अधिग्रहित जमीन पर 65 साल तक कब्जा बनाए रखने वाले याचिकाकर्ताओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया 5 लाख रुपये का जुर्माना, तथ्य छिपाकर हासिल कराई थी मुक्ति
Amir Ahmad
30 Oct 2026 12:39 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिग्रहित जमीन को मुक्त कराने के लिए महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने वाले दो याचिकाकर्ताओं पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने यह तथ्य छिपाया था कि उनके पूर्वजों ने जमीन का अधिग्रहण शुरू होने के बाद उसे खरीदा था। इसके अलावा, अधिग्रहण को चुनौती देने वाले दीवानी मुकदमे, पहली अपील और दूसरी अपील की जानकारी भी अदालत से छिपाई गई।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 48 के तहत कानपुर शहरी क्षेत्र विकास अधिनियम, 1945 के अंतर्गत अधिग्रहित जमीन को मुक्त कराने की मांग नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1945 के अधिनियम में 1894 के अधिनियम की धारा 48 को अपनाया ही नहीं गया। इसके अलावा, वर्ष 1945 के अधिनियम को उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 581 के तहत निरस्त किए जाने के बाद उसके माध्यम से अपनाए गए प्रावधान भी प्रभावहीन हो गए।
खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 1945 के अधिनियम की धारा 71 के तहत बोर्ड को राज्य सरकार की पूर्व अनुमति से भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के प्रावधानों के अनुसार जमीन अधिग्रहित करने का अधिकार था। वहीं, धारा 114 में अधिग्रहण के लिए 1894 के अधिनियम को वर्ष 1945 के कानून की अनुसूची में निर्धारित संशोधनों के अधीन लागू करने का प्रावधान था। अनुसूची के अनुच्छेद 14 के तहत 1894 के अधिनियम में धारा 48-ए जोड़ी गई थी, जिसमें धारा 6 की अधिसूचना जारी होने के दो साल के भीतर कलेक्टर द्वारा मुआवजे का अवार्ड घोषित नहीं किए जाने की स्थिति में मुआवजे का प्रावधान था।
कोर्ट ने कहा कि वर्ष 1945 के मूल अधिनियम के निरस्त होने के बाद उसके तहत अपनाए गए 1894 के अधिनियम के प्रावधानों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रह गया। इसलिए धारा 48 के तहत जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कराने का आवेदन नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 का भी इस मामले में लाभ नहीं लिया जा सकता। इस धारा के तहत अधिग्रहण के पांच साल के भीतर जमीन का उपयोग नहीं होने पर प्रभावित व्यक्ति राज्य सरकार से जमीन वापस करने की मांग कर सकता है, लेकिन यह प्रावधान केवल वर्ष 1973 के अधिनियम के तहत अधिग्रहित जमीन पर लागू होता है।
मामला कानपुर नगर जिले के शाहपुर (मोहसिनपुर) गांव की 6 बीघा 16 बिस्वा भूमि से जुड़ा है। इस जमीन का वर्ष 1959 में कानपुर शहरी क्षेत्र विकास अधिनियम, 1945 के तहत कल्याणपुर, पनकी, पांडु नगर विस्तार और हरित पट्टी योजना के लिए अधिग्रहण किया गया। तत्कालीन कानपुर नगर महापालिका के लिए 29 जुलाई 1963 को अवार्ड संख्या 47 घोषित किया गया। बाद में जमीन कानपुर विकास प्राधिकरण में निहित हो गई।
अधिग्रहण के समय दर्ज खातेदारों ने 598 रुपये की मुआवजा राशि नहीं ली थी, जिसे आरडी खाते में जमा कर दिया गया था। वहीं, 9,964.20 रुपये का संशोधित अवार्ड भी कभी जमा नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने खुद को जमीन का सह-स्वामी बताते हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 48 और उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करने की मांग की थी। उनका कहना था कि जिस योजना के लिए जमीन अधिग्रहित की गई थी, उसे लागू नहीं किया गया, जमीन पर कब्जा नहीं लिया गया और मुआवजा भी नहीं दिया गया।
कानपुर नगर के जिलाधिकारी की 27 जनवरी 2005 की रिपोर्ट में जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद 3 मई 2006 की अधिसूचना के जरिए जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया गया।
हालांकि, राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव ने 16 मई 2008 को इस अधिसूचना को वापस लेने का आदेश जारी किया। यह कार्रवाई 15 सितंबर 2006 के शासनादेश के आधार पर की गई, जिसके तहत अधिग्रहण से जमीन मुक्त करने की शक्ति संबंधित विभाग को सौंपी गई। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दूसरी अपील का रिकॉर्ड तलब किया। रिकॉर्ड से पता चला कि जमीन का मूल खातेदार रतन था। याचिकाकर्ताओं के पूर्वज बेलीराम और रामलाल ने 20 अगस्त 1962 को पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए रतन से यह जमीन खरीदी थी। जबकि जमीन के अधिग्रहण से संबंधित वर्ष 1945 के अधिनियम की धारा 53 और 60 के तहत अधिसूचनाएं वर्ष 1959 में ही जारी हो चुकी थीं।
पूर्वजों ने अधिग्रहण को चुनौती देते हुए दीवानी मुकदमा दायर किया, जिसे 25 अप्रैल 1975 को खारिज कर दिया गया। अदालत ने तब पाया था कि मूल खातेदार रतन अधिग्रहण को चुनौती देने का अपना अधिकार छोड़ चुका था और बाद में जमीन खरीदने वाले लोगों को उससे अधिक अधिकार नहीं मिल सकते।
इसके बाद पहली अपील भी खारिज हो गई। दूसरी अपील को 28 जुलाई 2006 को निष्प्रभावी बताते हुए खारिज करा दिया गया। यह घटनाक्रम जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करने वाली 3 मई 2006 की अधिसूचना हासिल होने के बाद हुआ था।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को अपने दादा से बेहतर कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता। बिक्री विलेख के जरिए उनके पूर्वजों को केवल अधिग्रहित जमीन का मुआवजा प्राप्त करने का अधिकार मिला था, न कि अधिग्रहण को चुनौती देने का।
कोर्ट ने पाया कि जिलाधिकारी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर तैयार कराई गई। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि रतन जमीन का मूल खातेदार था और उसके खिलाफ अधिग्रहण की कार्रवाई की गई। साथ ही यह तथ्य भी छिपाया गया कि याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों ने वर्ष 1959 में धारा 60 की अधिसूचना जारी होने के बाद जमीन खरीदी थी।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि रिपोर्ट में जमीन पर कब्जा नहीं लिए जाने की बात सही नहीं थी। दरअसल, वर्ष 1963 और 1965 में दायर दो रिट याचिकाओं के दौरान निषेधाज्ञा जारी थी। इसके बाद दीवानी मुकदमे, पहली अपील और दूसरी अपील में भी निषेधाज्ञा प्रभावी रही। इसी कारण अधिकारी जमीन पर कब्जा नहीं ले सके थे।
कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं था, जिसमें अधिकारियों की गलती या जानबूझकर लापरवाही के कारण कब्जा नहीं लिया गया। अधिकारियों को केवल इसलिए कब्जा नहीं मिल सका क्योंकि अदालत के आदेश उन्हें याचिकाकर्ताओं को बेदखल करने से रोक रहे थे।
खंडपीठ ने यह भी पाया कि जमीन अधिग्रहित करने के उद्देश्य से बनाई गई योजना लागू नहीं होने की बात भी रिकॉर्ड के विपरीत थी। प्रतिवादियों ने मूल मुकदमे के दौरान ही अदालत को बताया था कि योजना लागू की जा चुकी थी।
आदेश वापस लेने की शक्ति पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य तौर पर किसी कानून में समीक्षा या आदेश वापस लेने का अधिकार नहीं दिए जाने पर प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता। हालांकि, यदि किसी आदेश को धोखाधड़ी या गलत तथ्यों के आधार पर हासिल किया गया हो, तो संबंधित प्राधिकरण उसे वापस ले सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत हर परिस्थिति में पूर्ण रूप से लागू नहीं होते। यदि निष्पक्ष सुनवाई देने के बावजूद अंतिम नतीजे में कोई बदलाव संभव नहीं है तो सुनवाई का अवसर न दिए जाने से कानूनी रूप से कोई नुकसान नहीं माना जाएगा। चूंकि संबंधित जमीन को कानूनन अधिग्रहण से मुक्त ही नहीं किया जा सकता, इसलिए आदेश वापस लेने से पहले सुनवाई नहीं दिए जाने के आधार पर याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं दी जा सकती।
खंडपीठ ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को यह अधिकार है कि वह किसी ऐसे आदेश को रद्द करने से इनकार कर सकता है, जिसे रद्द करने पर पहले से मौजूद कोई अवैध आदेश फिर प्रभावी हो जाए। इस मामले में 3 मई 2006 की अधिसूचना स्वयं धोखाधड़ी से हासिल की गई थी। ऐसे में उसे फिर से प्रभावी होने देना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया था। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक प्रक्रिया का अपनी सुविधा के अनुसार भरपूर दुरुपयोग किया और ऐसी जमीन पर 65 साल से अधिक समय तक कब्जा बनाए रखा, जिस पर उनका कोई स्वामित्व अधिकार नहीं था।
इन्हीं तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की और दोनों याचिकाकर्ताओं पर कुल 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। उन्हें दो महीने के भीतर यह राशि प्रतिवादी संख्या एक के पास जमा करने का निर्देश दिया गया है। जुर्माने की आधी राशि इलाहाबाद हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति को दी जाएगी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय में जुर्माने की राशि जमा नहीं की जाती है तो प्रतिवादी संख्या एक इसे भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूलने के लिए स्वतंत्र होगा।

