सहकारी समिति के चेयरमैन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की बैठक सिर्फ जिलाधिकारी बुला सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Oct 2026 11:48 AM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सहकारी समिति के चेयरमैन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बैठक बुलाने का अधिकार केवल जिलाधिकारी के पास है। उत्तर प्रदेश सहकारी समिति नियमावली, 1968 के नियम 465 के तहत जिलाधिकारी ही निर्धारित प्राधिकारी हैं और यह अधिकार किसी दूसरे अधिकारी को सौंपा या आगे हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी अन्य अधिकारी ने अविश्वास प्रस्ताव पर बैठक की तारीख, समय और स्थान तय किया है तो वह कानूनन सक्षम प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र के बिना की गई कार्रवाई होगी और ऐसी बैठक में पारित प्रस्ताव टिक नहीं सकता।
मामला मेरठ जिले के खजूरी, परीक्षितगढ़ ब्लॉक की प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समिति के चेयरमैन से जुड़ा था। याचिकाकर्ता वर्ष 2023 में समिति की प्रबंध समिति के चेयरमैन चुने गए। उनके साथ नौ अन्य निदेशक भी निर्वाचित हुए।
16 सितंबर 2025 को समिति के निदेशकों ने चेयरमैन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए मेरठ के जिलाधिकारी के समक्ष लिखित मांग रखी। यह मांग कलेक्ट्रेट के जनता दर्शन प्रभारी के माध्यम से सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक, सहकारी समितियों को भेजी गई। इसके बाद सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक ने 24 सितंबर 2025 को अपर जिला सहकारी अधिकारी और तहसील प्रभारी, मवाना-1 को निदेशक मंडल की बैठक बुलाने का निर्देश दे दिया।
6 अक्टूबर 2025 को बैठक हुई और अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता को चेयरमैन पद से हटा दिया गया तथा निदेशक अमित त्यागी को नए चुनाव होने तक एक्टिंग चेयरमैन के रूप में काम करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
बाद में बैंक ने कार्यवाहक चेयरमैन और सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से समिति का अकाउंट संचालित करने से इनकार किया। अमित त्यागी ने इसके खिलाफ अलग याचिका दाखिल की, जिसमें हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित कर अकाउंट रूप से अकाउंट संचालित करने की अनुमति दी। इसी के आधार पर बैंक ब्रांच प्रबंधक ने 19 अगस्त 2026 को आदेश जारी किया। हटाए गए चेयरमैन ने अविश्वास प्रस्ताव के साथ-साथ इस आदेश को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि नियम 465 के तहत जिलाधिकारी ही निर्धारित प्राधिकारी हैं और अविश्वास प्रस्ताव की बैठक बुलाने का अधिकार केवल उन्हीं के पास है। इसके बावजूद यह अधिकार अधिकारियों की एक श्रृंखला के जरिए अंततः अपर जिला सहकारी अधिकारी को दे दिया गया, जबकि नियमों में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी नामित प्राधिकारी को कानून से मिला अधिकार प्रशासनिक सुविधा के नाम पर दूसरे अधिकारी को नहीं सौंपा जा सकता, जब तक कानून में इसकी स्पष्ट अनुमति न हो।
खंडपीठ ने कहा,
“चूंकि जिलाधिकारी नियमों के तहत निर्धारित प्राधिकारी हैं, इसलिए जिलाधिकारी के अलावा कोई अन्य व्यक्ति अविश्वास प्रस्ताव की बैठक बुलाने के लिए तारीख, समय और स्थान तय करने का सक्षम अधिकारी नहीं है। यदि कोई अन्य अधिकारी ऐसी बैठक बुलाता है तो वह कानूनन सक्षम प्राधिकारी के अधिकार के बिना कार्रवाई करेगा।”
अदालत ने कहा कि सहकारी समिति के चेयरमैन या उपाध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार ही पूरी की जानी चाहिए। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानून में निर्धारित अधिकार को आगे किसी अन्य अधिकारी को सौंपने की अनुमति नहीं है। अदालत ने इसे 'डेलीगेटस नॉन पोटेस्ट डेलीगारे' के सिद्धांत से भी जोड़ा, जिसका अर्थ है कि जिसे अधिकार सौंपा गया है, वह स्वयं उस अधिकार को आगे नहीं सौंप सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव के जरिए किसी निर्वाचित चेयरमैन या उपाध्यक्ष को पद से हटाया जाता है। इससे लोकतांत्रिक जनादेश प्रभावित हो सकता है। इसलिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना जरूरी है।
खंडपीठ ने कहा,
“अविश्वास प्रस्ताव किसी निर्वाचित पदाधिकारी को पद से हटा देता है और लोकतांत्रिक जनादेश को प्रभावित कर सकता है। इसलिए वैधानिक प्रक्रिया का अक्षरशः पालन किया जाना चाहिए।”
अदालत ने बैठक की सूचना देने के लिए निर्धारित 21 दिनों की अवधि का भी पालन नहीं होने की बात कही। नियम 458 के तहत बैठक के लिए कम से कम 21 दिन का नोटिस जरूरी है। अदालत ने कहा कि दोनों अंतिम तारीखों को छोड़कर बैठक की सूचना और बैठक के बीच कम से कम 21 पूरे दिन होने चाहिए।
मामले में 16 सितंबर 2025 की मांग और 6 अक्टूबर 2025 को हुई बैठक के बीच केवल 19 पूरे दिन थे। इसलिए अदालत ने माना कि निर्धारित अवधि का भी पालन नहीं हुआ।
इसके अलावा, बैठक की अध्यक्षता भी सहकारी विभाग के एक अधिकारी ने की थी। अदालत ने कहा कि नियम 459 के तहत बैठक की अध्यक्षता ऐसे राजपत्रित सरकारी कर्मचारी को करनी चाहिए जो संबंधित सहकारी समिति के पर्यवेक्षण और प्रशासन वाले विभाग से बाहर का हो। इस मामले में यह शर्त भी पूरी नहीं हुई।
खंडपीठ ने कहा कि मामले में सबसे गंभीर प्रक्रियागत चूक यह थी कि निर्धारित प्राधिकारी यानी जिलाधिकारी ने नियमावली में दी गई अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
इन खामियों के आधार पर हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर 2025 को पारित अविश्वास प्रस्ताव और अमित त्यागी को एक्टिंग चेयरमैन नियुक्त करने संबंधी प्रस्ताव रद्द किया। अदालत ने 19 अगस्त 2026 के बैंक शाखा प्रबंधक के आदेश को भी रद्द कर दिया, क्योंकि वह उसी अविश्वास प्रस्ताव पर आधारित था।
हालांकि, अदालत ने निदेशकों को नियमावली, 1968 के भाग सात के अनुसार नई मांग रखने की स्वतंत्रता दी। यानी यदि निदेशक चाहें तो निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करते हुए चेयरमैन के खिलाफ नए सिरे से अविश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं।

