर्ट ने पाया कि बिल्डर ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट लिए बिना ही फ्लैट का कब्ज़ा दे दिया। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि अथॉरिटी की गलती थी कि उसने कंप्लीशन सर्टिफिकेट (पूरा होने का प्रमाण-पत्र) लिए बिना ही बिल्डर को फ्लैट खरीदारों को कब्ज़ा सौंपने दिया।
कोर्ट ने सवाल किया,
"अगर दूसरे प्रतिवादी (अथॉरिटी) ने असल में कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी करने को लेकर आपत्तियां उठाई थीं और बिल्डर के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई तो यह बताना ज़रूरी है कि उसके बाद खरीदारों को कब्ज़ा सौंपने की इजाज़त कैसे दी जा सकती थी?"
इसके बाद कोर्ट ने गाज़ियाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी के वाइस चेयरमैन और उत्तर प्रदेश (लखनऊ) के हाउसिंग और टाउन प्लानिंग विभाग के प्रधान सचिव को इस सवाल का जवाब देने के लिए बुलाया। कोर्ट ने देखा कि हालांकि उनके हलफनामों से पता चला कि बिल्डर को नोटिस जारी किए गए, लेकिन इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि बिल्डर के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
आगे कहा गया,
"इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने 2012 में फ्लैट खरीदे थे और सेल डीड (बिक्री विलेख) के निष्पादन के बाद उन्हें कब्ज़ा सौंप दिया गया, जबकि यह बात मानी गई है कि कोई कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं लिया गया। कोर्ट को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि जब संबंधित प्रतिवादी ने कंप्लीशन सर्टिफिकेट लेने की कानूनी ज़रूरत का पालन नहीं किया और यह बात संबंधित अधिकारियों को पता थी तो बाद में 13.01.2015 और 18.12.2024 को नया कंपाउंडिंग मैप कैसे मंज़ूर कर दिया गया।"
याचिकाकर्ताओं ने अतिरिक्त हलफनामा दायर कर कहा कि बिल्डर ने मंज़ूर किए गए मैप के खिलाफ और कानून का उल्लंघन करते हुए अतिरिक्त मंज़िलें बनाई थीं। हालांकि, प्रतिवादियों ने इस बात का विरोध किया। इसलिए कोर्ट ने ज़मीनी हकीकत की जांच और पुष्टि करने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किए।
इस मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को होगी।

