पति के नाम दर्ज जमीन पर खेती करने वाली पत्नी भी 'कमाऊ सदस्य', किसान दुर्घटना कल्याण योजना का लाभ देने से इनकार नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • पति के नाम दर्ज जमीन पर खेती करने वाली पत्नी भी कमाऊ सदस्य, किसान दुर्घटना कल्याण योजना का लाभ देने से इनकार नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई महिला अपने पति के नाम दर्ज कृषि भूमि पर खेती का काम करती है और उस जमीन से होने वाली कृषि आय उसके परिवार की आजीविका का मुख्य स्रोत है, तो उसे मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत परिवार का 'कमाऊ सदस्य' (Earning Member) माना जाएगा।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर योजना का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिला का नाम राजस्व अभिलेखों में खातेदार के रूप में दर्ज नहीं है या वह बटाईदार नहीं है।

    जस्टिस प्रकाश पडिया और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि परिवार में कृषि कार्य पति-पत्नी संयुक्त रूप से कर सकते हैं। खेती में पत्नी का योगदान केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह घरेलू जिम्मेदारियां भी निभाती है।

    कोर्ट ने कहा,“परिवार की कृषि भूमि पर पत्नी द्वारा किया गया योगदान उसे कमाऊ सदस्य मानने से बाहर नहीं करता। उसकी स्थिति इस आधार पर तय होगी कि वह कौन-सा काम करती है और उससे प्राप्त होने वाली आजीविका पर उसकी कितनी निर्भरता है। पति द्वारा उसे अलग से मजदूरी देना धारा 2(2) के तहत कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।”

    क्या था मामला?

    याचिकाकर्ता की पत्नी मीरा की 20 अगस्त, 2020 को सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 31 अक्टूबर, 2020 को मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के तहत मुआवजे के लिए आवेदन किया।

    आवेदन के समर्थन में उसने खतौनी, FIR, मृत्यु प्रमाणपत्र और परिवार रजिस्टर की नकल सहित संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए। खतौनी में याचिकाकर्ता का नाम उसके भाइयों के साथ सह-खातेदार के रूप में दर्ज था।

    हालांकि, जिलाधिकारी कुशीनगर ने 24 मई, 2022 को यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक महिला के नाम कोई कृषि भूमि दर्ज नहीं थी और वह बटाईदार भी नहीं थी।

    याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसकी पत्नी पति के नाम दर्ज कृषि भूमि पर खेती करती थी और परिवार की आजीविका मुख्य रूप से उसकी कृषि आय पर निर्भर थी। उसने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने योजना के तहत परिवार के कमाऊ सदस्य के लिए निर्धारित अलग पात्रता श्रेणी पर विचार नहीं किया।

    वहीं, राज्य सरकार ने दलील दी कि मृतका घरेलू महिला थी, उसका नाम सह-खातेदार के रूप में दर्ज नहीं था और उसके सह-हिस्सेदार होने का कोई दस्तावेजी प्रमाण भी नहीं दिया गया था।

    योजना में किसान की तीन श्रेणियां निर्धारित

    कोर्ट ने बताया कि मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना को 28 फरवरी, 2020 के शासनादेश के माध्यम से 14 सितंबर, 2019 से प्रभावी किया गया था।

    योजना के क्लॉज 2 के तहत किसान की तीन अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित की गई हैं:

    खतौनी में दर्ज खातेदार या सह-खातेदार।

    ऐसे खातेदार के परिवार का कमाऊ सदस्य, जिसकी आजीविका का मुख्य स्रोत संबंधित कृषि भूमि से प्राप्त होने वाली आय हो।

    पट्टे या बटाई पर जमीन लेकर खेती करने वाला भूमिहीन व्यक्ति।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये तीनों श्रेणियां पात्रता के अलग-अलग आधार हैं। इसलिए क्लॉज 2(2) के तहत दावा करने वाले व्यक्ति को खातेदार या बटाईदार होने की अतिरिक्त शर्त पूरी करने की आवश्यकता नहीं है।

    पत्नी को अलग से मजदूरी मिलना जरूरी नहीं

    हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी परिवार की कृषि भूमि पर खेती करती है और उस कृषि आय से उसकी आजीविका चलती है, तो उसे कमाऊ सदस्य माना जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा कि यदि मृतक महिला के नाम पर जमीन दर्ज होना अनिवार्य कर दिया जाए, तो क्लॉज 2(1) और क्लॉज 2(2) के बीच का अंतर ही समाप्त हो जाएगा और कमाऊ सदस्य के लिए बनाई गई अलग श्रेणी का कोई उद्देश्य नहीं रह जाएगा।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कमाऊ सदस्य होने के लिए परिवार का एकमात्र कमाने वाला होना जरूरी नहीं है। पति के पास अपनी जमीन या आय होने मात्र से पत्नी की पात्रता समाप्त नहीं हो जाती।

    याचिकाकर्ता की चाय की दुकान से होने वाली आय पर भी कोर्ट ने विचार किया। कोर्ट ने कहा कि केवल याचिकाकर्ता के चाय की दुकान चलाने से यह साबित नहीं होता कि मृतका की आजीविका का मुख्य स्रोत भी वही था।

    पूर्व के फैसलों का भी दिया हवाला

    हाईकोर्ट ने Smt. Gayatri Devi v. State of U.P. and others तथा Rajesh Kumar v. State of U.P. and others मामलों में दिए गए खंडपीठ के फैसलों पर भरोसा किया।

    इन फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया था कि योजना का लाभ पाने के लिए कृषि भूमि का मृतक के नाम दर्ज होना अनिवार्य नहीं है। परिवार के अन्य सदस्यों के नाम दर्ज जमीन पर पति-पत्नी द्वारा संयुक्त रूप से खेती करना भी पात्रता का आधार हो सकता है।

    कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि मृतका की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि के अलावा कुछ और था।

    जिलाधिकारी का आदेश रद्द, चार सप्ताह में नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी कुशीनगर द्वारा 24 मई, 2022 को पारित आदेश को रद्द कर दिया।

    कोर्ट ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के दावे पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार कर चार सप्ताह के भीतर आदेश पारित करें।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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