अंतिम राहत जैसी अंतरिम राहत देने पर पूर्ण रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Praveen Mishra
9 Sept 2026 4:37 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अंतरिम चरण में दी जाने वाली राहत अगर अंतिम राहत जैसी है, तो भी उसे देने पर कोई पूर्ण कानूनी रोक नहीं है। यह फैसला हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
जस्टिस जसप्रीत सिंह ने कहा कि यह कहना कि अंतिम राहत जैसी अंतरिम राहत कभी नहीं दी जा सकती, कानून की गलत व्याख्या होगी। हालांकि, अदालत को Prima Facie Case, Balance of Convenience और Irreparable Injury को ध्यान में रखना जरूरी है।
क्या है मामला?
डॉ. अमोद कुमार सचान ने हिंद चैरिटेबल ट्रस्ट, लखनऊ से जुड़े विवाद में सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। उनका आरोप था कि कुछ ट्रस्टियों ने कथित रूप से फर्जी बैठक के मिनट्स तैयार कर उन्हें चेयरमैन पद से हटाने और उनकी प्रशासनिक व वित्तीय शक्तियां छीनने की कोशिश की।
ट्रायल कोर्ट ने 2 अप्रैल 2026 को नए चुनाव होने तक उन्हें चेयरमैन के रूप में काम करने से रोकने में प्रतिवादियों को प्रतिबंधित कर दिया।
हालांकि, अपीलीय अदालत ने 8 जुलाई 2026 को यह अंतरिम आदेश रद्द कर दिया। इसके बाद डॉ. सचान ने Article 227 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत का आदेश रद्द करते हुए कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत को ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों से निपटे बिना अपनी अलग राय नहीं बनानी चाहिए थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अपील स्वीकार करते समय की गई टिप्पणियां अस्थायी होती हैं और अंतिम सुनवाई में अदालत को बाध्य नहीं करतीं।
'Accidental Omission' और 'Clean Hands' जैसे आधारों पर भी हाईकोर्ट ने कहा कि इन्हें अंतरिम स्तर पर बिना उचित परीक्षण के तय नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने मामला दोबारा अपीलीय अदालत को भेजते हुए तीन सप्ताह के भीतर नए सिरे से फैसला करने का निर्देश दिया।
चूंकि विवाद का असर ट्रस्ट के अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज पर पड़ रहा था, कोर्ट ने बैंक खातों के संचालन को लेकर भी अंतरिम व्यवस्था जारी रखी।


