जांच का मूल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका बैंक, बर्खास्तगी का आदेश रद्द; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्मचारी को 50% बकाया वेतन देने का निर्देश दिया

  • जांच का मूल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका बैंक, बर्खास्तगी का आदेश रद्द; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्मचारी को 50% बकाया वेतन देने का निर्देश दिया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि नियोक्ता कर्मचारी के खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराता और अदालत के निर्देश के बावजूद विभागीय जांच का मूल रिकॉर्ड भी पेश नहीं करता तो अनुशासनात्मक कार्यवाही दोषपूर्ण हो जाती है। केवल यह कह देना कि रिकॉर्ड खो गया या कहीं रखकर भूल गए, नियोक्ता को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। नियोक्ता को जांच के रिकॉर्ड से यह साबित करना होगा कि कर्मचारी को अपना बचाव करने का निष्पक्ष और प्रभावी अवसर दिया गया।

    जस्टिस गरिमा प्रसाद की पीठ ने पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व चपरासी की याचिका स्वीकार करते हुए उसकी बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश रद्द किया। अदालत ने बैंक को निर्देश दिया कि कर्मचारी को 2018 में रिटायरमेंट तक लगातार सेवा में कार्यरत माना जाए, उसका वेतन काल्पनिक रूप से पुनर्निर्धारित किया जाए और उसी आधार पर पेंशन तथा अन्य रिटायरमेंट लाभ तय किए जाएं। इसके साथ ही, 21 मई 1999 से रिटायरमेंट तक की अवधि के लिए 50 प्रतिशत वेतन और भत्तों का बकाया तीन महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया गया।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि 21 नवंबर 2006 को जांच का मूल रिकॉर्ड पेश करने के लिए दिया गया निर्देश महज औपचारिकता नहीं था। बैंक ने स्वयं अनुशासनात्मक कार्यवाही की थी और बर्खास्तगी को उचित ठहराने के लिए उसी जांच पर भरोसा किया। ऐसे में हाईकोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना और अदालत के समक्ष पेश करना बैंक की जिम्मेदारी थी।

    याचिकाकर्ता को वर्ष 1986 में पंजाब नेशनल बैंक में चपरासी नियुक्त किया गया। वर्ष 1994 में उसे निलंबित कर दिया गया। काफी समय तक आरोपपत्र जारी नहीं होने पर उसने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसके बाद 19 सितंबर 1996 को उसे आरोपपत्र दिया गया।

    मुख्य आरोप यह था कि उसने विजय कुमार के नाम पर बैंक खाता खुलवाने में मदद की, चेकबुक को अपने नियंत्रण में रखा और करीब 3 लाख 15 हजार 700 रुपये के लेनदेन में रकम निकालने की प्रक्रिया को आसान बनाया। कर्मचारी ने आरोपों से इनकार किया और अपने बचाव के लिए जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां मांगीं।

    विभागीय जांच जनवरी 1997 से नवंबर 1998 तक चली। कर्मचारी पर लगाए गए छह आरोपों में से आरोप संख्या 1, 2 और 4 से 6 को साबित माना गया, जबकि आरोप संख्या 3 को आंशिक रूप से साबित पाया गया। कर्मचारी को 18 मई 1999 को जांच रिपोर्ट दी गई और 20 मई 1999 को उसका पक्ष सुना गया। इसके अगले ही दिन, 21 मई 1999 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उसकी अपील भी 28 सितंबर 1999 को खारिज कर दी गई। इस बीच, हाईकोर्ट में उसकी याचिका लंबित रहने के दौरान वह वर्ष 2018 में सेवानिवृत्त हो गया।

    कर्मचारी ने अदालत में दलील दी कि जिन दस्तावेजों की उसने मांग की थी वे उसे कभी उपलब्ध नहीं कराए गए। उसने कहा कि जब तक जांच का मूल रिकॉर्ड पेश नहीं किया जाता, बैंक यह साबित नहीं कर सकता कि उसे अपना बचाव करने के लिए पर्याप्त अवसर दिया गया। इस संबंध में उसने सुप्रीम कोर्ट के प्रबंध निदेशक, ईसीआईएल, हैदराबाद बनाम बी. करुणाकर एवं अन्य मामले के फैसले पर भरोसा किया।

    दूसरी ओर बैंक ने दलील दी कि विभागीय जांच में आरोपों को साबित करने के लिए संभावनाओं की प्रबलता का मानक लागू होता है। बैंक ने यह भी कहा कि कर्मचारी ने अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया था। बैंक ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम रजित सिंह मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यदि जांच में कोई प्रक्रियागत खामी पाई जाती है तो पूरी कार्यवाही रद्द करने के बजाय उसे उसी चरण से दोबारा जारी रखने का अवसर दिया जाना चाहिए जहां त्रुटि हुई।

    हाईकोर्ट ने पाया कि 21 नवंबर 2006 को मूल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिए जाने के बावजूद बैंक उसे प्रस्तुत नहीं कर सका। वर्ष 2012 में बैंक ने रिकॉर्ड पेश करने से छूट मांगी और कहा कि संभवतः उन्नाव शाखा का प्रशासनिक नियंत्रण लखनऊ से कानपुर स्थानांतरित होने के दौरान फाइल खो गई या कहीं रखकर भूल गए।

    अदालत ने इस स्पष्टीकरण को अधूरा बताया। पीठ ने कहा कि बैंक ने केवल यह संभावना जताई कि रिकॉर्ड स्थानांतरण के दौरान खो गया होगा लेकिन यह नहीं बताया कि स्थानांतरण कब हुआ, रिकॉर्ड के गायब होने का पता कब चला, उसे खोजने के लिए क्या प्रयास किए गए, फाइल किस अधिकारी की अभिरक्षा में थी और रिकॉर्ड का पुनर्निर्माण क्यों नहीं किया जा सका।

    अदालत ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था, जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि जांच में जानबूझकर हेरफेर किया गया। लेकिन बैंक बर्खास्तगी को सही ठहराने के लिए जांच पर निर्भर था। इसके बावजूद वह ऐसा मूल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका, जिसके आधार पर जांच की निष्पक्षता परखी जा सके। उपलब्ध फोटोकॉपी से भी यह स्पष्ट नहीं होता था कि संबंधित दस्तावेज कर्मचारी को दिए गए थे या नहीं, साक्ष्य किस तरह दर्ज किए गए और कर्मचारी की आपत्तियों पर किस प्रकार विचार किया गया।

    जांच रिपोर्ट मिलने के बाद कर्मचारी को अपना पक्ष रखने के लिए दिए गए समय पर भी अदालत ने सवाल उठाया। कर्मचारी को 18 मई 1999 को रिपोर्ट मिली 20 मई को उसकी सुनवाई हुई और 21 मई को बर्खास्तगी का आदेश पारित कर दिया गया।

    पीठ ने कहा कि लगभग दो वर्ष तक चली जांच के निष्कर्षों का अध्ययन करने और प्रस्तावित बर्खास्तगी की सजा के खिलाफ प्रभावी जवाब तैयार करने के लिए केवल दो स्पष्ट दिन पर्याप्त नहीं थे।

    हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बैंक यह साबित करने में विफल रहा कि कर्मचारी को जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए गए और उसे अपना बचाव करने का प्रभावी अवसर मिला था। अदालत ने यह भी माना कि इस प्रक्रिया संबंधी खामी से कर्मचारी को वास्तविक नुकसान हुआ। इसलिए बर्खास्तगी का आदेश और अपीलीय प्राधिकारी का आदेश दोनों दोषपूर्ण थे और उन्हें बरकरार नहीं रखा जा सकता था।

    बैंक की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि यदि जांच में कोई कमी थी तो अब नई जांच कराई जा सकती है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक ऐसा कोई प्रावधान प्रस्तुत नहीं कर सका जो लागू द्विपक्षीय समझौते या सेवा नियमों के तहत कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने या उसे जारी रखने की अनुमति देता हो।

    अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के भागीरथी जेना बनाम बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, ओडिशा स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में अब नई विभागीय जांच का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश दोनों रद्द किए। अदालत ने निर्देश दिया कि कर्मचारी को वर्ष 2018 में रिटायरमेंट तक लगातार सेवा में कार्यरत माना जाए। बैंक को उसका वेतन काल्पनिक रूप से पुनर्निर्धारित कर उसी आधार पर पेंशन और अन्य स्वीकार्य सेवानिवृत्ति लाभ तय करने होंगे।

    इसके अलावा कर्मचारी को 21 मई 1999 से रिटायरमेंट तक की अवधि के लिए वेतन और भत्तों का 50 प्रतिशत बकाया तीन महीने के भीतर देना होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि निर्धारित अवधि में रिटायरमेंट संबंधी बकाया राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो उस पर छह प्रतिशत सालाना की दर से साधारण ब्याज भी देना होगा।

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