CCTV फुटेज सिर्फ 2 महीने रखने वाला यूपी डीजीपी का आदेश सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की 'प्रथम दृष्टया अवमानना': हाईकोर्ट
Praveen Mishra
9 Jan 2026 9:00 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा जारी उस परिपत्र पर गंभीर सवाल उठाए, जिसमें राज्य के सभी थानों में CCTV फुटेज केवल 2 से 2.5 महीने तक सुरक्षित रखने का प्रावधान किया गया है। अदालत ने इसे अत्यंत अजीब बताते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले Paramvir Singh Saini बनाम बलजीत सिंह (2020) के प्रथमदृष्टया अवमानना जैसा प्रतीत होता है, जिसमें कम से कम 6 महीने से 18 महीने तक फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ इस समय रूबी सिंह व अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उन्नाव पुलिस ने उन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की।
मामले के संक्षिप्त तथ्य
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 5 अगस्त 2025 को पुलिस ने उनके कुछ रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज धारा 306 BNS के तहत एफआईआर के आधार पर उन्हें उठा लिया, लेकिन कोई गिरफ्तारी मेमो नहीं बनाया गया। आरोप है कि 7 अगस्त की रात याचिकाकर्ता संख्या-1 (एक महिला) को अवैध रूप से लॉकअप में रखा गया और उसके खिलाफ अश्लील टिप्पणियां की गईं। याचिकाकर्ता संख्या 2 और 3 को ₹10,000 की रिश्वत देने के बाद छोड़ा गया।
उन्होंने इन आरोपों की पुष्टि के लिए 5 से 8 अगस्त 2025 की CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की मांग भी की थी।
कोर्ट की कार्यवाही
25 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने उन्नाव के एसपी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने और संबंधित अवधि की CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। लेकिन एसपी ने बताया कि फुटेज उपलब्ध नहीं है, क्योंकि 20 जून 2025 के DGP परिपत्र के अनुसार केवल 2–2.5 महीने की रिकॉर्डिंग रखी जाती है।
अदालत ने इस पर गहरी नाराज़गी जताई और कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए हैं कि CCTV फुटेज कम से कम 6 महीने और अधिकतम 18 महीने तक सुरक्षित रखा जाए, और राज्यों को उसी अनुसार स्टोरेज क्षमता विकसित करनी होगी।
पीठ ने कहा:
“हम यह समझने में असमर्थ हैं कि DGP ने सुप्रीम कोर्ट के 02.12.2020 के आदेश का हवाला देने के बावजूद केवल 2–2.5 महीने की स्टोरेज का निर्देश कैसे जारी कर दिया। यह प्रथमदृष्टया अवमानना प्रतीत होती है।”
BNSS के उल्लंघन पर भी सवाल
कोर्ट ने यह भी पाया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 179(1) का उल्लंघन हुआ है, जिसमें कहा गया है कि किसी महिला को पूछताछ के लिए उसके निवास स्थान के अलावा कहीं और नहीं बुलाया जा सकता। इसके बावजूद याचिकाकर्ता संख्या-1 को थाने बुलाया गया।
साथ ही, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि उन्हें लिखित नोटिस दिया गया था या यात्रा खर्च दिया गया था, जैसा कि धारा 179(2) में आवश्यक है।
रिश्वत के आरोपों पर ढीला रवैया
एसपी के हलफनामे में यह स्वीकार किया गया कि रिश्वत मांगने के आरोपों में कुछ सच्चाई थी, लेकिन कार्रवाई के तौर पर केवल दो पुलिसकर्मियों को रिजर्व पुलिस लाइन भेजा गया और प्रारंभिक जांच शुरू की गई। कोर्ट ने इसे “लापरवाह और औपचारिक रवैया” बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई।
मुख्य सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को तीन सप्ताह में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा:
DGP ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विपरीत ऐसा परिपत्र क्यों जारी किया;
क्या BNSS की धारा 179(2) के तहत आवश्यक नियम बनाए गए हैं या नहीं;
महिला याचिकाकर्ता को किस परिस्थिति में थाने बुलाया गया और क्यों।
अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो मुख्य सचिव को स्वयं अदालत में उपस्थित होना होगा।
मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2026 को होगी।

