FIR में नाम होना मात्र दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 40 साल पुराने हत्या मामले में दो आरोपियों को बरी किया
Praveen Mishra
22 Aug 2026 9:49 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब चार दशक पुराने हत्या मामले में दो आरोपियों नागेंद्र और जुगेंद्र को बरी करते हुए कहा कि केवल FIR में नाम होना, बिना किसी विशिष्ट भूमिका या विश्वसनीय साक्ष्य के, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता।
जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा की पीठ ने दोनों की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। दोनों आरोपी उन आठ आरोपियों में शामिल थे, जिन्हें IPC की धाराओं 147, 148, 302/149, 325/149 और 323/149 के तहत दोषी ठहराया गया था। अपील लंबित रहने के दौरान अन्य छह आरोपियों की मृत्यु हो गई।
अभियोजन के अनुसार, आरोपियों और शिकायतकर्ता के बीच पहले से मुकदमेबाजी को लेकर रंजिश थी। घटना वाले दिन आरोपी कथित तौर पर लाठी, भाला, फावड़ा और गंडासा लेकर एक घर के पास इकट्ठा हुए और ओमपाल सिंह पर हमला किया, जिसकी बाद में मौत हो गई। बचाने पहुंचे उसके परिवार के सदस्यों के साथ भी मारपीट की गई।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि नागेंद्र और जुगेंद्र के खिलाफ FIR में नाम होने के बावजूद कोई विशिष्ट भूमिका या हथियार नहीं बताया गया था। कोर्ट ने कहा, “सिर्फ FIR में नाम होना अपने आप में उनकी दोषसिद्धि स्थापित नहीं कर सकता।”
पीठ ने यह भी नोट किया कि अभियोजन के पांच तथ्यात्मक गवाहों में से केवल सूचनाकर्ता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन किया, जबकि अन्य गवाह पक्षद्रोही हो गए। घायल गवाह ने भी यह स्पष्ट नहीं किया कि किस व्यक्ति के पास कौन-सा हथियार था या किसने उस पर हमला किया। मृतक की पत्नी और कथित घायल गवाह ने भी हमलावरों की पहचान नहीं की।
धारा 149 IPC पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
धारा 149 IPC के तहत सामूहिक या परोक्ष आपराधिक दायित्व तय करने के लिए अभियोजन को पहले यह साबित करना होता है कि धारा 141 IPC के अर्थ में कोई गैरकानूनी सभा मौजूद थी, आरोपी उसका सदस्य था और उसका आवश्यक साझा उद्देश्य (common object) था या उसे इसकी जानकारी थी।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Kuldip Yadav v. State of Bihar और Ramachandran v. State of Kerala के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल घटनास्थल पर मौजूद होना या किसी समूह का सदस्य होना धारा 149 IPC लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पीठ ने कहा, “महज मौजूदगी, अपने आप में, धारा 149 IPC के तहत परोक्ष आपराधिक दायित्व लगाने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।”
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने यह तक स्पष्ट रूप से तय नहीं किया था कि कथित समूह किस तरह धारा 141 IPC के तहत गैरकानूनी सभा बना, उसका साझा उद्देश्य क्या था, वह कब और कहां बना और नागेंद्र तथा जुगेंद्र ने उस उद्देश्य को किस प्रकार साझा किया।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य से दोनों आरोपियों की कथित गैरकानूनी सभा में उपस्थिति, भागीदारी और साझा उद्देश्य संतोषजनक रूप से साबित नहीं हुआ। इसलिए धारा 149 IPC के तहत उनकी दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
पीठ ने दोनों की अपील मंजूर करते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी तथा उन्हें बरी कर दिया।


