मुजफ्फरनगर के शिक्षक की करीब 37 साल के सर्विस केस में हाईकोर्ट ने कहा- जरूरी योग्यता के बिना नियुक्ति शुरू से ही शून्य, नियमितीकरण से नहीं हो सकती वैध

Amir Ahmad

8 Sept 2026 11:53 AM IST

  • मुजफ्फरनगर के शिक्षक की करीब 37 साल के सर्विस केस में हाईकोर्ट ने कहा- जरूरी योग्यता के बिना नियुक्ति शुरू से ही शून्य, नियमितीकरण से नहीं हो सकती वैध

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग एवं चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 21 के तहत मिलने वाला संरक्षण एडहॉक शिक्षकों को उपलब्ध नहीं है। धारा 21 के तहत प्रबंध समिति को किसी शिक्षक को सेवा से हटाने या बर्खास्त करने से पहले बोर्ड की पूर्व मंजूरी लेना जरूरी है, लेकिन यह सुरक्षा बोर्ड की संस्तुति पर नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के लिए है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि प्रथम कठिनाई निवारण आदेश, 1981 के तहत नियुक्त एडहॉक शिक्षक अलग श्रेणी में आते हैं। ऐसे शिक्षक धारा 21 के संरक्षण का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति के पास पद के लिए कानूनन निर्धारित अनिवार्य योग्यता ही नहीं थी, उसकी नियुक्ति शुरू से ही शून्य होगी और बाद में किया गया नियमितीकरण भी ऐसी मूल कमी को दूर नहीं कर सकता।

    मामला मुजफ्फरनगर के कल्याणकारी शकुभरा इंटर कॉलेज, कुरालसी का है। स्थायी प्रवक्ता के इस्तीफे के बाद जीव विज्ञान के प्रवक्ता का पद रिक्त हुआ था। अपीलकर्ता को 21 अक्टूबर 1986 को एडहॉक आधार पर नियुक्त किया गया। उनकी शैक्षणिक योग्यता कृषि विषय में एमएससी थी। नियुक्ति को जिला विद्यालय निरीक्षक ने 23 दिसंबर 1986 को मंजूरी भी दी थी।

    हालांकि, प्रबंध समिति के 12 अक्टूबर 1986 के प्रस्ताव में यह दर्ज था कि अपीलकर्ता ने बीएससी में प्राणी विज्ञान विषय नहीं पढ़ा था। इसके बावजूद विद्यार्थियों के हित का हवाला देते हुए उन्हें नियुक्त कर दिया गया।

    प्रबंध समिति ने 31 जुलाई 1989 को उनकी सेवाएं समाप्त कीं। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए दलील दी कि अधिनियम की धारा 21 के तहत बोर्ड की पूर्व मंजूरी के बिना उनकी सेवा समाप्त नहीं की जा सकती। सिंगल जज ने 20 सितंबर 1989 को सेवा समाप्ति पर रोक लगाई और अपीलकर्ता अंतरिम आदेश के आधार पर सेवा में बने रहे।

    बाद में 4 सितंबर 1995 को धारा 33-ए के तहत उनका नियमितीकरण कर दिया गया। इसके बाद 2 फरवरी 1999 को उन्हें प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया। वह 1 फरवरी 1999 तक प्रवक्ता और उसके बाद 31 मार्च 2023 तक प्रधानाचार्य के पद पर रहे। यानी लगभग 37 वर्षों तक वह सेवा में रहे।

    वर्ष 2003 में उनकी याचिका डिफॉल्ट के कारण खारिज हो गई, जिसे 2010 में खंडपीठ ने बहाल किया। इसके बाद सिंगल जज ने 21 जनवरी 2011 को याचिका फिर खारिज की। कोर्ट ने माना कि नियुक्ति के समय अपीलकर्ता के पास आवश्यक योग्यता नहीं थी और अंतरिम आदेश के आधार पर प्राप्त पूरे वेतन की वसूली का निर्देश दिया।

    इस आदेश के खिलाफ विशेष अपील दाखिल की गई।

    अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनका नियमितीकरण कभी चुनौती नहीं दिया गया और इससे शुरुआती नियुक्ति की कमी दूर हो गई। यह भी कहा गया कि नियुक्ति में उनकी ओर से कोई धोखाधड़ी नहीं की गई तथा करीब 37 साल की सेवा के बाद शुरुआती योग्यता की कमी को नजरअंदाज किया जाना चाहिए।

    राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कानून के विपरीत नियुक्ति को प्रशासनिक मंजूरी या नियमितीकरण के जरिए वैध नहीं बनाया जा सकता। कानून के खिलाफ किसी व्यक्ति को अधिकार नहीं मिल सकता।

    हाईकोर्ट ने धारा 21 की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें पूर्व मंजूरी देने वाली संस्था बोर्ड है। इसका लाभ उन शिक्षकों को मिलता है, जिनकी नियुक्ति बोर्ड की संस्तुति पर हुई हो। कोर्ट ने पूर्ण पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एडहॉक नियुक्तियों के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक की मंजूरी की भी आवश्यकता नहीं है।

    कोर्ट ने कहा कि 1989 में प्रबंध समिति द्वारा की गई सेवा समाप्ति के लिए बोर्ड की मंजूरी जरूरी नहीं थी, क्योंकि अपीलकर्ता बोर्ड द्वारा चयनित शिक्षक नहीं है। इसके अलावा उनकी नियुक्ति ही निर्धारित योग्यता नहीं होने के कारण शून्य है।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि केवल मंजूरी न लिए जाने के तकनीकी आधार पर सेवा समाप्ति का आदेश रद्द किया जाता है तो इससे एक ऐसी नियुक्ति फिर बहाल हो जाएगी, जो कानून के मुताबिक शुरू से ही अवैध थी।

    कोर्ट ने धारा 33-ए के प्रावधानों की भी विस्तार से व्याख्या की। कोर्ट के मुताबिक नियमितीकरण के लिए शिक्षक का निर्धारित योग्यता रखना या उससे विधिवत छूट प्राप्त होना आवश्यक है।

    4 सितंबर 1995 के नियमितीकरण आदेश में केवल 'एमएससी' योग्यता लिखी गई, विषय का उल्लेख नहीं था। कोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण माना, क्योंकि उस समय अपीलकर्ता की योग्यता को लेकर विवाद पहले से ही अदालत के सामने था।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया,

    “नियमितीकरण नियुक्ति की प्रक्रिया में हुई कमी को दूर कर सकता है, लेकिन कानून द्वारा अनिवार्य निर्धारित योग्यता का विकल्प नहीं हो सकता।”

    कोर्ट ने दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मामले और सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी फैसले समेत अन्य न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारहीन तरीके से की गई कार्रवाई को बाद की स्वीकृति से वैध नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह अदालत के अंतरिम आदेश के कारण लंबे समय तक सेवा में बने रहने से भी कोई स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने नियुक्ति और सेवा समाप्ति के संबंध में अपीलकर्ता को राहत नहीं दी, लेकिन करीब 37 वर्षों की सेवा के दौरान प्राप्त वेतन की पूरी वसूली का आदेश रद्द किया।

    कोर्ट ने कहा कि वेतन की वसूली का निर्णय सबसे पहले संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को लेना चाहिए। रिट क्षेत्राधिकार में अदालत द्वारा सीधे इतनी लंबी अवधि के वेतन की वसूली का आदेश देना उचित नहीं है।

    कोर्ट ने यह भी माना कि अपीलकर्ता ने अदालत के अंतरिम आदेश के कारण सेवा की थी। इसे धोखाधड़ी, गलतबयानी या तथ्य छिपाने के बराबर नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि जिस कर्मचारी ने वास्तव में काम किया हो, उससे दशकों का वेतन वापस लेना अत्यधिक कठोर और असंगत होगा। अदालत ने ऐसी वसूली को संविधान के अनुच्छेद 23 में निहित जबरन श्रम के निषेध के संदर्भ में भी देखा।

    फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने मामले को शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के पास संबंधित विषय की आवश्यक योग्यता नहीं थी, उसे लंबे समय तक पढ़ाने दिया गया और बाद में वह उसी संस्था का प्रधानाचार्य भी बन गया।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे मामले में सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों का होता है। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता को मिला लंबे समय का वेतन अपने आप में एक तरह का लाभ है, क्योंकि नियुक्ति वैध नहीं थी और उसे एक क्षण के लिए भी जारी नहीं रहना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने इस मामले की जानकारी माध्यमिक शिक्षा निदेशक तक पहुंचाने का सुझाव भी दिया, क्योंकि अदालत के अनुसार राज्य में यह अकेला मामला नहीं हो सकता।

    खंडपीठ ने सिंगल जज द्वारा याचिका खारिज किए जाने का फैसला बरकरार रखा, लेकिन वेतन की पूरी वसूली का निर्देश रद्द किया। इस तरह विशेष अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई।

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