इलाहाबाद हाईकोर्ट: सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद के खिलाफ बेदखली आदेश बरकरार, लेकिन रेवेन्यू कोड के तहत जुर्माना रद्द
Praveen Mishra
30 March 2026 11:12 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि ग्राम सभा की 'खलिहान' भूमि पर बनी मस्जिद अवैध रूप से निर्मित है, लेकिन वर्तमान कब्जाधारियों पर लगाया गया जुर्माना टिकाऊ नहीं है, क्योंकि उन्हें मस्जिद के निर्माण से जोड़ने वाला कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है।
जस्टिस आलोक माथुर की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित भूमि पर अपना कोई अधिकार, शीर्षक या हित (right, title or interest) साबित नहीं कर सके। ऐसे में तहसीलदार द्वारा पारित बेदखली का आदेश विधि सम्मत है और इसमें यू.पी. रेवेन्यू कोड, 2006 के नियम 66 और 67 का पालन किया गया है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ताओं ने ही लगभग 60 वर्ष पूर्व मस्जिद का निर्माण किया था या वे इसके निर्माण से जुड़े थे। इसलिए, उनके खिलाफ लगाया गया जुर्माना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता और उसे निरस्त कर दिया गया।
मामले के तथ्य:
राजस्व अभिलेखों में दर्ज ग्राम सभा की 'खलिहान' भूमि पर कथित अवैध निर्माण को लेकर याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किया गया था। जवाब में उन्होंने कहा कि मस्जिद का निर्माण उन्होंने नहीं कराया, बल्कि यह पुराने समय से मौजूद है और इसे धार्मिक उपयोग के लिए बनाया गया था। इसके बावजूद तहसीलदार ने उन्हें बेदखल करने के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया।
याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक), लखनऊ के समक्ष चुनौती दी, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
कोर्ट ने कहा कि बेदखली की कार्यवाही विधि के अनुरूप की गई थी और याचिकाकर्ता अपने अधिकार सिद्ध करने में असफल रहे।
साथ ही, कोर्ट ने Rishipal Singh vs State of U.P & Others मामले में निर्धारित दिशानिर्देशों पर भी विचार किया। इन दिशानिर्देशों में अतिक्रमण से जुड़े मामलों में रिपोर्ट तैयार करने वाले व्यक्ति से जिरह (cross-examination) का अधिकार देने की बात कही गई थी।
लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून (यू.पी. रेवेन्यू कोड) में पहले से विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित है, तो केवल न्यायालय द्वारा सुझाए गए दिशानिर्देश स्वतः लागू नहीं हो सकते। जब तक राज्य सरकार इन दिशानिर्देशों को नियमों में संशोधन के माध्यम से अपनाती नहीं, तब तक उनका पालन अनिवार्य नहीं है।
निष्कर्ष:
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए बेदखली के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन याचिकाकर्ताओं पर लगाया गया जुर्माना रद्द कर दिया।

