'आरोपी पर दबाव बनाने के लिए भाई को थाने में रखा': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹40,000 मुआवजा देने का आदेश दिया

  • आरोपी पर दबाव बनाने के लिए भाई को थाने में रखा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ₹40,000 मुआवजा देने का आदेश दिया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस किसी आरोपी पर दबाव बनाने या उसे सरेंडर करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उसके परिवार के किसी निर्दोष सदस्य को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रख सकती। ऐसा करना व्यक्ति की स्वतंत्रता से गैरकानूनी वंचना है और इसके लिए पीड़ित व्यक्ति मुआवजे का हकदार है।

    जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने यह टिप्पणी अरविंद कुमार यादव की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने में कथित अवैध हिरासत को चुनौती दी गई थी।

    कोर्ट ने अरविंद कुमार यादव की अवैध हिरासत के लिए उन्हें ₹40,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि यह राशि उन पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूल की जाए, जो उनकी गैरकानूनी हिरासत के लिए जिम्मेदार थे। राशि की वसूली किस अनुपात में होगी, यह राज्य सरकार तय करेगी।

    भाई के खिलाफ दर्ज FIR के सिलसिले में घर से उठाने का आरोप

    मामला जॉर्ज टाउन थाना, प्रयागराज में दर्ज एक FIR से संबंधित था। यह FIR याचिकाकर्ता के भाई सुरेश कुमार के खिलाफ दर्ज की गई थी। शुरुआत में मामले में BNS की धारा 126(2), 191(2), 352, 115(2) और 75 के तहत आरोप दर्ज किए गए थे। जांच के दौरान BNS की धारा 109 यानी हत्या के प्रयास की धारा भी जोड़ी गई।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि उसका इस मामले से कोई संबंध नहीं था। इसके बावजूद उसे 23 जून 2026 को जौनपुर स्थित उसके घर से पुलिस उठाकर जॉर्ज टाउन थाने ले गई।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, उसे करीब 26 जून 2026 शाम 7 बजे छोड़ा गया। अपनी दलील के समर्थन में उसने रिहाई के समय तैयार किए गए सुपुर्दगीनामा को पेश किया, जिसमें 26 जून को उसे सौंपे जाने का उल्लेख था।

    IO ने माना- SHO के निर्देश पर पुलिस याचिकाकर्ता को लेकर आई

    कार्यवाही के दौरान कोर्ट के पूर्व निर्देश पर जांच अधिकारी (IO) अदालत में पेश हुए। उन्होंने बताया कि SHO योगेंद्र कुमार सिंह के निर्देश पर वह अन्य पुलिसकर्मियों के साथ याचिकाकर्ता के घर गए थे और उसे मामले में पूछताछ के लिए 23 जून को थाने लाए थे।

    राज्य की ओर से भी इस बात पर विवाद नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता 26 जून को शाम करीब 7 बजे तक थाने में रहा।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता की लोकेशन की पुष्टि के लिए पहले ही उसका कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पेश करने का निर्देश दिया था।

    CDR और CCTV से पुलिस थाने में मौजूदगी की पुष्टि

    CDR से पता चला कि 23 जून को याचिकाकर्ता की लोकेशन बदलापुर, जौनपुर में थी और इसके बाद वह प्रयागराज की ओर गया। सुबह 7:56 बजे उसकी लोकेशन जॉर्ज टाउन, प्रयागराज में दिखाई दी, जहां संबंधित पुलिस थाना स्थित है।

    इसके बाद उसका मोबाइल फोन दोपहर 12:11 बजे बंद हो गया और 27 जून को सुबह 8:08 बजे जौनपुर में दोबारा चालू हुआ।

    कोर्ट ने CCTV फुटेज पर भी गौर किया। फुटेज से यह स्थापित हुआ कि याचिकाकर्ता 23 जून से 25 जून तक जॉर्ज टाउन थाने में मौजूद था। हालांकि 26 जून की CCTV फुटेज अदालत के सामने पेश नहीं की गई।

    इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह 'निर्विवाद' है कि याचिकाकर्ता कम से कम चार दिनों तक पुलिसकर्मियों की गैरकानूनी हिरासत में रहा।

    'आरोपी पर दबाव बनाने के लिए परिवार के सदस्य को हिरासत में रखा गया'

    कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं अपराध में शामिल नहीं था, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उसे थाने में इसलिए रखा गया ताकि मामले में आरोपी उसके भाई पर दबाव बनाया जा सके और उसे पुलिस के सामने सरेंडर करने के लिए मजबूर किया जा सके।

    हालांकि, आरोपी सुरेश कुमार को बाद में अगस्त 2026 में अग्रिम जमानत मिल गई।

    खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

    “पुलिस किसी निर्दोष व्यक्ति को, जिसका कथित अपराध से कोई संबंध नहीं है, उसके परिवार के वास्तविक आरोपी पर दबाव बनाने और उसे सरेंडर करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रख सकती।”

    कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई गैरकानूनी हिरासत के समान होगी और व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता से हुए अन्यायपूर्ण नुकसान के लिए मुआवजे का हकदार होगा, “चाहे यह हिरासत कितने ही कम समय के लिए क्यों न रही हो।”

    दो पुलिस अधिकारियों की सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज होगी कोर्ट की नाराजगी

    कोर्ट ने SHO योगेंद्र कुमार सिंह और IO अश्वनी साविता के याचिकाकर्ता के संबंध में आचरण पर भी नाराजगी जताई।

    खंडपीठ ने निर्देश दिया कि दोनों पुलिस अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज की जाए।

    कोर्ट ने राज्य को ₹40,000 का मुआवजा देने और बाद में इसे संबंधित पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूलने का निर्देश देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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