अंतरिम प्रबंधन समिति न नए सदस्य बना सकती, न पुराने सदस्यों को हटा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 के तहत गठित अंतरिम प्रबंधन समिति को सहकारी समिति में नए सदस्य शामिल करने या मौजूदा सदस्यों को हटाने का अधिकार नहीं है।

    यदि अंतरिम समिति ऐसा कोई प्रस्ताव पारित करती है, तो वह कानूनी रूप से अमान्य होगा। रजिस्ट्रार भी अधिनियम की धारा 128 के तहत ऐसे प्रस्ताव को प्रभावी नहीं कर सकता।

    जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अंतरिम प्रबंधन समिति का गठन समिति के रोजमर्रा के कामकाज को अस्थायी रूप से संभालने के लिए किया जाता है। उसे आम सभा की सदस्यता में बदलाव करने का स्वतंत्र अधिकार नहीं दिया गया।

    अदालत ने कहा,

    “कानून की व्यवस्था स्पष्ट करती है कि अंतरिम समिति केवल समिति के नियमित कामकाज के प्रबंधन के लिए एक अस्थायी व्यवस्था है। उसे नए सदस्यों को शामिल करके या मौजूदा सदस्यों को हटाकर आम सभा की संरचना बदलने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है।”

    मामला प्राथमिक आवासीय सहकारी समिति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता समिति के प्रबंधन मंडल का पिछला चुनाव वर्ष 2021 में हुआ था। इसके बाद 10 मार्च 2026 को लखनऊ के अपर आवास आयुक्त एवं अपर निबंधक, सहकारी समितियों ने अंतरिम प्रबंधन समिति गठित की थी। गठन के आदेश में ही समिति को आम सभा के सदस्यों को शामिल करने या हटाने से रोक दिया गया।

    इसके बावजूद अंतरिम समिति ने 21 जुलाई 2026 को एक प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2022 में सदस्य बनाए गए 22 लोगों को हटाने का फैसला किया और 13 नए सदस्यों को शामिल करने की अनुमति मांगी।

    अपर आवास आयुक्त एवं अपर निबंधक ने 27 अगस्त 2026 को इस प्रस्ताव पर कार्रवाई की। इसके साथ ही समिति के सचिव की नियुक्ति को भी अमान्य घोषित कर दिया गया। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि अंतरिम समिति केवल अस्थायी व्यवस्था है और उसे सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने या नए सदस्यों को शामिल करने का अधिकार नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में अधिनियम की धारा 128 के तहत कार्रवाई करने की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं हुई थीं।

    सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के वकील ने भी अंततः स्वीकार किया कि अंतरिम समिति को सदस्यों को शामिल करने या हटाने का अधिकार नहीं है और उसके प्रस्ताव पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम समिति का कामकाज रजिस्ट्रार के निर्देशों के अधीन होता है। इस मामले में रजिस्ट्रार ने समिति का गठन करते समय ही नए सदस्यों को शामिल करने और मौजूदा सदस्यों को हटाने पर रोक लगाई थी।

    इसके बावजूद सदस्यों को हटाने के प्रस्ताव को मंजूरी देना रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

    पीठ ने कहा,

    “अंतरिम समिति के कामकाज को रजिस्ट्रार के निर्देश नियंत्रित करते हैं। रजिस्ट्रार ने स्वयं नए सदस्यों को शामिल करने और मौजूदा सदस्यों को हटाने पर रोक लगाई। ऐसे में सदस्यों को हटाने के प्रस्ताव को मंजूरी देना अधिनियम, 1965 की धारा 128 के तहत रजिस्ट्रार की शक्तियों से परे है।”

    अदालत ने माना कि अंतरिम समिति ने वर्ष 2022 में सदस्य बनाए गए लोगों की सदस्यता की समीक्षा करके और उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित करके अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया। इसलिए उसका प्रस्ताव कानूनी रूप से अमान्य था और उस पर कार्रवाई करना भी गलत था।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता संख्या दो को समिति के सचिव के रूप में काम जारी रखने की अनुमति देने की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि वर्तमान में अंतरिम प्रबंधन समिति कार्यरत है।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 27 अगस्त 2026 का आदेश रद्द कर दिया और रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।

    अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को स्वतंत्र रूप से धारा 128 के तहत नया आदेश पारित करने की छूट दी, लेकिन स्पष्ट किया कि ऐसा करते समय अंतरिम समिति के विवादित प्रस्ताव को आधार नहीं बनाया जा सकता।

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