संविधान के बाद बनी असंवैधानिक सेवा नियमावली के आधार पर हुई बर्खास्तगी टिक नहीं सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

22 Aug 2026 5:03 PM IST

  • संविधान के बाद बनी असंवैधानिक सेवा नियमावली के आधार पर हुई बर्खास्तगी टिक नहीं सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब चार दशक पुराने बैंक कर्मचारी की बर्खास्तगी के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान लागू होने के बाद बनाई गई ऐसी सेवा नियमावली, जिसे अदालत असंवैधानिक घोषित कर चुकी है, शुरुआत से ही शून्य मानी जाएगी। उसके आधार पर की गई बर्खास्तगी भी कानूनी रूप से कायम नहीं रह सकती।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के एक क्लर्क की वर्ष 1983 में हुई बर्खास्तगी रद्द की।

    अदालत ने कहा कि जिस नियम के आधार पर कर्मचारी को सेवा से हटाया गया, उसे हाईकोर्ट पहले ही वर्ष 1994 में असंवैधानिक घोषित कर चुका था। ऐसे में उस नियम के आधार पर की गई कार्रवाई को बचाने का कोई आधार नहीं है।

    मामले के अनुसार कर्मचारी की वर्ष 1981 में गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में क्लर्क के पद पर नियुक्ति हुई। उसे एक वर्ष की परिवीक्षा पर रखा गया और उसने जुलाई 1981 में कार्यभार संभाला। बैंक ने 20 जुलाई 1982 के आदेश से उसकी परिवीक्षा अवधि छह महीने के लिए बढ़ा दी। बैंक के अनुसार उसकी सेवा संतोषजनक नहीं थी और 11 मार्च 1983 को संबंधित नियम के तहत तत्काल प्रभाव से उसकी सेवा समाप्त की गई।

    कर्मचारी ने उसी वर्ष अदालत का रुख करते हुए अपनी बर्खास्तगी को अवैध बताया और सेवा में बने रहने की मांग की। निचली अदालत ने 1985 में उसके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन बैंक की अपील पर यह निर्णय पलट दिया गया। बाद में दूसरी अपील भी खारिज हो गई। इसके बाद कर्मचारी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसे एकल पीठ ने वर्ष 2004 में खारिज कर दिया। इसी के खिलाफ मौजूदा अपील दायर हुई।

    खंडपीठ ने सबसे पहले यह सवाल देखा कि अधिकतम निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद भी कर्मचारी की सेवा जारी रहने से क्या वह स्थायी रूप से नियुक्त माना जाएगा।

    अदालत ने संबंधित नियमों का अध्ययन करते हुए कहा कि परिवीक्षा एक वर्ष की थी और इसे अधिकतम छह महीने तक बढ़ाया जा सकता था। इसके बाद नियुक्ति प्राधिकारी को कर्मचारी की सेवा की पुष्टि या उसे हटाने का निर्णय लेना था।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब नियोक्ता के पास परिवीक्षा बढ़ाने की स्पष्ट अधिकतम सीमा हो और उस अवधि के अंत में कर्मचारी को स्थायी करने या सेवा से हटाने का प्रावधान हो, तो निर्धारित अधिकतम अवधि के बाद बिना किसी कार्रवाई के सेवा जारी रहने पर कर्मचारी की सेवा की पुष्टि मानी जाएगी।

    इस आधार पर अदालत ने माना कि कर्मचारी की विस्तारित परिवीक्षा अवधि 19 जनवरी 1983 को समाप्त हो गई। इसके बाद वह सेवा में स्थायी कर्मचारी माना जाएगा। इसलिए 11 मार्च 1983 को की गई उसकी बर्खास्तगी स्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने के रूप में देखी जाएगी।

    इसके बाद अदालत ने उस नियम की वैधता पर विचार किया, जिसके आधार पर कर्मचारी को हटाया गया। हाईकोर्ट ने बताया कि संबंधित नियम को वर्ष 1994 में अपने ही एक फैसले में असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का भी अनुसरण किया गया, जिसमें समान प्रावधान को मनमाना और बिना पर्याप्त दिशा-निर्देश के अधिकार देने वाला माना गया।

    बैंक की ओर से यह तर्क दिया गया कि 1994 के फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि यह तर्क अधिकतम उस पुराने फैसले की मिसाल के रूप में बाध्यकारी शक्ति को प्रभावित कर सकता है, लेकिन किसी नियम को असंवैधानिक घोषित करने का फैसला सभी पर लागू होता है।

    अदालत ने कहा कि किसी वैधानिक नियम को असंवैधानिक घोषित करने का फैसला केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता। जब किसी संवैधानिक न्यायालय ने किसी नियम को संविधान के भाग-3 के विपरीत घोषित किया, तो वह नियम प्रभावी रूप से शुरू से ही समाप्त माना जाता है।

    हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान लागू होने के बाद बनाई गई किसी नियमावली और संविधान से पहले बने कानून की स्थिति अलग होती है। संविधान से पहले बने कानून को मौलिक अधिकारों से टकराव के कारण निष्प्रभावी माना जा सकता है और परिस्थितियां बदलने पर उसके दोबारा प्रभावी होने की संभावना हो सकती है। लेकिन संविधान के बाद बनाया गया और असंवैधानिक घोषित किया गया कानून या नियम शुरू से ही शून्य हो जाता है।

    अदालत ने कहा कि जिस नियम के आधार पर बैंक ने कर्मचारी की सेवा समाप्त की, वह पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका था। इसलिए बर्खास्तगी के आदेश को बचाने वाला कोई कानूनी आधार नहीं है।

    हाईकोर्ट ने यह भी माना कि कर्मचारी अब करीब 70 वर्ष की उम्र का है, इसलिए उसे सेवा में वापस भेजना व्यावहारिक नहीं होगा। अदालत ने गौर किया कि उसने लंबे समय तक अपने कानूनी अधिकारों के लिए प्रयास किया और बहुत कम अवधि तक ही बैंक में काम कर पाया। इसके बाद अधिकांश कार्यकाल वह बैंक से बाहर रहा और इसके लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    अदालत ने कहा कि अवैध रूप से सेवा से बाहर रखे गए कर्मचारी को सामान्य तौर पर पिछला वेतन मिलने का अधिकार होता है। हालांकि, मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पूर्ण पिछला वेतन देने के बजाय बर्खास्तगी की तारीख से रिटायरमेंट तक के वेतन का 50 प्रतिशत देने का आदेश दिया।

    खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ का आदेश रद्द किया और 11 मार्च 1983 का बर्खास्तगी आदेश निरस्त किया। अदालत ने उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक के अध्यक्ष, महाप्रबंधक और शाखा प्रबंधक को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर कर्मचारी को 50 प्रतिशत पिछला वेतन और सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी परिणामी लाभों का भुगतान करें। अदालत ने 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

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