पुरुष की पहले से शादीशुदा होने की बात छिपाकर अंतरिम सुरक्षा हासिल की: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जोड़े पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना

Shahadat

11 Aug 2026 10:25 AM IST

  • पुरुष की पहले से शादीशुदा होने की बात छिपाकर अंतरिम सुरक्षा हासिल की: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जोड़े पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना

    इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने पिछले हफ़्ते एक जोड़े पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने पाया कि उन्होंने यह बात छिपाई थी कि पुरुष पहले से शादीशुदा था, ताकि पुलिस की प्रताड़ना और ज़बरदस्ती की कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा मिल सके।

    उनकी याचिका खारिज करते हुए जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने कहा कि जोड़े ने झूठा हलफनामा देकर और ज़रूरी जानकारी छिपाकर कोर्ट का रुख किया था। उन्होंने "तथ्य छिपाकर और कोर्ट के साथ धोखाधड़ी करके" पहले अंतरिम सुरक्षा भी हासिल कर ली थी।

    संक्षेप में मामला

    याचिकाकर्ताओं ने शुरू में पुलिस अधिकारियों से निर्देश देने की मांग की थी कि वे उन्हें किसी भी तरह से परेशान न करें, उनके खिलाफ कोई ज़बरदस्ती की कार्रवाई न करें और उनके जीवन में कोई बाधा न डालें।

    जब 26 मई को याचिका पर पहली बार सुनवाई हुई तो याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि दोनों बालिग हैं और पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं। यह दावा किया गया कि वे याचिकाकर्ताओं के माता-पिता के डर से शादी नहीं कर पाए और अगर उन्हें सुरक्षा दी जाती है, तो वे तुरंत शादी कर लेंगे।

    कोर्ट ने यह देखते हुए कि "जब दो बालिग़ लोग एक-दूसरे से शादी करना चाहते हैं तो कोई उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकता और कोई भी अधिकारी उनके शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा नहीं डाल सकता", उन्हें एक महीने के भीतर शादी करने और उसके बाद उसे रजिस्टर कराने की अनुमति दी।

    कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगली तारीख तक उन्हें पुलिस सहित किसी भी निजी या सरकारी अधिकारी द्वारा परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

    अब, जब 4 अगस्त को मामले पर फिर से सुनवाई हुई तो याचिकाकर्ता कोर्ट के सामने पेश हुए और उनके वकील ने बेंच को बताया कि वे शादी करने के निर्देश का पालन नहीं कर सके, क्योंकि याचिकाकर्ता नंबर 2 (पुरुष) पहले से शादीशुदा था।

    पुरुष ने कोर्ट को बताया कि उसने बलरामपुर की फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। उसने बताया कि तलाक की याचिका 3 अप्रैल, 2026 को दायर की गई।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि सुरक्षा देने का पिछला आदेश पारित करते समय इस तथ्य का "न तो रिट याचिका में और न ही कोर्ट के सामने खुलासा किया गया"। कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ताओं ने शुरू में शादी न कर पाने की वजह सिर्फ़ अपने माता-पिता का डर बताया था और उसी आधार पर सुरक्षा मांगी थी।

    इसे देखते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिका एक झूठे हलफनामे और ज़रूरी जानकारी छिपाकर दायर की गई।

    कोर्ट ने आगे यह भी कहा:

    "अंतरिम आदेश भी सच्चाई छिपाकर और कोर्ट के साथ धोखाधड़ी करके हासिल किया गया, जो कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।"

    इसके अलावा, बेंच ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता नंबर 2 ने अपने पेशे के बारे में भी गलत बयान दिया।

    डिविजन बेंच ने किशोर समरिट बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि जो याचिकाकर्ता गलत इरादे या बेईमानी से कोर्ट आते हैं, उन पर भारी जुर्माना लगाना कोर्ट की ज़िम्मेदारी है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि जो मुक़दमेबाज़ "न्याय की धारा को दूषित करने" की कोशिश करता है या "न्याय के पवित्र स्रोत को दागदार हाथों से छूता है", वह किसी भी अंतरिम या अंतिम राहत का हकदार नहीं है।

    इन हालात को देखते हुए और यह पाते हुए कि रिट याचिका को भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए, कोर्ट ने इसे खारिज किया और याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे संयुक्त रूप से और अलग-अलग 4 हफ़्तों के भीतर कोर्ट के सीनियर रजिस्ट्रार के पास ₹1 लाख जमा करें।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर तय समय के भीतर जुर्माना नहीं भरा गया तो यह रकम संबंधित ज़िला मजिस्ट्रेट के ज़रिए ज़मीन के लगान (land revenue) की बकाया राशि के तौर पर वसूल की जाएगी।

    कोर्ट ने आगे यह भी निर्देश दिया कि अगर तय समय में रकम वसूल नहीं हो पाती है तो इसकी जानकारी उचित कार्रवाई के लिए अवमानना ​​कोर्ट (Contempt Court) को दी जाए।

    Case title - Kusum Maurya And Another vs. State Of U.P. Thru. Secy. Deptt. Home Lko. And Others 2026 LiveLaw (AB) 559

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