किशोरावस्था के आपराधिक मामले नौकरी में बाधा नहीं बन सकते : इलाहाबाद हाईकोर्ट

Praveen Mishra

25 May 2026 1:12 PM IST

  • किशोरावस्था के आपराधिक मामले नौकरी में बाधा नहीं बन सकते : इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किशोरावस्था में किए गए अपराध में दोषसिद्धि या ऐसे मामले की लंबित सुनवाई किसी व्यक्ति को वयस्क होने पर नौकरी पाने से अयोग्य नहीं ठहरा सकती। कोर्ट ने कहा कि लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को रोजगार से वंचित करना उसके जीवन और आजीविका पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।

    जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 19 का हवाला देते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किशोरावस्था में अपराध के आरोप या दोषसिद्धि व्यक्ति के भविष्य और रोजगार के अधिकार में बाधा न बने।

    मामला ESIC द्वारा उत्तर प्रदेश क्षेत्र में मल्टी-टास्किंग स्टाफ (MTS), अपर डिवीजन क्लर्क और स्टेनोग्राफर पदों पर भर्ती से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने MTS पद के लिए आवेदन किया था और चयनित भी हो गया था। दस्तावेज सत्यापन के दौरान उसने अपने खिलाफ लंबित दो आपराधिक मामलों की जानकारी दी, जो उसके किशोर रहते दर्ज हुए थे।

    हालांकि अन्य चयनित उम्मीदवारों को जॉइनिंग लेटर जारी कर दिए गए, लेकिन याचिकाकर्ता को पुलिस सत्यापन लंबित होने का हवाला देकर नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India Vs. Ramesh Bishnoi फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को किशोरावस्था में दोषी भी ठहराया गया हो, तब भी वह नौकरी पाने से अयोग्य नहीं होता। ऐसे में केवल लंबित मामला नियुक्ति रोकने का आधार नहीं बन सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि भारत में अदालतों पर मामलों का भारी बोझ है और कई मामलों में अंतिम रिपोर्ट पर निर्णय आने में लंबा समय लग जाता है। यदि इस दौरान व्यक्ति को नौकरी से वंचित रखा जाए और बाद में वह बरी हो जाए, तो यह उसके लिए अपूरणीय क्षति होगी।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में आरोपी दोषी पाया जाता है, तो संबंधित विभाग के पास सेवा समाप्त करने का कानूनी अधिकार हमेशा रहेगा। लेकिन केवल लंबित मामले के आधार पर किसी को अनिश्चितकाल तक नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने ESIC के क्षेत्रीय निदेशक, कानपुर को 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को जॉइनिंग लेटर जारी करने का निर्देश दिया।

    Praveen Mishra

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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